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वसीयत बुढ़ापे से पहले लिखी गई, इस आधार पर अविश्वसनीय नहीं : हाईकोर्ट

Sat, 02 May 2026 01:49 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Sat, 02 May 2026 01:49 AM IST
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The will was written before old age, so it is not unreliable: High Court
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने चार दशक से चले आ रहे पारिवारिक संपत्ति विवाद को विराम देते हुए अपीलीय कोर्ट के फैसले को पलटते हुए बेटे के हक में फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने कहा कि वसीयत केवल इसलिए अविश्वसनीय नहीं हो जाती कि इसे लिखते हुए व्यक्ति युवा था या उसने सभी वारिसों को बराबर हिस्सा नहीं दिया। कोर्ट ने कहा कि यदि व्यक्ति स्वस्थ मस्तिष्क का और बालिग है तो उसकी उम्र वसीयत की वैधता पर संदेह का आधार नहीं बन सकती।
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जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने अपीलीय अदालत के 1995 के फैसले को कल्पनाओं, अनुमान और कानूनी दृष्टि से विकृत करार देते हुए खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने मानसा की ट्रायल कोर्ट के 5 दिसंबर 1992 में बेटे के पक्ष में दिए गए निर्णय को बहाल कर दिया है। पंजीकृत वसीयत 19 जून 1985 को लिखी गई थी। इसमें पिता ने अपनी मृत्यु से लगभग छह माह पहले वसीयत तैयार की थी।
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1 जनवरी 1986 को उनके निधन के बाद यह वसीयत पारिवारिक विवाद का केंद्र बन गई। ट्रायल कोर्ट ने दस्तावेज लेखक और गवाहों की गवाही के आधार पर माना था कि वसीयत विधिसम्मत तरीके से तैयार हुई और वसीयतकर्ता पूरी तरह स्वस्थ मानसिक स्थिति में था। 16 अगस्त 1995 को प्रथम अपीलीय अदालत ने यह कहते हुए ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया कि 45 वर्षीय व्यक्ति द्वारा वसीयत बनाना असामान्य है। साथ ही पत्नी और बेटियों का पर्याप्त उल्लेख न होना भी संदेह पैदा करता है। इसी आधार पर बेटे को राहत से वंचित कर दिया गया और मामला 4 दशक तक न्यायिक संघर्ष में फंसा रहा।
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अब हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 59 स्पष्ट करती है कि कोई भी स्वस्थ मस्तिष्क वाला बालिग व्यक्ति अपनी संपत्ति का इच्छानुसार निपटान कर सकता है। जीवन के मध्यकाल में बनाई गई वसीयत को संदेह की दृष्टि से देखना कानूनन गलत है बल्कि कई मामलों में यह अधिक विचारपूर्ण और संतुलित निर्णय हो सकता है। अपीलीय अदालत ने गवाहों की निर्विवाद गवाही को बिना ठोस कारण अस्वीकार किया जो न्यायिक दृष्टि से गंभीर त्रुटि है।
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