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द केरल स्टोरी फिल्म नहीं, जिम्मेदारी थी, अगर न बनाता तो अफसोस रहता : विपुल शाह
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बोले- केरल स्टोरी के बाद मैंने पुलिस प्रोटेक्शन लेने से कर दिया था मना
माई सिटी रिपोर्टर
पंचकूला। द केरल स्टोरी फिल्म नहीं, जिम्मेदारी थी। अगर इसे न बनाता तो पूरी जिंदगी अफसोस रहता। यह बात प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक विपुल शाह ने कही। वें रविवार को तीन दिवसीय अखिल भारतीय पांचवें चित्र भारती फिल्म फेस्टिवल के समापन पर मास्टर क्लास में संबोधित कर रहे थे।
शाह ने कहा कि जब मैंने केरल स्टोरी बनाना तय किया, तो मैंने अपनी पत्नी से कहा कि यह फिल्म बनाने के बाद हमारी जिंदगी बदल जाएगी। हो सकता है कि उसके बाद पूरा जीवन पुलिस प्रोटेक्शन में रहना पड़े या बॉलीवुड हमें ब्लैकलिस्ट कर दें। मेरी पत्नी ने कहा कि आप यह फिल्म बनाओ। हमने पुलिस प्रोटेक्शन लेने से मना कर दिया, क्योंकि यह मेरा देश है। भारत में रहते हुए मैं खुलकर बोलूंगा और खुलकर जीवन व्यक्ति करुंगा, लेकिन प्रोटेक्शन नहीं लूंगा।
विपुल शाह ने एक फिल्म निर्देशक की विशेषताओं को मास्टर क्लास में रेखांकित करते हुए कहा कि अगर उसमें संवेदना है और वह उसे महसूस करता है, तभी वह अच्छा निर्देशक हो सकता है। फिल्म के लेखक सुदीप्तो सेन की कहानी सुनकर मेरी आंखों में आंसू आ गए थे और मैंने उसी समय यह फिल्म बनाना तय किया था। अगर किसी कहानी को सुनते हुए, उसका कोई अंश आपके दिल को छू जाए तो उसे जरूर बनाना चाहिए। एक निर्देशक सन्यासी जैसा होता है। फिल्म को बनाते हुए हम पूरी दुनिया से कट जाते हैं। कोई भी फिल्म उसके निर्देशक के विजन से ही बनती है। यह पूरी तरह निर्देशक का ही मीडियम है।
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हाॅलीवुड की फिल्में कमाई हमसे ज्यादा क्यों?
यह पूछे जाने पर पर उन्होंने कहा कि हाॅलीवुड की फिल्में कमाई का एक हजार करोड़ का आंकड़ा पार कर जाती हैं लेकिन हमारी फिल्में यह नहीं कर पाती? इस सवाल के उत्तर में विपुल शाह ने कहा कि हाॅलीवुड की फिल्में एक साथ 50 हजार थिएटरों में रिलीज होती है, जबकि हमारी फिल्में पांच हजार थिएटरों में रिलीज होती है। जिस दिन हमारी फिल्में एक साथ 50 हजार थिएटरों में रिलीज होने लगेंगी, तो हम कमाई में हालीवुड को काफी पीछे छोड़ देंगे।
कला भी समाज का दर्पण
ओ माई गाड टू के लेखक और निर्देशक अमित राय ने कहा कि अगर कोई निर्देशक अच्छा है तो इसका अर्थ है कि चीजों को देखने का तरीका अलग होगा। कोई भी कहानी खुद निर्देशक को खोज लेती है, निर्देशक उसे नहीं ढूंढ़ता। हरियाणवी फिल्म लेखक और निर्देशक हरिओम कौशिक ने भी मास्टर क्लास में जिज्ञासा को शांत किया। प्रसिद्ध फिल्मकार अमिताभ वर्मा ने कहा कि कला भी समाज का दर्पण होती है। अब फिल्मों में एक बदलाव आया है। बड़े सितारे भी राम और रामत्व की भूमिकाओं में आ रहे हैं।
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माई सिटी रिपोर्टर
पंचकूला। द केरल स्टोरी फिल्म नहीं, जिम्मेदारी थी। अगर इसे न बनाता तो पूरी जिंदगी अफसोस रहता। यह बात प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक विपुल शाह ने कही। वें रविवार को तीन दिवसीय अखिल भारतीय पांचवें चित्र भारती फिल्म फेस्टिवल के समापन पर मास्टर क्लास में संबोधित कर रहे थे।
शाह ने कहा कि जब मैंने केरल स्टोरी बनाना तय किया, तो मैंने अपनी पत्नी से कहा कि यह फिल्म बनाने के बाद हमारी जिंदगी बदल जाएगी। हो सकता है कि उसके बाद पूरा जीवन पुलिस प्रोटेक्शन में रहना पड़े या बॉलीवुड हमें ब्लैकलिस्ट कर दें। मेरी पत्नी ने कहा कि आप यह फिल्म बनाओ। हमने पुलिस प्रोटेक्शन लेने से मना कर दिया, क्योंकि यह मेरा देश है। भारत में रहते हुए मैं खुलकर बोलूंगा और खुलकर जीवन व्यक्ति करुंगा, लेकिन प्रोटेक्शन नहीं लूंगा।
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विपुल शाह ने एक फिल्म निर्देशक की विशेषताओं को मास्टर क्लास में रेखांकित करते हुए कहा कि अगर उसमें संवेदना है और वह उसे महसूस करता है, तभी वह अच्छा निर्देशक हो सकता है। फिल्म के लेखक सुदीप्तो सेन की कहानी सुनकर मेरी आंखों में आंसू आ गए थे और मैंने उसी समय यह फिल्म बनाना तय किया था। अगर किसी कहानी को सुनते हुए, उसका कोई अंश आपके दिल को छू जाए तो उसे जरूर बनाना चाहिए। एक निर्देशक सन्यासी जैसा होता है। फिल्म को बनाते हुए हम पूरी दुनिया से कट जाते हैं। कोई भी फिल्म उसके निर्देशक के विजन से ही बनती है। यह पूरी तरह निर्देशक का ही मीडियम है।
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हाॅलीवुड की फिल्में कमाई हमसे ज्यादा क्यों?
यह पूछे जाने पर पर उन्होंने कहा कि हाॅलीवुड की फिल्में कमाई का एक हजार करोड़ का आंकड़ा पार कर जाती हैं लेकिन हमारी फिल्में यह नहीं कर पाती? इस सवाल के उत्तर में विपुल शाह ने कहा कि हाॅलीवुड की फिल्में एक साथ 50 हजार थिएटरों में रिलीज होती है, जबकि हमारी फिल्में पांच हजार थिएटरों में रिलीज होती है। जिस दिन हमारी फिल्में एक साथ 50 हजार थिएटरों में रिलीज होने लगेंगी, तो हम कमाई में हालीवुड को काफी पीछे छोड़ देंगे।
कला भी समाज का दर्पण
ओ माई गाड टू के लेखक और निर्देशक अमित राय ने कहा कि अगर कोई निर्देशक अच्छा है तो इसका अर्थ है कि चीजों को देखने का तरीका अलग होगा। कोई भी कहानी खुद निर्देशक को खोज लेती है, निर्देशक उसे नहीं ढूंढ़ता। हरियाणवी फिल्म लेखक और निर्देशक हरिओम कौशिक ने भी मास्टर क्लास में जिज्ञासा को शांत किया। प्रसिद्ध फिल्मकार अमिताभ वर्मा ने कहा कि कला भी समाज का दर्पण होती है। अब फिल्मों में एक बदलाव आया है। बड़े सितारे भी राम और रामत्व की भूमिकाओं में आ रहे हैं।