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मातृ दिवस : दो परिवारों को संवारती हैं बेटियां, उनको कम आंकना गलत
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संवाद न्यूज एजेंसीपंचकूला। बेटा-बेटी के बीच किए जाने वाले भेदभाव से ही समाज से लिंगानुपात की समस्या खड़ी हुई है। अगर इसको दूर करना है तो हर घर में बेटा-बेटी का होना जरूरी है। इतना ही जरूरी उनको बेहतर शिक्षा और अच्छे संस्कार देना है। तभी समाज में बेटियों को बेटों के बराबर सम्मान और दर्जा मिल सकेगा। ये बातें विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं ने अमर उजाला पंचकूला कार्यालय में अपराजिता कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए। मदर्स डे पर आयोजित कार्यक्रम में महिलाओं ने बिगड़ते लिंगानुपात के कारणों पर चर्चा की और इसके समाधान के लिए सुझाव भी दिए। महिलाओं ने अपने अनुभव साझा किए और समाज में बेटियों को बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए किए जा रहे प्रयासों के बारे में भी बताया।
ये रहीं मौजूद
अपराजिता कार्यक्रम में प्रणाम इंडिया फाउंडेशन की चेयरपर्सन शालू गुप्ता, सेक्टर-2 निवासी शिक्षिका डिंपल रानी, सेक्टर-14 निवासी शिक्षिका रेणू राठी, पीर मुच्छला निवासी शिक्षिका रीटा, जीरकपुर निवासी शिक्षिका सुनीता, ढकोली निवासी शिक्षिका मनोज कुमारी, इनफोसिस की टेक्नोलॉजी लीडर ढकोली निवासी बबीता गर्ग, सेक्टर-20 निवासी रिटायर्ड प्रिंसिपल कमलेश बत्रा, सेक्टर-20 निवासी वाइस प्रिंसिपल शीतल गुप्ता, ढकोली निवासी यूट्यूबर और पाठशाला स्कूल की क्रिएटिव हेड कीर्ति, पाठशाला संस्था की चेयरपर्सन जीरकपुर निवासी ममता गुप्ता, इंश्योरेंस सेक्टर में लॉ ऑफिसर सेक्टर-20 निवासी छवि बत्रा और सेक्टर-20 फतेहपुर निवासी हाउस वाइफ सर्वेश शामिल रहीं।
इस दुनिया को पैदा करने वाली ही नारी है। इसलिए उसके जन्म को ही गलत मानना विकृत मानसिकता को दर्शाता है। ऐसी सोच को समाज से बाहर करने के लिए बेहतर शिक्षा और अच्छे संस्कारों की जरूरत है। -शालू गुप्ता, चेयरपर्सन, प्रणाम इंडिया फाउंडेशन
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बेटी के प्रति नकारात्मक रवैया होने का मुख्य कारण असुरक्षा का माहौल है। इसके अलावा दहेज प्रथा के कारण भी लोग बेटी होने पर दुखी होते हैं। इसलिए इन दोनों मुद्दों पर काम किया जाना बेहद ही जरूरी है। - डिंपल रानी, अध्यापिका, निवासी, सेक्टर-2
घर में बेटी होने से संस्कारों का प्रवाह होता है। घर का बेटा भी दूसरी लड़कियों की इज्जत करना सीखता है। परिवार के लोगों में जिम्मेवारी का अहसास भी रहता है। वहीं उतनी ही जिम्मेवारी बेटी की भी परिवार के प्रति रहती है। - रेणू राठी, अध्यापिका, निवासी सेक्टर-14
बेटी होने पर भी बेटों की तरह ही खुशी मनानी चाहिए। मेरे पास दो बेटियां हैं। मैं उनसे बहुत प्यार करती हूं। पूरा परिवार ही उन पर जान छिड़कता है। बेटियों को भी बेटों की तरह काबिल बनाने के लिए अच्छी शिक्षा और संस्कार दिए जाने चाहिए। - छवि बत्रा, लॉ ऑफिसर, निवासी सेक्टर-20
पति घर या परिवार के बारे में कोई फैसला लेने से पहले अपनी पत्नी से सलाह मशविरा करे तो उनके बच्चों को यह मैसेज जाता है कि घर में उनकी मां की भी बराबरी की अहमियत है। इस बात का वे अपने जीवन में भी पालन करेंगे। - शीतल गुप्ता, वाइस प्रिंसिपल, निवासी सेक्टर-20
बेटा-बेटी में काई फर्क नहीं होता है। बच्चा कोई भी हो, वह स्वस्थ होना चाहिए। संयुक्त परिवार में बच्चों को और बेहतर माहौल मिलता है। उनकी परेशानी या उनकी संगत पर परिवार की नजर रहती है। - कमलेश बत्रा, रिटायर्ड प्रिंसिपल, निवासी सेक्टर-20
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ये रहीं मौजूद
अपराजिता कार्यक्रम में प्रणाम इंडिया फाउंडेशन की चेयरपर्सन शालू गुप्ता, सेक्टर-2 निवासी शिक्षिका डिंपल रानी, सेक्टर-14 निवासी शिक्षिका रेणू राठी, पीर मुच्छला निवासी शिक्षिका रीटा, जीरकपुर निवासी शिक्षिका सुनीता, ढकोली निवासी शिक्षिका मनोज कुमारी, इनफोसिस की टेक्नोलॉजी लीडर ढकोली निवासी बबीता गर्ग, सेक्टर-20 निवासी रिटायर्ड प्रिंसिपल कमलेश बत्रा, सेक्टर-20 निवासी वाइस प्रिंसिपल शीतल गुप्ता, ढकोली निवासी यूट्यूबर और पाठशाला स्कूल की क्रिएटिव हेड कीर्ति, पाठशाला संस्था की चेयरपर्सन जीरकपुर निवासी ममता गुप्ता, इंश्योरेंस सेक्टर में लॉ ऑफिसर सेक्टर-20 निवासी छवि बत्रा और सेक्टर-20 फतेहपुर निवासी हाउस वाइफ सर्वेश शामिल रहीं।
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इस दुनिया को पैदा करने वाली ही नारी है। इसलिए उसके जन्म को ही गलत मानना विकृत मानसिकता को दर्शाता है। ऐसी सोच को समाज से बाहर करने के लिए बेहतर शिक्षा और अच्छे संस्कारों की जरूरत है। -शालू गुप्ता, चेयरपर्सन, प्रणाम इंडिया फाउंडेशन
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बेटी के प्रति नकारात्मक रवैया होने का मुख्य कारण असुरक्षा का माहौल है। इसके अलावा दहेज प्रथा के कारण भी लोग बेटी होने पर दुखी होते हैं। इसलिए इन दोनों मुद्दों पर काम किया जाना बेहद ही जरूरी है। - डिंपल रानी, अध्यापिका, निवासी, सेक्टर-2
घर में बेटी होने से संस्कारों का प्रवाह होता है। घर का बेटा भी दूसरी लड़कियों की इज्जत करना सीखता है। परिवार के लोगों में जिम्मेवारी का अहसास भी रहता है। वहीं उतनी ही जिम्मेवारी बेटी की भी परिवार के प्रति रहती है। - रेणू राठी, अध्यापिका, निवासी सेक्टर-14
बेटी होने पर भी बेटों की तरह ही खुशी मनानी चाहिए। मेरे पास दो बेटियां हैं। मैं उनसे बहुत प्यार करती हूं। पूरा परिवार ही उन पर जान छिड़कता है। बेटियों को भी बेटों की तरह काबिल बनाने के लिए अच्छी शिक्षा और संस्कार दिए जाने चाहिए। - छवि बत्रा, लॉ ऑफिसर, निवासी सेक्टर-20
पति घर या परिवार के बारे में कोई फैसला लेने से पहले अपनी पत्नी से सलाह मशविरा करे तो उनके बच्चों को यह मैसेज जाता है कि घर में उनकी मां की भी बराबरी की अहमियत है। इस बात का वे अपने जीवन में भी पालन करेंगे। - शीतल गुप्ता, वाइस प्रिंसिपल, निवासी सेक्टर-20
बेटा-बेटी में काई फर्क नहीं होता है। बच्चा कोई भी हो, वह स्वस्थ होना चाहिए। संयुक्त परिवार में बच्चों को और बेहतर माहौल मिलता है। उनकी परेशानी या उनकी संगत पर परिवार की नजर रहती है। - कमलेश बत्रा, रिटायर्ड प्रिंसिपल, निवासी सेक्टर-20