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विदेश से दायर अग्रिम जमानत याचिका पर अंतिम सुनवाई से पहले देश में होना जरूरी : हाईकोर्ट
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अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसले में यह स्पष्ट कर दिया कि अग्रिम जमानत याचिका विदेश में रहते हुए दाखिल की जा सकती है, लेकिन अंतिम सुनवाई से पहले याची का भारत में उपस्थित होना अनिवार्य है। ऐसा इसलिए ताकि अदालत जमानत की शर्तें लगा सके और उनका अनुपालन सुनिश्चित कर सके।
यह मामला मूल रूप से लुधियाना के रहने वाले एक पति की अग्रिम जमानत याचिका से जुड़ा था जिस पर विश्वासघात, धोखाधड़ी, दहेज प्रताड़ना और आपराधिक धमकी जैसे आरोपों के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। पत्नी की शिकायत के अनुसार दंपती कनाडा में रहते थे और याची पति ने दहेज की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित किया। याची के परिवार ने विवाह इस मंशा से किया था कि वे अपने बेटे को विदेश में बसा सकें, क्योंकि पत्नी पहले से कनाडा की स्थायी निवासी थी और इस प्रकार उन्होंने विवाह के नाम पर धोखाधड़ी की।
याची को सत्र न्यायालय ने जांच में शामिल होने का निर्देश दिया गया था, लेकिन उसने इसका पालन नहीं किया। इस कारण उसकी अग्रिम जमानत याचिका निचली अदालत ने खारिज कर दी। कोर्ट ने पाया कि याची ने कनाडा में रहते हुए याचिका दायर की थी और आज तक भारत में उसकी कोई उपस्थिति नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि कोई व्यक्ति जो विदेश में है, वह भारत की न्यायिक व्यवस्था को हल्के और असंवेदनशील दृष्टि से नहीं ले सकता कि निचली अदालत के आदेश के बावजूद वह जांच में शामिल नहीं हो।
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हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याची की यह लापरवाहीपूर्ण और टालमटोल वाली प्रवृत्ति प्रवासी भारतीयों के बीच गलत संदेश देगी कि भारत के प्रक्रिया-संबंधी कानूनों का पालन करना जरूरी नहीं है। याची जो कनाडा में रह रहा है, वह यह नहीं सोच सकता कि वह अपनी सुविधानुसार किसी भी ट्रेन पर सवार हो जाएगा और अदालतों के आदेशों की अवमानना करता रहेगा।
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चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसले में यह स्पष्ट कर दिया कि अग्रिम जमानत याचिका विदेश में रहते हुए दाखिल की जा सकती है, लेकिन अंतिम सुनवाई से पहले याची का भारत में उपस्थित होना अनिवार्य है। ऐसा इसलिए ताकि अदालत जमानत की शर्तें लगा सके और उनका अनुपालन सुनिश्चित कर सके।
यह मामला मूल रूप से लुधियाना के रहने वाले एक पति की अग्रिम जमानत याचिका से जुड़ा था जिस पर विश्वासघात, धोखाधड़ी, दहेज प्रताड़ना और आपराधिक धमकी जैसे आरोपों के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। पत्नी की शिकायत के अनुसार दंपती कनाडा में रहते थे और याची पति ने दहेज की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित किया। याची के परिवार ने विवाह इस मंशा से किया था कि वे अपने बेटे को विदेश में बसा सकें, क्योंकि पत्नी पहले से कनाडा की स्थायी निवासी थी और इस प्रकार उन्होंने विवाह के नाम पर धोखाधड़ी की।
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याची को सत्र न्यायालय ने जांच में शामिल होने का निर्देश दिया गया था, लेकिन उसने इसका पालन नहीं किया। इस कारण उसकी अग्रिम जमानत याचिका निचली अदालत ने खारिज कर दी। कोर्ट ने पाया कि याची ने कनाडा में रहते हुए याचिका दायर की थी और आज तक भारत में उसकी कोई उपस्थिति नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि कोई व्यक्ति जो विदेश में है, वह भारत की न्यायिक व्यवस्था को हल्के और असंवेदनशील दृष्टि से नहीं ले सकता कि निचली अदालत के आदेश के बावजूद वह जांच में शामिल नहीं हो।
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हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याची की यह लापरवाहीपूर्ण और टालमटोल वाली प्रवृत्ति प्रवासी भारतीयों के बीच गलत संदेश देगी कि भारत के प्रक्रिया-संबंधी कानूनों का पालन करना जरूरी नहीं है। याची जो कनाडा में रह रहा है, वह यह नहीं सोच सकता कि वह अपनी सुविधानुसार किसी भी ट्रेन पर सवार हो जाएगा और अदालतों के आदेशों की अवमानना करता रहेगा।