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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला: पीआरटीसी के आउटसोर्स कर्मचारी नहीं होंगे नियमित, एकल पीठ का आदेश पलटा
Thu, 10 Sep 2026 01:23 AM IST
चंडीगढ़ ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Thu, 10 Sep 2026 01:23 AM IST
सार
हाईकोर्ट ने पाया कि पीआरटीसी ने इन कर्मचारियों को कभी नियुक्ति पत्र जारी नहीं किया था। उन्हें निगम के अस्थायी या तदर्थ कर्मचारी के रूप में भी दर्ज नहीं किया गया था। कर्मचारियों का वेतन भी निजी एजेंसी के माध्यम से दिया जाता था। भविष्य निधि की राशि भी एजेंसी ही जमा करती थी।
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पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पीईपीएसयू रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (पीआरटीसी) में कार्यरत आउटसोर्स कर्मचारियों को नियमित करने का एकल पीठ का आदेश रद्द कर दिया है।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक निगम में काम करना या अधिकारियों के निर्देश पर ड्यूटी करना ही कर्मचारी होने का प्रमाण नहीं है। नियमितीकरण का दावा तभी किया जा सकता है जब कर्मचारी और सरकारी संस्था के बीच सीधा नियोक्ता-कर्मचारी संबंध साबित हो।
इन कर्मचारियों में चालक, कंडक्टर और अन्य कर्मचारी शामिल थे। इनकी नियुक्ति निजी एजेंसी एमएस एसएस सर्विस प्रोवाइडर्स ने की थी। एजेंसी ने चालकों, कंडक्टरों और अन्य पदों के लिए विज्ञापन जारी कर भर्ती की थी। चयनित कर्मचारियों को बाद में पीआरटीसी में ड्यूटी के लिए भेजा गया।
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हाईकोर्ट ने पाया कि पीआरटीसी ने इन कर्मचारियों को कभी नियुक्ति पत्र जारी नहीं किया था। उन्हें निगम के अस्थायी या तदर्थ कर्मचारी के रूप में भी दर्ज नहीं किया गया था। कर्मचारियों का वेतन भी निजी एजेंसी के माध्यम से दिया जाता था। भविष्य निधि की राशि भी एजेंसी ही जमा करती थी।
एकल पीठ का फैसला और अपीलें
मामले में एकल पीठ ने 22 अप्रैल 2026 को कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया था। एकल पीठ ने उनकी सेवाओं को पीआरटीसी में नियमित करने का निर्देश दिया था। साथ ही पात्र कर्मचारियों को पुरानी पेंशन योजना समेत अन्य लाभ देने पर भी विचार करने को कहा गया था। पीआरटीसी ने इस आदेश के खिलाफ चार अपीलें दायर की थीं। खंडपीठ ने इन अपीलों को स्वीकार करते हुए एकल पीठ का फैसला रद्द कर दिया।
खंडपीठ का स्पष्टीकरण
अदालत ने कहा कि आउटसोर्स कर्मचारियों को निर्धारित शर्तों के तहत संबंधित संस्था में वार्षिक अनुबंध पर रखने की व्यवस्था है। इस व्यवस्था से उन्हें स्वत: नियमित कर्मचारी का दर्जा नहीं मिल जाता। खंडपीठ ने दोहराया कि केवल इस आधार पर कि कर्मचारी लंबे समय से निगम के लिए काम कर रहे हैं, उन्हें निगम का कर्मचारी नहीं माना जा सकता। निगम के अधिकारियों के निर्देशन में अपनी ड्यूटी निभाना भी पर्याप्त नहीं है।
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खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक निगम में काम करना या अधिकारियों के निर्देश पर ड्यूटी करना ही कर्मचारी होने का प्रमाण नहीं है। नियमितीकरण का दावा तभी किया जा सकता है जब कर्मचारी और सरकारी संस्था के बीच सीधा नियोक्ता-कर्मचारी संबंध साबित हो।
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इन कर्मचारियों में चालक, कंडक्टर और अन्य कर्मचारी शामिल थे। इनकी नियुक्ति निजी एजेंसी एमएस एसएस सर्विस प्रोवाइडर्स ने की थी। एजेंसी ने चालकों, कंडक्टरों और अन्य पदों के लिए विज्ञापन जारी कर भर्ती की थी। चयनित कर्मचारियों को बाद में पीआरटीसी में ड्यूटी के लिए भेजा गया।
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हाईकोर्ट ने पाया कि पीआरटीसी ने इन कर्मचारियों को कभी नियुक्ति पत्र जारी नहीं किया था। उन्हें निगम के अस्थायी या तदर्थ कर्मचारी के रूप में भी दर्ज नहीं किया गया था। कर्मचारियों का वेतन भी निजी एजेंसी के माध्यम से दिया जाता था। भविष्य निधि की राशि भी एजेंसी ही जमा करती थी।
एकल पीठ का फैसला और अपीलें
मामले में एकल पीठ ने 22 अप्रैल 2026 को कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया था। एकल पीठ ने उनकी सेवाओं को पीआरटीसी में नियमित करने का निर्देश दिया था। साथ ही पात्र कर्मचारियों को पुरानी पेंशन योजना समेत अन्य लाभ देने पर भी विचार करने को कहा गया था। पीआरटीसी ने इस आदेश के खिलाफ चार अपीलें दायर की थीं। खंडपीठ ने इन अपीलों को स्वीकार करते हुए एकल पीठ का फैसला रद्द कर दिया।
खंडपीठ का स्पष्टीकरण
अदालत ने कहा कि आउटसोर्स कर्मचारियों को निर्धारित शर्तों के तहत संबंधित संस्था में वार्षिक अनुबंध पर रखने की व्यवस्था है। इस व्यवस्था से उन्हें स्वत: नियमित कर्मचारी का दर्जा नहीं मिल जाता। खंडपीठ ने दोहराया कि केवल इस आधार पर कि कर्मचारी लंबे समय से निगम के लिए काम कर रहे हैं, उन्हें निगम का कर्मचारी नहीं माना जा सकता। निगम के अधिकारियों के निर्देशन में अपनी ड्यूटी निभाना भी पर्याप्त नहीं है।