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Panchkula News: वर्षों से कस्टम गोदाम में अटकी सुपारी की खेप, हाईकोर्ट ने तत्काल छोड़ने का दिया आदेश
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चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने इंडोनेशिया से आयात की गई भुनी सुपारी की खेप को लेकर एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अदालत ने लुधियाना की कंपनी प्रेंडा क्रिएशंस प्राइवेट लिमिटेड की सुपारी खेप को निजी मुचलका जमा कराने के बाद तत्काल जारी करने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि जब सामान लंबे समय से कस्टम गोदाम में पड़ा हो तो उसे वर्षों तक रोकना उचित नहीं है।
खेप जारी होने के बाद भी सीमा शुल्क की देय राशि तय करने की कार्रवाई जारी रहेगी। यह मामला प्रेंडा क्रिएशंस प्राइवेट लिमिटेड की तीन याचिकाओं से जुड़ा है। कंपनी ने इंडोनेशिया से भुनी सुपारी आयात की थी। कंपनी नियमानुसार देय सीमा शुल्क अदा करने के लिए तैयार थी।
वर्गीकरण विवाद :
सीमा शुल्क अधिकारियों ने उत्पाद को भुनी सुपारी मानने से इन्कार किया। उन्होंने इसे सूखी सुपारी बताया। दोनों के वर्गीकरण के आधार पर शुल्क की दरें अलग-अलग थीं। इसी कारण यह विवाद खड़ा हो गया था। विवाद के चलते कंपनी की खेप नवंबर 2024 से कस्टम गोदाम में पड़ी हुई थी। कंपनी ने हाईकोर्ट से इसे जारी करने की मांग की थी।
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अदालत का तर्क :
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश अश्वनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। पीठ ने केंद्रीय राजस्व नियंत्रण प्रयोगशाला, नई दिल्ली की रिपोर्ट पर गौर किया। रिपोर्ट में सुपारी के बाहरी रूप के आधार पर राय दी गई थी कि नमूना भुनी सुपारी नहीं माना जा सकता। अदालत ने माना कि केवल बाहरी रूप देखकर सूखी सुपारी बताना उचित नहीं है। पीठ ने यह भी कहा कि नमी की मात्रा महत्वपूर्ण निर्धारक है। संबंधित खेपों में नमी की मात्रा तय सीमा के भीतर थी। कंपनी ने निजी प्रयोगशाला की रिपोर्ट भी अदालत में रखी थी, जिसमें खेपों को भुनी सुपारी बताया गया। अधिकारियों की ओर से इस दावे का प्रभावी खंडन नहीं किया गया।
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खेप जारी होने के बाद भी सीमा शुल्क की देय राशि तय करने की कार्रवाई जारी रहेगी। यह मामला प्रेंडा क्रिएशंस प्राइवेट लिमिटेड की तीन याचिकाओं से जुड़ा है। कंपनी ने इंडोनेशिया से भुनी सुपारी आयात की थी। कंपनी नियमानुसार देय सीमा शुल्क अदा करने के लिए तैयार थी।
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वर्गीकरण विवाद :
सीमा शुल्क अधिकारियों ने उत्पाद को भुनी सुपारी मानने से इन्कार किया। उन्होंने इसे सूखी सुपारी बताया। दोनों के वर्गीकरण के आधार पर शुल्क की दरें अलग-अलग थीं। इसी कारण यह विवाद खड़ा हो गया था। विवाद के चलते कंपनी की खेप नवंबर 2024 से कस्टम गोदाम में पड़ी हुई थी। कंपनी ने हाईकोर्ट से इसे जारी करने की मांग की थी।
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अदालत का तर्क :
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश अश्वनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई की। पीठ ने केंद्रीय राजस्व नियंत्रण प्रयोगशाला, नई दिल्ली की रिपोर्ट पर गौर किया। रिपोर्ट में सुपारी के बाहरी रूप के आधार पर राय दी गई थी कि नमूना भुनी सुपारी नहीं माना जा सकता। अदालत ने माना कि केवल बाहरी रूप देखकर सूखी सुपारी बताना उचित नहीं है। पीठ ने यह भी कहा कि नमी की मात्रा महत्वपूर्ण निर्धारक है। संबंधित खेपों में नमी की मात्रा तय सीमा के भीतर थी। कंपनी ने निजी प्रयोगशाला की रिपोर्ट भी अदालत में रखी थी, जिसमें खेपों को भुनी सुपारी बताया गया। अधिकारियों की ओर से इस दावे का प्रभावी खंडन नहीं किया गया।