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इस तरह समझे आपका चंडीगढ़ क्यों नहीं बन पाया इंदौर

Fri, 08 Mar 2019 01:38 AM IST
Panchkula bureau Panchkula bureau
Updated Fri, 08 Mar 2019 01:38 AM IST
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इस तरह समझे आपका चंडीगढ़ क्यों नहीं बन पाया इंदौर
इसलिए इंदौर से मीलों पीछे छूटा चंडीगढ़
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-इंदौर ने अपने डंपिंग यार्ड को ऐसा बनाया कि वहां पर खाना भी खाया जा सकता है, चंडीगढ़ का डंपिंग ग्राउंड बना है नरक
-साल 2015 में इंदौर स्वच्छता रैकिंग में 149वे नंबर पर था, लेकिन पिछले तीन साल से बना है नंबर वन

आशीष वर्मा
चंडीगढ़। स्वच्छता सर्वेक्षण में चंडीगढ़ तीसरे नंबर से खिसककर 20वें नंबर पर पहुंच गया है। गिरती रैकिंग चंडीगढ़ प्रशासन, नगर निगम, पार्षद और सांसद की कार्यप्रणाली पर सवाल तो खड़ी करती है साथ ही साफ सफाई और कचरे के निपटान पर नगर निगम की नीति, निगरानी और लोगों के भागीदारी की पोल खोलती है। वहीं दूसरी तरफ इंदौर ने हैट्रिक मारी है। साल 2015 में इंदौर स्वच्छता रैकिंग में 149वें नंबर पर था। इसके बाद उस शहर के अधिकारियों और लोगों ने ऐसा जुनून और जज्बा दिखाया कि फिर मुड़ कर कभी पीछे नहीं देखा। इंदौर ने जो करके दिखाया, वह चंडीगढ़ क्यों नहीं कर पाया? आइए एक नजर डालते हैं इंदौर के हौसले पर और चंडीगढ़ की खामियों पर।

1.इंदौर में घर से ही गीला सूखा कचरा अलग
स्वच्छता सर्वेक्षण में सोर्श सेग्रिगेशन काफी मायने रखता है। यानी घर से जो कूड़ा निकलता है उसे घर से ही अलग अलग कर लिया जाए। इंदौर में महिलाएं अपने घर से ही गीला सूखा कचरे को अलग करती हैं। इसके लिए नगर निगम की ओर से व्यापक जागरूकता अभियान भी चलाया गया। नगर निगम की ओर से सस्ती दरों पर डस्टबिन मुहैया करवाए जाते हैं। यहां कारों के लिए भी छोटे डस्टबिन उपलब्ध कराएं हैं, ताकि चिप्स, चॉकलेट व अन्य कचरे को उसी में फेंका जाए। यह व्यवस्था 100 प्रतिशत घरों पर लागू है। इससे फाइव रेटिंग मिलती है।
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चंडीगढ़ में क्या स्थिति है
नगर निगम पिछले दो साल से सूखे और गीले कचरे को अलग करने के लिए कोशिश कर रहा है। पिछले साल तय भी हो गया था कि दो अक्तूबर से कचरे को अलग अलग करने की नीति लागू कर दी जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। शहरवासियों को करोड़ों रुपए के डस्टबिन मुफ्त में बांट दिए गए, जबकि इंदौर ने किफायती दरों में बांटे। लोगों को जागरूक नहीं किया गया। कमजोर नीति और लचर व्यवस्था से योजना फ्लाप हो गई। दूसरी तरफ डेढ़ करोड़ के डस्टबिन कहां गए, किसी को नहीं पता।
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2. इंदौर में गीले कचरे से घर पर ही खाद
सोर्श सेग्रिगेशन के बाद बारी आती है कचरे के निपटान की। इसमें भी इंदौर ने बाजी मारी है। इस शहर में गीले कचर से जैविक खाद बनाई जाती है। 29 हजार घरों में होम कंपोस्ट तैयार किया जाता है। बगीचों के कचरे से भी खाद बनाकर बेची जाती है। फल सब्जी मंडी के कचरे से गैस बनाई जाती है। वहां के कई मंदिर ऐसे हैं, जहां श्रद्धालु भारी संख्या में पहुंचते हैं। मंदिर में चढ़ने वाले फूल मालाओं को फेंका नहीं जाता, बल्कि खाद तैयार होती है। शहर के प्रसिद्ध रणजीत हनुमान मंदिर में हर सप्ताह 80 से 100 किलो खाद तैयार की जाती है। सूखे कचरे का निपटान अच्छी तरह से होता है। प्लास्टिक के कचरे रीसाइक्लिंग के लिए दो प्लांट बनाए गए हैं।

चंडीगढ़ की स्थिति
चंडीगढ़ में फिलहाल इस तरह की कोई व्यवस्था नहीं है। गीले कचरे को डंपिंग ग्राउंड में ले जाया जाता है। शहर में कई टन गीला कचरा निकलता है। यदि यहां ऐसी व्यवस्था की जाए तो कई टन खाद बनाई जा सकती है। इंदौर अपने कचरे से हर साल 27 करोड़ रुपए कमाता है। पर्यावरणविद राहुल महाजन का कहना है कि यहां पर आसानी से खाद बनाई जा सकती है। चंडीगढ़ में क्षमता भी है, लेकिन यहां पर इस तरह के कदम नहीं उठाए जाते। बातें सिर्फ फाइलों में ही दब कर रह जाती हैं। प्लास्टिक और भवन निर्माण के वेस्ट की बात तो काफी दूर की है।

3.इंदौर ने डंपिंग यार्ड को ऐसा बनाया कि वहां पर खाना खा सकते हैं
इंदौर ने असल बाजी अपने डंपिंग यार्ड को सुधारने में मारी हैं। वहां पर इसे ट्रेंचिंग ग्राउंड कहा जाता है। डेढ़ से दो साल पहले स्थिति यह थी कि उसके सामने से गुजर नहीं सकते। यदि जाना हो तो नाक मुंह पर कपड़ा बांधकर निकलना पड़ता था। यहां भी कचरे के पहाड़ बने थे, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। वहां पर करीब 12 लाख टन कचरे को खत्म कर दिया गया। 146 एकड़ में फैले ट्रेंचिंग ग्राउंड पर शहर से हर दिन निकलने वाले 1100 टन कचरे का प्रबंधन बेहतर तरीके से किया जा रहा है। 16 से 18 मशीने लगाने के साथ इसे मैन्युअल काम करवाकर कचरा साफ किया गया। उसके बाद वहां पर 50 हजार से ज्यादा फलदार पौधे लगाए गए। अब वहां पर स्थिति ऐसी है कि वहां पर जाकर आप खान भी खा सकते हैं।

चंडीगढ़ में क्या स्थिति है
डड्डूमाजरा स्थित डंपिंग ग्राउंड की हालत किसी से छिपी नहीं है। यहां पर करीब पांच टन कचरा जमा है, जो करीब 30 फुट की ऊंचाई की शक्ल में दिखते हैं। यहां पर रोड से करीब 16 फीट गहरे खड्डे थे। उन्हें कूड़े के ढेर से भर दिए गए हैं। बदबू का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि यदि हवा का रुख डड्डूमाजरा से सेक्टर- 25 की ओर हो तो रैली ग्राउंड पर खड़ा मुश्किल होता है। आसपास के लोग किस तरह का जीवन बिता रहे होंगे, इसे समझा जा सकता है। कूड़े को पहाड़ को खत्म करने का मुद्दा कई बार उठा है। पिछले दिनों का कहा गया कि पहाड़ को खत्म करने का प्रोजेक्ट स्मार्ट सिटी के तहत दिया जाएगा। लेकिन अब तक इस दिशा में कुछ खास काम नहीं हुआ है।

4. इंदौर में आयोजन भी कचरामुक्त होते हैं

हैट्रिक में जनता और सोसाइटी की अहम भूमिका रही। इंदौर में प्रकाश पर्व निकलने वाला कीर्तन हो या बोहरा समाज का मोहर्रम का आयोजन। इन आयोजन में सड़क या आयोजन स्थल के आसपास एक भी कूड़े का तिनका नहीं मिलेगा। मोहर्रम में श्रद्धालुओं के लिए रोजाना आठ हजार किलो खाना बनाया जाता था। इस दौरान करीब एक टन कचरा भी निकलता था। इससे निपटने के लिए आयोजन स्थल में प्लांट बनाया गया है। करीब आधा टन रोजाना खाद तैयार की गई। करीब दस दिन चला आयोजन जब खत्म हुआ तो समाज के सभी लोग इकट्ठा हुए और पूरे स्थल की साफ सफाई कर सारा कूड़ा नगर निगम को सौंप दिया। ये तो एक उदाहरण हैं, इस शहर में तो ऐसे हजारों उदाहरण हैं।


चंडीगढ़ की स्थिति
यहां पर बिल्कुल उल्टी स्थिति है। नगर निगम चाहे तो आरडब्ल्यूए और समाजसेवी संस्थाओं के साथ मिलकर काम कर सकते हैं। स्वच्छता सर्वेक्षण में नगर निगम ने आरडब्ल्यूए को शामिल नहीं किया। आरडब्ल्यूए ने आरोप लगाया है कि निगम कुछ चुनिंदा लोगों को बुलाकर मीटिंग करते हैं। यहां पर कोई भी आयोजन हो, उसकी समाप्ति पर किसी तरह की जागरूकता नहीं दिखाई पड़ती है। पिछली बार देखा भी गया था कि छठ पूजा के बाद सेक्टर- 42 लेक पर कूड़े के ढेर पड़े थे। बाद में कुछ युवाओं ने वहां से कूड़ा इकट्ठा किया और नगर निगम को भिजवाया।

इंदौर की ये बातें भी ध्यान खींचती हैं

-सफाई के मुद्दे पर इंदौर की मेयर मालिनी गौड़ ने एक साल में 1800 बैठके कीं।
-बाजारों को डिस्पोजल मुक्त बनाने के लिए अभियान चलाया।
-सिंगल यूज प्लास्टिक कैरी बैग और प्लास्टिक को प्रतिबंधित किया।
-दिन हो या रात। सफाई कर्मचारियों पर निरंतर निगरानी और सख्ती।
-सड़क पर कचरा फेंकने वालों पर सौ रुपए से लेकर एक लाख तक का जुर्माना।
-आधुनिक मशीनों से सफाई। एक दिन में 150 किमी तक सफाई करने वाली मशीन इंदौर में है।
-कचरा गाड़ियों की मॉनिटरिंग के लिए 11 स्क्रीन से लैस जीपीएस व कंट्रोल रूम बनाया है।
-पालतू कुत्ते के शौच कराने पर 500 रुपए से लेकर एक हजार रुपए तक के चालान किए जाते हैं।
-सार्वजनिक जगहों पर थूकने पर रोजाना 200-250 लोगों के चालान किए जाते हैं।
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