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तेरे बिन सानू सोणेया कोई होर नैयो लबना...
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तेरे बिन सानूं सोणेयां कोई होर नइयों लबणां..
-टैगोर थियेटर में जीवें पंजाब कार्यक्रम के दौरान रब्बी गिल के गीतों पर मस्त हुए दर्शक
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। तेरे बिन सानूं सोणेयां कोई होर नइयों लबणां..चंडीगढ़ टैगोर थिएटर के मंच पर जैसे ही रब्बी शेरगिल का यह गीत गूंजा श्रोता मस्ती में झूम उठे। चंडीगढ़ के टैगोर थिएटर में जीवें पंजाब कार्यक्रम के दौरान रब्बी शेरगिल ने ऐसा जलवा दिखाया कि सभी मस्त हो गए। उन्होंने गल समझदी..इक कुड़ी..जिदा नां मोहब्बत.. गाकर समा बांध दिया। उसके बाद उन्होंने नी बिल्लो गीत सुनाया। उनके पहले तनवीर सिंह, अमन धालीवाल, सुमीत कौर ढिल्लो और गुरमन विर्दी ने लोक गायिकी से सभी को अपना मुरीद बनाया। अमन धालीवाल ने यहां मेरी जुगनी दे धागे बग्गे सुनाया। उसके बाद उन्होंने मेरे सौंरयां ने जिद जिद.. गीत सुनाया। मनजिंदर सिंह ने मेरी राहां ते किलडे़ राही मेरे दोस्त... सुनाया। इसके बाद सुमीत कौर ने मिट्टी दा बावा, फुल्लावरगी देना कुड़ियों...बड्डा तो कूली चन्ना सुनाया। इस कार्यक्रम के दौरान चंडीगढ़ के टैगोर थिएटर में करीब पांच सौ लोगों की आडियंस ने पंजाबी लोक गीतों का आनंद लिया। यहां पर रबाब पर लवजोत सिंह, सारंगी पर आदिल, तबले पर रतन सिंह, दिलरूबा पर गंगा सिंह और बांसुरी पर मोहित ने गायकों का साथ दिया।
सूफी संगीत की बात ही निराली है : रब्बी शेरगिल
सूफी संगीत संस्कृति से जुड़ा है। वास्तव में सूफी संगीत को बचाना है तो अपनी धरोहर को बचाना होगा। मेरी कोशिश भी यही रहती है कि मैं पंजाबी को प्रमोट करूं। मुझे जहां भी मौका मिलता है उसका लाभ जरूर लेता हूं। यह कहना है प्रसिद्ध गायक रब्बी शेरगिल का। रब्बी शेरगिल ने कहा कि अब आप ही देखिए उड़ीसा के लोग उड़ीसा की संस्कृति को बचाने में लगे हैं वहीं दूसरी ओर असम के लोग असम को, फिर हम क्यों पीछे रहें। सूफी संगीत की बात करें तो बाबा बुल्लेशाह और संत कबीर का नाम आता है। मैं अपनी गायिकी में इनके गीतों को ही गाता हूं। मेरी निरंजनी संगीत पर आस्था है और यह मुझको सुकून भी देता है। वास्तव में सूफी संगीत को बचाना इस वजह से भी आवश्यक है क्योंकि यह साहित्य से रचा गया है।
पंजाब को दर्शाती प्रदर्शनी लगी
जीवें पंजाब कार्यक्रम के दौरान फाइन आर्ट्स कॉलेज के मनप्रीत सिंह खालसा की पंजाब को दर्शाती फोटोग्राफ की प्रदर्शनी लगाई गई। टैगोर के मुख्य ऑडिटोरियम की इंट्री पर लगाई गई इस प्रदर्शनी ने सभी का मन मोह लिया। इस प्रदर्शनी में 13 फोटोग्राफ्स लगाई गईं थीं।
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लोकगायिकों को करना है प्रमोट
जीवें पंजाब के संस्थापक कुमार सौरभ ने बताया कि उनका उद्देश्य पंजाबी और लोकगायिकी को प्रमोट करना है। यही पंजाब की संस्कृति है और उसका प्रचार प्रसार जरूरी है। इसी वजह से वह लोकगायिकी के नए गायकों को ऐसे कार्यक्रम में लेकर आते हैं।
फोटो सहित
पंजाबी फोक में युवाओं की रुचि
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाबी लोक गीतों का अब प्रचार प्रसार तेजी के साथ हो रहा है। अच्छी बात यह है कि इसमें पंजाब के युवाओं की जबरदस्त इंट्री हो चुकी है। ऐसे ही युवाओं से चंडीगढ़ के टैगोर थिएटर में आयोजित कार्यक्रम जीवें पंजाब में मुलाकात हुई।
पंजाब के लोक गीतों को गाने वाले गुरमन विर्दी ने कहा कि वास्तव में पंजाबी लोक गीत तो हैं पर नए गीतों को नहीं रचा जा रहा है। उन्होंने कहा कि इसकी प्रमुख वजह है कि पहले हमारे आसपास का जो माहौल होता था वही गीतों में ढल जाता था। अब ऐसा नहीं रह गया है।
अमन धालीवाल ने कहा कि पंजाब के ग्रामीण इलाकों से निकलकर लोक गायिका विदेशों तक पहुंच चुकी है। हां, यह जरूर है कि नई रचनाएं उस स्तर पर नहीं हो रही हैं। ग्रामीण परिवेश कहें या फिर रहन सहन का स्तर अब बदल चुका है। जिसकी वजह से ऐसी रचनाएं नहीं होती हैं।
मनिंदर सिंह ने कहा कि उनको बचपन से ही गायिकी का शौक है। उन्होंने लोक गायिकी अपने घर से ही शुरू की थी। स्कूलों के लेवल पर गाते थे और उसके बाद कॉलेज में भी गाया। अब मंच पर आ गए। उन्होंने कहा कि वास्तव में पंजाबी लोक गायिकी की बात निराली है। चमक धमक सभी को आकर्षित करती है जिससे लोक संगीत का प्रचार प्रसार कम हो रहा है।
पंजाब की रहने वाली सुमीत ने कहा कि पंजाबी लोक गीतों की बात ही अलग है। उन्होंने अपने घर से ही उसकी शुरुआत की थी और धीरे धीरे यह शौक में बदल गया। अब यह पैशन बन चुका है। उन्होंने कहा कि पंजाबी लोक गायिकी में भी थोेड़ा कामर्शियलाइजेशन हो जाए तो शायद इसका प्रचार प्रसार कुछ ज्यादा हो।
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-टैगोर थियेटर में जीवें पंजाब कार्यक्रम के दौरान रब्बी गिल के गीतों पर मस्त हुए दर्शक
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। तेरे बिन सानूं सोणेयां कोई होर नइयों लबणां..चंडीगढ़ टैगोर थिएटर के मंच पर जैसे ही रब्बी शेरगिल का यह गीत गूंजा श्रोता मस्ती में झूम उठे। चंडीगढ़ के टैगोर थिएटर में जीवें पंजाब कार्यक्रम के दौरान रब्बी शेरगिल ने ऐसा जलवा दिखाया कि सभी मस्त हो गए। उन्होंने गल समझदी..इक कुड़ी..जिदा नां मोहब्बत.. गाकर समा बांध दिया। उसके बाद उन्होंने नी बिल्लो गीत सुनाया। उनके पहले तनवीर सिंह, अमन धालीवाल, सुमीत कौर ढिल्लो और गुरमन विर्दी ने लोक गायिकी से सभी को अपना मुरीद बनाया। अमन धालीवाल ने यहां मेरी जुगनी दे धागे बग्गे सुनाया। उसके बाद उन्होंने मेरे सौंरयां ने जिद जिद.. गीत सुनाया। मनजिंदर सिंह ने मेरी राहां ते किलडे़ राही मेरे दोस्त... सुनाया। इसके बाद सुमीत कौर ने मिट्टी दा बावा, फुल्लावरगी देना कुड़ियों...बड्डा तो कूली चन्ना सुनाया। इस कार्यक्रम के दौरान चंडीगढ़ के टैगोर थिएटर में करीब पांच सौ लोगों की आडियंस ने पंजाबी लोक गीतों का आनंद लिया। यहां पर रबाब पर लवजोत सिंह, सारंगी पर आदिल, तबले पर रतन सिंह, दिलरूबा पर गंगा सिंह और बांसुरी पर मोहित ने गायकों का साथ दिया।
सूफी संगीत की बात ही निराली है : रब्बी शेरगिल
सूफी संगीत संस्कृति से जुड़ा है। वास्तव में सूफी संगीत को बचाना है तो अपनी धरोहर को बचाना होगा। मेरी कोशिश भी यही रहती है कि मैं पंजाबी को प्रमोट करूं। मुझे जहां भी मौका मिलता है उसका लाभ जरूर लेता हूं। यह कहना है प्रसिद्ध गायक रब्बी शेरगिल का। रब्बी शेरगिल ने कहा कि अब आप ही देखिए उड़ीसा के लोग उड़ीसा की संस्कृति को बचाने में लगे हैं वहीं दूसरी ओर असम के लोग असम को, फिर हम क्यों पीछे रहें। सूफी संगीत की बात करें तो बाबा बुल्लेशाह और संत कबीर का नाम आता है। मैं अपनी गायिकी में इनके गीतों को ही गाता हूं। मेरी निरंजनी संगीत पर आस्था है और यह मुझको सुकून भी देता है। वास्तव में सूफी संगीत को बचाना इस वजह से भी आवश्यक है क्योंकि यह साहित्य से रचा गया है।
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पंजाब को दर्शाती प्रदर्शनी लगी
जीवें पंजाब कार्यक्रम के दौरान फाइन आर्ट्स कॉलेज के मनप्रीत सिंह खालसा की पंजाब को दर्शाती फोटोग्राफ की प्रदर्शनी लगाई गई। टैगोर के मुख्य ऑडिटोरियम की इंट्री पर लगाई गई इस प्रदर्शनी ने सभी का मन मोह लिया। इस प्रदर्शनी में 13 फोटोग्राफ्स लगाई गईं थीं।
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लोकगायिकों को करना है प्रमोट
जीवें पंजाब के संस्थापक कुमार सौरभ ने बताया कि उनका उद्देश्य पंजाबी और लोकगायिकी को प्रमोट करना है। यही पंजाब की संस्कृति है और उसका प्रचार प्रसार जरूरी है। इसी वजह से वह लोकगायिकी के नए गायकों को ऐसे कार्यक्रम में लेकर आते हैं।
फोटो सहित
पंजाबी फोक में युवाओं की रुचि
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाबी लोक गीतों का अब प्रचार प्रसार तेजी के साथ हो रहा है। अच्छी बात यह है कि इसमें पंजाब के युवाओं की जबरदस्त इंट्री हो चुकी है। ऐसे ही युवाओं से चंडीगढ़ के टैगोर थिएटर में आयोजित कार्यक्रम जीवें पंजाब में मुलाकात हुई।
पंजाब के लोक गीतों को गाने वाले गुरमन विर्दी ने कहा कि वास्तव में पंजाबी लोक गीत तो हैं पर नए गीतों को नहीं रचा जा रहा है। उन्होंने कहा कि इसकी प्रमुख वजह है कि पहले हमारे आसपास का जो माहौल होता था वही गीतों में ढल जाता था। अब ऐसा नहीं रह गया है।
अमन धालीवाल ने कहा कि पंजाब के ग्रामीण इलाकों से निकलकर लोक गायिका विदेशों तक पहुंच चुकी है। हां, यह जरूर है कि नई रचनाएं उस स्तर पर नहीं हो रही हैं। ग्रामीण परिवेश कहें या फिर रहन सहन का स्तर अब बदल चुका है। जिसकी वजह से ऐसी रचनाएं नहीं होती हैं।
मनिंदर सिंह ने कहा कि उनको बचपन से ही गायिकी का शौक है। उन्होंने लोक गायिकी अपने घर से ही शुरू की थी। स्कूलों के लेवल पर गाते थे और उसके बाद कॉलेज में भी गाया। अब मंच पर आ गए। उन्होंने कहा कि वास्तव में पंजाबी लोक गायिकी की बात निराली है। चमक धमक सभी को आकर्षित करती है जिससे लोक संगीत का प्रचार प्रसार कम हो रहा है।
पंजाब की रहने वाली सुमीत ने कहा कि पंजाबी लोक गीतों की बात ही अलग है। उन्होंने अपने घर से ही उसकी शुरुआत की थी और धीरे धीरे यह शौक में बदल गया। अब यह पैशन बन चुका है। उन्होंने कहा कि पंजाबी लोक गायिकी में भी थोेड़ा कामर्शियलाइजेशन हो जाए तो शायद इसका प्रचार प्रसार कुछ ज्यादा हो।