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पीजीआई में बांबे ब्लड ग्रुप का पेशेंट, मुंबई से हवाई रास्ते पहुंचा
Updated Sun, 08 Jul 2018 01:33 AM IST
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हवाई जहाज से मुंबई से आया रेयर ग्रुप का ब्लड, बची मरीज की जान
सबहेड
पीजीआई में भर्ती है बांबे ब्लड ग्रुप का पेशेंट, चंडीगढ़ के ब्लड वालंटियर्स के प्रयास से मिली राहत
पुणे के डोनर ने दिया ब्लड, एक लाख लोगों में से एक में होता है बांबे ब्लड ग्रुप
आशीष वर्मा
चंडीगढ़। पीजीआई में भर्ती देविंदर के परिजनों की सांसें उस समय फूल गईं, जब उन्हें पता चला कि उनके मरीज का ऐसा ब्लड ग्रुप है, जो एक लाख में से केवल एक व्यक्ति में ही मिलता है। पीजीआई ने जांच कर बताया कि उनके मरीज का ब्ल्ड ग्रुप बांबे है, जो आमतौर पर मिलता नहीं। जब इसकी जानकारी शहर के ब्लड वालंटियर्स को हुई तो उन्होंने अपने साथ जुड़े देश के सभी ग्रुपों में मैसेज वायरल कर दिया। तीन दिन बाद पता चला कि मुंबई में मैचिंग ब्लड ग्रुप का एक डोनर है। मुंबई के ब्लड वालंटियर्स की मदद से डोनर रक्तदान के लिए तैयार हो गया और मुंबई से हवाई जहाज के जरिए ब्लड भेजा गया और मरीज को चढ़ाया गया। फिलहाल मरीज की हालत खतरे से बाहर बताई जा रही है।
सोशल मीडिया से संपर्क हुआ, पुणे के युवक ने किया रक्तदान
ब्लड वालंटियर सतीश सचदेवा ने बताया कि उन्हें 27 को पता चला कि पीजीआई में दाखिल एक पेशेंट बांबे ब्लड ग्रुप का है और उसे ब्लड चाहिए। वे पीजीआई पहुंचे और मरीज की डिटेल लेकर अपने सभी ग्रुप में मैसेज वायरल कर दिया। ब्लड वालंटियर होने के नाते वह पूरे देश के वालंटियर्स के संपर्क में रहते हैं। ऐसे ही उनके संपर्क में मुंबई के वालंटियर्स विक्रम यादव हैं। सतीश ने उन्हें मैसेज भेजा और कुछ समय बाद उन्हें पुणे में बांबे ब्लड ग्रुप का डोनर मिल गया। डोनर को बांद्रा बुलाकर रक्तदान कराया गया और ब्लड को फ्लाइट से चंडीगढ़ भेजा गया। सतीश ने कहा कि हमने डोनर से संपर्क करने की कोशिश की मगर उन्होंने नाम व फोटो प्रकाशित करने से मना कर दिया।
इन लोगों की मदद से ब्लड का हुआ इंतजाम
कुछ लोगों में रक्तदान का ऐसा जुनून है कि वे किसी भी हद को पार कर सकते हैं। इस केस में भी ऐसे लोगों ने ही मदद की। इनमें मुख्य रूप से सतीश सचदेवा, अमित स्वामी, सागर पंडित, गगन अरोड़ा, सचिन सिंगला, चिंटू और कालू त्यागी शामिल हैं। जिन्होंने 27 जून से लेकर एक जुलाई तक रक्त का इंतजाम करने के लिए दिन रात एक कर दिया। इसमें काफी अहम सहयोग ब्लड वालंटियर्स राकेश संगर का भी है, जो लोगों को रक्तदान के लिए मोटीवेट करते हैं।
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मुंबई में खोज हुई थी इस ब्लड ग्रुप की
बताया गया कि साल 1952 में बंबई (अब मुंबई) में डॉक्टर एमआर भेंडे ने इस ब्लड ग्रुप का पता लगाया था। दूसरे रक्त समूहों में ऐंटिजन-एच होते हैं, जबकि बांबे में ऐंटिजन नहीं पाए जाते। इन्हें एचएच ग्रुप भी कहा जाता है। बांबे ग्रुप के किसी व्यक्ति में इसी ग्रुप का खून चढ़ाया जा सकता है। हालांकि बांबे ग्रुप वाले ए, बी, ओ ग्रुप के लोगों को भी रक्तदान कर सकते हैं। मगर सामान्य प्रैक्टिस में यह होता नहीं। एक जानकारी के मुताबिक भारत में 170-180 लोग बांबे ब्लड ग्रुप के लोग हैं।
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पुणे के डोनर ने दिया ब्लड, एक लाख लोगों में से एक में होता है बांबे ब्लड ग्रुप
आशीष वर्मा
चंडीगढ़। पीजीआई में भर्ती देविंदर के परिजनों की सांसें उस समय फूल गईं, जब उन्हें पता चला कि उनके मरीज का ऐसा ब्लड ग्रुप है, जो एक लाख में से केवल एक व्यक्ति में ही मिलता है। पीजीआई ने जांच कर बताया कि उनके मरीज का ब्ल्ड ग्रुप बांबे है, जो आमतौर पर मिलता नहीं। जब इसकी जानकारी शहर के ब्लड वालंटियर्स को हुई तो उन्होंने अपने साथ जुड़े देश के सभी ग्रुपों में मैसेज वायरल कर दिया। तीन दिन बाद पता चला कि मुंबई में मैचिंग ब्लड ग्रुप का एक डोनर है। मुंबई के ब्लड वालंटियर्स की मदद से डोनर रक्तदान के लिए तैयार हो गया और मुंबई से हवाई जहाज के जरिए ब्लड भेजा गया और मरीज को चढ़ाया गया। फिलहाल मरीज की हालत खतरे से बाहर बताई जा रही है।
सोशल मीडिया से संपर्क हुआ, पुणे के युवक ने किया रक्तदान
ब्लड वालंटियर सतीश सचदेवा ने बताया कि उन्हें 27 को पता चला कि पीजीआई में दाखिल एक पेशेंट बांबे ब्लड ग्रुप का है और उसे ब्लड चाहिए। वे पीजीआई पहुंचे और मरीज की डिटेल लेकर अपने सभी ग्रुप में मैसेज वायरल कर दिया। ब्लड वालंटियर होने के नाते वह पूरे देश के वालंटियर्स के संपर्क में रहते हैं। ऐसे ही उनके संपर्क में मुंबई के वालंटियर्स विक्रम यादव हैं। सतीश ने उन्हें मैसेज भेजा और कुछ समय बाद उन्हें पुणे में बांबे ब्लड ग्रुप का डोनर मिल गया। डोनर को बांद्रा बुलाकर रक्तदान कराया गया और ब्लड को फ्लाइट से चंडीगढ़ भेजा गया। सतीश ने कहा कि हमने डोनर से संपर्क करने की कोशिश की मगर उन्होंने नाम व फोटो प्रकाशित करने से मना कर दिया।
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इन लोगों की मदद से ब्लड का हुआ इंतजाम
कुछ लोगों में रक्तदान का ऐसा जुनून है कि वे किसी भी हद को पार कर सकते हैं। इस केस में भी ऐसे लोगों ने ही मदद की। इनमें मुख्य रूप से सतीश सचदेवा, अमित स्वामी, सागर पंडित, गगन अरोड़ा, सचिन सिंगला, चिंटू और कालू त्यागी शामिल हैं। जिन्होंने 27 जून से लेकर एक जुलाई तक रक्त का इंतजाम करने के लिए दिन रात एक कर दिया। इसमें काफी अहम सहयोग ब्लड वालंटियर्स राकेश संगर का भी है, जो लोगों को रक्तदान के लिए मोटीवेट करते हैं।
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मुंबई में खोज हुई थी इस ब्लड ग्रुप की
बताया गया कि साल 1952 में बंबई (अब मुंबई) में डॉक्टर एमआर भेंडे ने इस ब्लड ग्रुप का पता लगाया था। दूसरे रक्त समूहों में ऐंटिजन-एच होते हैं, जबकि बांबे में ऐंटिजन नहीं पाए जाते। इन्हें एचएच ग्रुप भी कहा जाता है। बांबे ग्रुप के किसी व्यक्ति में इसी ग्रुप का खून चढ़ाया जा सकता है। हालांकि बांबे ग्रुप वाले ए, बी, ओ ग्रुप के लोगों को भी रक्तदान कर सकते हैं। मगर सामान्य प्रैक्टिस में यह होता नहीं। एक जानकारी के मुताबिक भारत में 170-180 लोग बांबे ब्लड ग्रुप के लोग हैं।