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सामाजिक सौहार्द का परिचायक बन रहा किसान आंदोलन
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नमाज अदा करते मुस्लिम
- फोटो : Palwal
सामाजिक सौहार्द का परिचायक बन रहा आंदोलन
प्रवीण बैंसला
पलवल। नए कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे किसान आंदोलन सामाजिक सौहार्द का परिचायक बन रहा है। जाति, धर्म और क्षेत्र से ऊपर उठकर किसान एक मंच पर संगठित होकर अनेकता में एकता का उदाहरण दे रहे हैं। धरने पर किसान एक-दूसरे के धर्मों का भरपूर सम्मान कर रहे हैं। वहीं, किसानों की सामूहिक संस्कृतियां भी नजर आ रही हैं। धरने पर सुबह गुरुवाणी के साथ दोपहर को नमाज पढ़ी जाती है। वहीं, शाम को भजन-कीर्तन होते हैं। सभी धर्मों के लोग साथ में बैठकर लंगर छकते हैं और आंदोलन के संबंध में रणनीतियां तैयार करते हैं।
दो दिसंबर को मध्य प्रदेश से सिख समुदाय के किसान दिल्ली जा रहे थे। पुलिस ने रोका तो वहीं पर धरना शुरू कर दिया। दूसरे दिन बुंदेलखंड के हिंदू समुदाय के लोग धरने में पहुंच गए। इसके बाद क्षेत्रीय किसानों ने धरने को समर्थन देना शुरू कर दिया। पूरे देश के राज्यों से विभिन्न जातियों और धर्मों के लोग धरने के समर्थन में पहुंचने लगे। आंदोलन आगे बढ़ा तो मेवात से मुस्लिम समाज के लोग भी धरने को समर्थन देने पहुंच गए। पूरे देश का किसान संगठित हुआ तो विभिन्न धर्मों की सामूहिक संस्कृति भी धरने पर नजर आने लगी। सुबह और शाम सिख समुदाय के लोग गुरुवाणी का पाठ करते हैं। दोपहर के समय धरने में आए मुस्लिम समाज के लोग नमाज अदा करते हैं। बीच-बीच में हिंदू समाज द्वारा आई महिलाएं ब्रज के भजन प्रस्तुत करती हैं। इस दौरान सभी किसान एक-दूसरे के धार्मिक आयोजन को पूरा सम्मान देते हैं।
रचनाएं पेश कर किसानों का बढ़ाया उत्साह
आंदोलन स्थल पर कवि और चौपाई कलाकार अपनी रचनाएं पेश कर किसानों का उत्साह बढ़ाते रहते हैं। मंगलवार को ‘तेरी कौन सूने हल जोता, भोले मजदूर किसान या आजादी में मिट्टी में मिल गई शान’ गीत के जरिए खूब वाहवाही लूटी। कोसीकलां से आए कवि मूलचंद धानौतियां ने भी अपनी रचनाएं प्रस्तुत की।
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प्रवीण बैंसला
पलवल। नए कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे किसान आंदोलन सामाजिक सौहार्द का परिचायक बन रहा है। जाति, धर्म और क्षेत्र से ऊपर उठकर किसान एक मंच पर संगठित होकर अनेकता में एकता का उदाहरण दे रहे हैं। धरने पर किसान एक-दूसरे के धर्मों का भरपूर सम्मान कर रहे हैं। वहीं, किसानों की सामूहिक संस्कृतियां भी नजर आ रही हैं। धरने पर सुबह गुरुवाणी के साथ दोपहर को नमाज पढ़ी जाती है। वहीं, शाम को भजन-कीर्तन होते हैं। सभी धर्मों के लोग साथ में बैठकर लंगर छकते हैं और आंदोलन के संबंध में रणनीतियां तैयार करते हैं।
दो दिसंबर को मध्य प्रदेश से सिख समुदाय के किसान दिल्ली जा रहे थे। पुलिस ने रोका तो वहीं पर धरना शुरू कर दिया। दूसरे दिन बुंदेलखंड के हिंदू समुदाय के लोग धरने में पहुंच गए। इसके बाद क्षेत्रीय किसानों ने धरने को समर्थन देना शुरू कर दिया। पूरे देश के राज्यों से विभिन्न जातियों और धर्मों के लोग धरने के समर्थन में पहुंचने लगे। आंदोलन आगे बढ़ा तो मेवात से मुस्लिम समाज के लोग भी धरने को समर्थन देने पहुंच गए। पूरे देश का किसान संगठित हुआ तो विभिन्न धर्मों की सामूहिक संस्कृति भी धरने पर नजर आने लगी। सुबह और शाम सिख समुदाय के लोग गुरुवाणी का पाठ करते हैं। दोपहर के समय धरने में आए मुस्लिम समाज के लोग नमाज अदा करते हैं। बीच-बीच में हिंदू समाज द्वारा आई महिलाएं ब्रज के भजन प्रस्तुत करती हैं। इस दौरान सभी किसान एक-दूसरे के धार्मिक आयोजन को पूरा सम्मान देते हैं।
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रचनाएं पेश कर किसानों का बढ़ाया उत्साह
आंदोलन स्थल पर कवि और चौपाई कलाकार अपनी रचनाएं पेश कर किसानों का उत्साह बढ़ाते रहते हैं। मंगलवार को ‘तेरी कौन सूने हल जोता, भोले मजदूर किसान या आजादी में मिट्टी में मिल गई शान’ गीत के जरिए खूब वाहवाही लूटी। कोसीकलां से आए कवि मूलचंद धानौतियां ने भी अपनी रचनाएं प्रस्तुत की।
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