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आंदोलन को तेज करने के लिए होगी 36 बिरादरी की पंचायत
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पलवल। केएमपी-केजीपी इंटरचेंज पर चल रहा किसानों का धरने को अब फिर से आंदोलन का रूप दिया जाएगा। इसके लिए 36 बिरादरी की पंचायत करने का निर्णय लिया गया। शनिवार को धरने में किसानों ने तीनों कृषि कानूनों की वापसी, न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी गारंटी देने तथा बिजली संशोधन बिल 2020 को रद्द करने की मांग की। वहीं पंचायत को लेकर प्रचार समिति गठित कर जिम्मेदारी सौंपी गई।
धरने को संबोधित करते हुए किसान सभा के नेता धर्मचंद घुघेरा व रमेश चंद सौरोत ने बताया कि सरकार के किसान विरोधी रुख के चलते ही यह आंदोलन लंबा खिंच रहा है। तीन काले कानूनों को वापस लेने और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून बनाने का मुद्दा शुद्ध रूप से किसान व सरकार के बीच का मामला है। इनके बीच कोई तीसरा पक्ष नहीं होना चाहिए। इसी वजह से संयुक्त किसान मोर्चा ने अदालत को भी मध्यस्थ के रुप में स्वीकार नहीं किया। सरकार ने अपनी तरफ से बातचीत का रास्ता बंद कर दिया था, जो 22 जनवरी के बाद अभी तक बंद है।
संयुक्त किसान मोर्चा का पहले से ही स्पष्ट मत है कि इस गतिरोध का समाधान बातचीत से ही निकल सकता है। सरकार के पुराने प्रस्ताव को किसान पहले खारिज कर चुके हैं। किसान उम्मीद करते हैं कि देश की सर्वोच्च अथॉरिटी के रुप में प्रधानमंत्री कुछ बेहतर प्रस्तावों के साथ आगे आएं और बातचीत के लिए एक सौहार्दपूर्ण माहौल बनाएं। उन्होंने कहा कि आंदोलन पर हमला तेज हो तो बातचीत के लिए अनुकूल वातावरण नहीं हो सकता। नए कृषि कानूनों के द्वारा सरकार किसान आधारित खेती को नष्ट कर देना चाहती है और पूंजीपतियों की शह पर कॉर्पोरेट आधारित कृषि की स्थापना करना चाहते हैं। कृषि व्यवस्था में इस बदलाव के जरिये शोषण की व्यवस्था को मजबूत बनाने की कोशिश की जा रही है। धरने की अध्यक्षता शिव सिंह छाता, जबकि संचालन राजकुमार ओलिहान ने किया। इस मौके पर राहुल तंवर, कुलभान कुमार, दीपक चौधरी, चेतराम, नरेंद्र सहरावत, इंद्रजीत, चंद्रमुनि, किशन सिंह शर्मा आदि मौजूद रहे।
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फोटो कैप्शन- पलवल के अटोहां चौक पर धरना देते किसान।
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धरने को संबोधित करते हुए किसान सभा के नेता धर्मचंद घुघेरा व रमेश चंद सौरोत ने बताया कि सरकार के किसान विरोधी रुख के चलते ही यह आंदोलन लंबा खिंच रहा है। तीन काले कानूनों को वापस लेने और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून बनाने का मुद्दा शुद्ध रूप से किसान व सरकार के बीच का मामला है। इनके बीच कोई तीसरा पक्ष नहीं होना चाहिए। इसी वजह से संयुक्त किसान मोर्चा ने अदालत को भी मध्यस्थ के रुप में स्वीकार नहीं किया। सरकार ने अपनी तरफ से बातचीत का रास्ता बंद कर दिया था, जो 22 जनवरी के बाद अभी तक बंद है।
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संयुक्त किसान मोर्चा का पहले से ही स्पष्ट मत है कि इस गतिरोध का समाधान बातचीत से ही निकल सकता है। सरकार के पुराने प्रस्ताव को किसान पहले खारिज कर चुके हैं। किसान उम्मीद करते हैं कि देश की सर्वोच्च अथॉरिटी के रुप में प्रधानमंत्री कुछ बेहतर प्रस्तावों के साथ आगे आएं और बातचीत के लिए एक सौहार्दपूर्ण माहौल बनाएं। उन्होंने कहा कि आंदोलन पर हमला तेज हो तो बातचीत के लिए अनुकूल वातावरण नहीं हो सकता। नए कृषि कानूनों के द्वारा सरकार किसान आधारित खेती को नष्ट कर देना चाहती है और पूंजीपतियों की शह पर कॉर्पोरेट आधारित कृषि की स्थापना करना चाहते हैं। कृषि व्यवस्था में इस बदलाव के जरिये शोषण की व्यवस्था को मजबूत बनाने की कोशिश की जा रही है। धरने की अध्यक्षता शिव सिंह छाता, जबकि संचालन राजकुमार ओलिहान ने किया। इस मौके पर राहुल तंवर, कुलभान कुमार, दीपक चौधरी, चेतराम, नरेंद्र सहरावत, इंद्रजीत, चंद्रमुनि, किशन सिंह शर्मा आदि मौजूद रहे।
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फोटो कैप्शन- पलवल के अटोहां चौक पर धरना देते किसान।