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Mahendragarh-Narnaul News: जहां कभी सीखी थी सिलाई की बारीकियां, आज वहीं धागों में पिरों रही बच्चियों का कल

Tue, 09 Jun 2026 12:27 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Tue, 09 Jun 2026 12:27 AM IST
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The journey from ITI to becoming an instructor: an example of hard work and self-reliance.
फोटो 02 सुरेश कुमारी
नारनौल। खटोटी कलां के एक किसान परिवार में 18 अप्रैल 1977 को जन्मी सुरेश कुमारी अपने चार भाई-बहनों में सबसे छोटी हैं। सुरेश की लगन को देखकर उनके चाचा ने हमेशा उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने 1997 में महिला आईटीआई में दाखिला लिया और सिलाई-कढ़ाई का प्रशिक्षण प्राप्त किया।
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सुरेश कुमारी अपने गांव की पहली लड़की थीं जिन्होंने गांव से बाहर निकलकर आईटीआई में पढ़ाई की। दो साल का कोर्स पूरा करने के बाद उन्होंने एक साल का टीचर ट्रेनिंग कोर्स किया।
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प्रतियोगी परीक्षा पास करने के बाद साल 2007 में वह उसी आईटीआई में बतौर अनुदेशक पदभार संभालने लगीं, जहां कभी छात्रा के रूप में पढ़ाई की थी। नौकरी लगने के बाद उनकी शादी गांव सेका के एक व्यवसायी से हुई और उनके दो बेटे हैं जिसमें बड़ा बेटा बिजली विभाग में लाइनमैन के रूप में काम कर रहा है।
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प्रशिक्षण के दौरान सुरेश ने अपने खर्च खुद उठाया। शहर में किराए के कमरे में रहने के दौरान उन्होंने आस-पड़ोस की महिलाओं के कपड़े सिलकर अपना खर्च पूरा किया। यह कदम उनकी आत्मनिर्भरता और मेहनत का प्रतीक था।

सुरेश छात्राओं को मेहनत और लगन के बल पर आगे बढ़ने और आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा देती हैं। उनका मानना है कि सिलाई-कढ़ाई का हुनर एक छोटी सी मशीन से भी जीवन बदल सकता है। उनके इसी सकारात्मक दृष्टिकोण के कारण उनकी कक्षा का प्रत्येक वर्ष परीक्षा परिणाम शत-प्रतिशत रहा है।
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