{"_id":"6a4eb1b4a6b23b1571005af0","slug":"stadium-construction-pace-slowed-due-to-delay-in-plans-narnol-news-c-196-1-nnl1005-142271-2026-07-09","type":"story","status":"publish","title_hn":"Mahendragarh-Narnaul News: नक्शे की देरी से रुकी स्टेडियम निर्माण की रफ्तार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Mahendragarh-Narnaul News: नक्शे की देरी से रुकी स्टेडियम निर्माण की रफ्तार
विज्ञापन
फोटो नंबर- 14गांव बड़गांव व बड़कोदा की वह जमीन जिस पर बनना है जिला स्तरीय स्टेडियम।
नारनौल। गांव बड़गांव-बड़कोदा में बनने वाले जिलास्तरीय स्टेडियम का काम अभी तक शुरू नहीं हो पाया है। निर्माण की प्रक्रिया फिलहाल कागजों तक ही सीमित नजर आ रही है। स्टेडियम के नक्शे तैयार करने का काम पिछले पांच महीने से लंबित है। उम्मीद थी कि जून के अंत तक नक्शा तैयार हो जाएगा लेकिन अभी तक यह काम पूरा नहीं हुआ है।
इस स्टेडियम में तीरंदाजी, क्रिकेट, वॉलीबॉल, फुटबॉल, एथलेटिक्स सहित कई खेलों के लिए अलग-अलग मैदान बनाए जाने हैं। इसका उद्देश्य खिलाड़ियों को एक ही जगह पर सभी खेलों की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करवाना है।
वर्तमान में नारनौल के जिलास्तरीय नेताजी सुभाष चंद्र बोस स्टेडियम में सभी खेलों के मैदान उपलब्ध नहीं हैं। इसी वजह से प्रतियोगिताओं के दौरान अलग-अलग खेलों का आयोजन अलग-अलग स्थानों पर करना पड़ता है।
विज्ञापन
स्टेडियम निर्माण के लिए बड़गांव और बड़कोदा ग्राम पंचायतों ने खेल विभाग को करीब 14 एकड़ पंचायती जमीन निशुल्क दी थी। पहले इस जमीन को खेती के लिए ठेके पर दिया जाता था जिससे पंचायतों को हर साल करीब 3 लाख रुपये की आय होती थी। जमीन देने के बाद पिछले दो साल से यहां खेती भी नहीं हो रही है।
विज्ञापन
इस स्टेडियम में तीरंदाजी, क्रिकेट, वॉलीबॉल, फुटबॉल, एथलेटिक्स सहित कई खेलों के लिए अलग-अलग मैदान बनाए जाने हैं। इसका उद्देश्य खिलाड़ियों को एक ही जगह पर सभी खेलों की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करवाना है।
विज्ञापन
वर्तमान में नारनौल के जिलास्तरीय नेताजी सुभाष चंद्र बोस स्टेडियम में सभी खेलों के मैदान उपलब्ध नहीं हैं। इसी वजह से प्रतियोगिताओं के दौरान अलग-अलग खेलों का आयोजन अलग-अलग स्थानों पर करना पड़ता है।
विज्ञापन
स्टेडियम निर्माण के लिए बड़गांव और बड़कोदा ग्राम पंचायतों ने खेल विभाग को करीब 14 एकड़ पंचायती जमीन निशुल्क दी थी। पहले इस जमीन को खेती के लिए ठेके पर दिया जाता था जिससे पंचायतों को हर साल करीब 3 लाख रुपये की आय होती थी। जमीन देने के बाद पिछले दो साल से यहां खेती भी नहीं हो रही है।