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Haryana: रामबिलास शर्मा को पूर्व सीएम के साथ ट्यूनिंग अच्छी न होने का भुगतना पड़ा खामियाजा, पढ़ें रिपोर्ट

Fri, 13 Sep 2024 09:32 AM IST
नवीन दलाल मनोज राजपूत, महेंद्रगढ़ (हरियाणा)
मनोज राजपूत, महेंद्रगढ़ (हरियाणा) Published by: नवीन दलाल Updated Fri, 13 Sep 2024 09:32 AM IST
सार

केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह, सांसद चौधरी धर्मबीर सिंह की ओर से लगातार प्रो. शर्मा को टिकट दिलाने का प्रयास किया जा रहा था। वहीं प्रो. शर्मा को अंतिम समय तक टिकट मिलने की उम्मीद थी। बुधवार देर शाम आए निर्णय के बाद प्रो. शर्मा के तेवर भी लगातार ढीले होते चले गए।

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Ram Bilas Sharma to suffer consequences of not having good tuning with former CM In Haryana
पूर्व शिक्षा मंत्री प्रो. रामबिलास शर्मा - फोटो : संवाद

विस्तार

महेंद्रगढ़ विधानसभा क्षेत्र से पांच बार भाजपा का कमल खिलाने वाले प्रो. रामबिलास शर्मा पहले टिकट के लिए अड़े रहे, लेकिन बाद में पार्टी की ओर से लिए गए निर्णय पर वह सहमत हो गए। प्रो. रामबिलास शर्मा के टिकट के लिए अड़ने के कारण भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को भी महेंद्रगढ़ विधानसभा सीट पर प्रत्याशी उतारने के लिए काफी माथापच्ची करनी पड़ी। हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल के साथ उनकी ट्यूनिंग अच्छी न होने का खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने उन्हें आश्वासन दिया था कि पार्टी को प्रो. शर्मा के अनुसार चलाएंगे।

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वीरवार को प्रो. रामबिलास शर्मा का टिकट कटना पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय रहा। वहीं भाजपा के कद्दावर नेता रहे प्रो. रामबिलास शर्मा को हरियाणा में भाजपा का माली कहा जाता है। पहली बार 1982 में महेंद्रगढ़ विधानसभा सीट से हुए चुनाव में प्रो. रामबिलास शर्मा ने ही कमल खिलाया था। उन्होंने अंतिम निर्णय के बावजूद पार्टी प्रत्याशी को समर्थन कर दिया है। हालांकि उनकी नाराजी स्पष्ट झलक रही थी। संवाद
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अंतिम समय तक टिकट की थी उम्मीद
केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह, सांसद चौधरी धर्मबीर सिंह की ओर से लगातार प्रो. शर्मा को टिकट दिलाने का प्रयास किया जा रहा था। वहीं प्रो. शर्मा को अंतिम समय तक टिकट मिलने की उम्मीद थी। बुधवार देर शाम आए निर्णय के बाद प्रो. शर्मा के तेवर भी लगातार ढीले होते चले गए। उन्होंने गत मंगलवार को समर्थकों के साथ हुई बैठक में कहा था कि उन्होंने प्रदेश में भाजपा का पौधा लगाया था, लेकिन जब इसकी छांव में आराम करने का समय आया तो उन्हें अवसर नहीं मिला। जब उनके कार्यकर्ताओं ने निर्दलीय चुनाव लड़ने की बात कही तो वह भावुक हो गए और उन्होंने कार्यकर्ताओं से स्पष्ट रूप से कह दिया कि पांच दशक तक उन्होंने झंडा, डंडा व एजेंडा नहीं बदला। अब वह यह झंडा नहीं छोड़ सकते।

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