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निजी स्कूलों की मार, अभिभावक लाचार
ब्यूरो/अमर उजाला
Updated Mon, 11 Apr 2016 11:59 PM IST
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नया सत्र शुरू होते ही निजी स्कूलों ने ड्रेस और कॉपी-किताब के नाम पर अभिभावकों से मनमर्जी के रेट लेना शुरू कर दिया है। बच्चों के दाखिले के वक्त ही स्कूल से ही कॉपी-किताब और ड्रेस लेने की शर्त लगी होने के कारण अभिभावक भी असहाय नजर आते हैं। शिक्षा विभाग के निर्देशों की धज्जियां उड़ाकर स्कूलों में दुकानें चलाई जा रही हैं। अच्छी पढ़ाई और सामाजिक प्रतिष्ठा को ध्यान में रखकर लोग अपने बच्चों को अच्छे से अच्छे निजी स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं। अभिभावकों की इस मर्जी का निजी स्कूल संचालक फायदा उठा रहे हैं। वर्तमान में शिक्षा के मंदिरों को निजी स्कूल संचालकों ने एक दुकान का रूप दे दिया है। स्कूलों से ही कॉपी, किताब, टाई, बेल्ट, जूते, मोजे, शर्ट, पेंट के अलावा अन्य चीजें खरीदने का दबाव डाला जा रहा है। दाखिले के नाम पर स्कूलों द्वारा अभिभावकों से अपने फायदे के लिए उगाही की जा रही है। प्रशासन का कहना है कि स्कूलों की यह नीति नियमों के खिलाफ है। इस संदर्भ में निर्देश जारी किए जा चुके हैं।
मजबूरी वहीं मिलेगी ड्रेस और किताबें
सभी स्कूल संचालकों ने अपनी खुद की अलग से यूनिफार्म और पब्लिकेशन की किताबें लगा रखी हैं। इनकी किताबें सभी दुकानों पर नहीं मिलती, क्योंकि जिस स्कूल से पब्लिशर ने कांटेक्ट किया हुआ है, वह इन किताबों को अन्य किसी दुकान पर नहीं देता। इस कारण उक्त पब्लिशर की बुक किसी अन्य दुकान पर नहीं मिलती। यही हाल ड्रेस का है। जो ड्रेस स्कूल कैंपस में मिलती है या स्कूल संचालक ने लगा रखी है, वह ड्रेस बाजार में अन्य किसी अन्य दुकानों पर नहीं मिलती है।
ड्रेस के बाजार से दुगने रेट
स्कूलों में यूनिफार्म के बाजार से दुगने रेट हैं। एक पांचवीं में पढ़ने वाले बच्चे की पेंट और शर्ट 500 से 600 रुपये में आसानी से मिल जाती है, वही यूनिफार्म स्कूल में 1000 से 1200 रुपये में मिलती है। स्कूल की ड्रेस नंबर के हिसाब से बनती है, जैसे एक तीन साल के बच्चे को 20 नंबर की ड्रेस, चार साल के बच्चे को 22 और इस तरह ड्रेस के नंबर बढ़ते जाते हैं। एक रेडीमेड संचालक के अनुसार शर्ट या टी शर्ट के 5 से छह रुपये प्रति नंबर होते हैं। ऐसे में 20 नंबर की शर्ट स्कूल संचालक के 100 या फिर 120 रुपये तक की पड़ती है, जबकि स्कूल में एक 20 नंबर की शर्ट या टी शर्ट 300 रुपये तक में मिलती है। ऐसे ही पेंट 11 से 12 रुपये नंबर के हिसाब से होती है। इस प्रकार एक पेंट 200 रुपये के करीब की पड़ती है, जो स्कूल संचालक 400 रुपये में बेचते हैं।
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बाहर 100 की तो अंदर 200 की किताब
स्कूल संचालक किताबों में भी मोटी राशि बनाते हैं। अभिभावकों की मजबूरी होती है कि वह स्कूल के अलावा कहीं अन्य से किताबें नहीं ले सकते। स्कूल में जिस पब्लिशर की किताबें 200 रुपये में एक किताब मिलती है, वह बाहर 100 रुपये में मिल सकती है, मगर पब्लिशर और स्कूल संचालक अपना मोटा फायदा देख इनको बाहर नहीं बेचते।
नहीं है कोई अभिभावक एसोसिएशन
जिले में कोई अभिभावक एसोसिएशन भी नहीं है। अभिभावकों की कोई एसोसिएशन नहीं होने के कारण प्राइवेट स्कूल संचालकों के खिलाफ भी कोई आवाज नहीं उठा पा रहा है। इसका फायदा प्राइवेट स्कूल संचालक उठा रहे हैं। अपनी मनमर्जी से अभिभावकों को काटने में लगे हैं।
नहीं बेच सकते स्कूल में कापी-किताब और ड्रेस
शिक्षा विभाग के नियमों की मानें तो स्कूल संचालक स्कूल के अंदर कापी- किताब और ड्रेस आदि नहीं बचे सकते। जिला शिक्षा अधिकारी संतोष तंवर ने बताया कि इसको लेकर उन्होंने एक माह पूर्व ही सभी बीईओ को सूचित कर दिया था। सभी बीईओ ने स्कूल संचालकों को इस बारे में पत्र भी लिखा था। उन्होंने बताया कि ऐसा करना नियमों के खिलाफ है।
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मजबूरी वहीं मिलेगी ड्रेस और किताबें
सभी स्कूल संचालकों ने अपनी खुद की अलग से यूनिफार्म और पब्लिकेशन की किताबें लगा रखी हैं। इनकी किताबें सभी दुकानों पर नहीं मिलती, क्योंकि जिस स्कूल से पब्लिशर ने कांटेक्ट किया हुआ है, वह इन किताबों को अन्य किसी दुकान पर नहीं देता। इस कारण उक्त पब्लिशर की बुक किसी अन्य दुकान पर नहीं मिलती। यही हाल ड्रेस का है। जो ड्रेस स्कूल कैंपस में मिलती है या स्कूल संचालक ने लगा रखी है, वह ड्रेस बाजार में अन्य किसी अन्य दुकानों पर नहीं मिलती है।
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ड्रेस के बाजार से दुगने रेट
स्कूलों में यूनिफार्म के बाजार से दुगने रेट हैं। एक पांचवीं में पढ़ने वाले बच्चे की पेंट और शर्ट 500 से 600 रुपये में आसानी से मिल जाती है, वही यूनिफार्म स्कूल में 1000 से 1200 रुपये में मिलती है। स्कूल की ड्रेस नंबर के हिसाब से बनती है, जैसे एक तीन साल के बच्चे को 20 नंबर की ड्रेस, चार साल के बच्चे को 22 और इस तरह ड्रेस के नंबर बढ़ते जाते हैं। एक रेडीमेड संचालक के अनुसार शर्ट या टी शर्ट के 5 से छह रुपये प्रति नंबर होते हैं। ऐसे में 20 नंबर की शर्ट स्कूल संचालक के 100 या फिर 120 रुपये तक की पड़ती है, जबकि स्कूल में एक 20 नंबर की शर्ट या टी शर्ट 300 रुपये तक में मिलती है। ऐसे ही पेंट 11 से 12 रुपये नंबर के हिसाब से होती है। इस प्रकार एक पेंट 200 रुपये के करीब की पड़ती है, जो स्कूल संचालक 400 रुपये में बेचते हैं।
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बाहर 100 की तो अंदर 200 की किताब
स्कूल संचालक किताबों में भी मोटी राशि बनाते हैं। अभिभावकों की मजबूरी होती है कि वह स्कूल के अलावा कहीं अन्य से किताबें नहीं ले सकते। स्कूल में जिस पब्लिशर की किताबें 200 रुपये में एक किताब मिलती है, वह बाहर 100 रुपये में मिल सकती है, मगर पब्लिशर और स्कूल संचालक अपना मोटा फायदा देख इनको बाहर नहीं बेचते।
नहीं है कोई अभिभावक एसोसिएशन
जिले में कोई अभिभावक एसोसिएशन भी नहीं है। अभिभावकों की कोई एसोसिएशन नहीं होने के कारण प्राइवेट स्कूल संचालकों के खिलाफ भी कोई आवाज नहीं उठा पा रहा है। इसका फायदा प्राइवेट स्कूल संचालक उठा रहे हैं। अपनी मनमर्जी से अभिभावकों को काटने में लगे हैं।
नहीं बेच सकते स्कूल में कापी-किताब और ड्रेस
शिक्षा विभाग के नियमों की मानें तो स्कूल संचालक स्कूल के अंदर कापी- किताब और ड्रेस आदि नहीं बचे सकते। जिला शिक्षा अधिकारी संतोष तंवर ने बताया कि इसको लेकर उन्होंने एक माह पूर्व ही सभी बीईओ को सूचित कर दिया था। सभी बीईओ ने स्कूल संचालकों को इस बारे में पत्र भी लिखा था। उन्होंने बताया कि ऐसा करना नियमों के खिलाफ है।