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गणेश जी बुद्धि और ज्ञान के देवता : स्वामी कमल
Sun, 03 Aug 2025 01:01 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
Updated Sun, 03 Aug 2025 01:01 AM IST
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फोटो नंबर- 13मंडी अटेली में शिव महापुराण कथा सुनते श्रद्धालु। संवाद
मंडी अटेली। स्थानीय श्री राधा कृष्ण मंदिर परिसर में चल रही नौ दिवसीय शिव महापुराण कथा के सातवें दिन कथा व्यास स्वामी कमल दास ने भगवान गणेश के जन्म का प्रसंग सुनाया।
उन्होंने बताया कि गणेश जी को बुद्धि और ज्ञान का देवता माना जाता है। कार्तिकेय और गणेश जी दोनों भगवान शिव व माता पार्वती के पुत्र हैं। एक बार माता पार्वती ने अपने शरीर की मैल से एक पुतला बनाया और उसे जीवित करने के लिए भगवान शिव की तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उस पुतले में जान डाल दी और इस तरह गणेश जी का जन्म हुआ।
उन्होंने बताया कि पृथ्वी को व्याकुल देख भगवान शिव के तेज को अग्नि ने खा लिया और ऋषियों की पत्नियों ने अग्नि को तप करके पा लिया। चूंकि शिव के तेज को अग्नि ने खा लिया था। इसलिए ऋषियों की पत्नियां भी उस तेज को सहन न कर पाईं और गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया। मां गंगा भी भगवान का तेज नहीं सहन कर सकीं तब उन्होंने किनारे पर उगे हुए सरकंडों यानी सरपत में भगवान शिव के तेज को फेंक दिया।
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नदी किनारे फेंके गए उसी तेज से भगवान शिव के बड़े पुत्र स्कंद भगवान की उत्पत्ति हुई। चूंकि भगवान स्कंद का पालन पोषण छह कृतिकाओं ने किया। इसीलिए कृतिकाओं द्वारा पालन पोषण किए जाने के कारण ही आगे चलकर इनका नाम भगवान कार्तिकेय पड़ा। कथा व्यास कमल दास ने बताया कि भगवान गणेश जी का जन्म माता पार्वती जी के शरीर के मैल से हुआ।
भगवान गणेश जी का सिर भगवान शिव जी ने काट डाला था। पुत्र का सिर अपने पति द्वारा काट डालने से जब पार्वती अत्यधिक क्रोधित हो उठीं तब भगवान शिव ने हाथी का सिर काटकर भगवान गणेश जी के धड़ में लगा दिया। इस अवसर पर कथा व्यास कमल दास की पत्नी ज्ञानवती देवी मिश्रा ने बताया पिछले 7 दिनों से कस्बा वासी शिव महापुराण के पाठ को प्रतिदिन सुन रहे हैं।
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उन्होंने बताया कि गणेश जी को बुद्धि और ज्ञान का देवता माना जाता है। कार्तिकेय और गणेश जी दोनों भगवान शिव व माता पार्वती के पुत्र हैं। एक बार माता पार्वती ने अपने शरीर की मैल से एक पुतला बनाया और उसे जीवित करने के लिए भगवान शिव की तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उस पुतले में जान डाल दी और इस तरह गणेश जी का जन्म हुआ।
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उन्होंने बताया कि पृथ्वी को व्याकुल देख भगवान शिव के तेज को अग्नि ने खा लिया और ऋषियों की पत्नियों ने अग्नि को तप करके पा लिया। चूंकि शिव के तेज को अग्नि ने खा लिया था। इसलिए ऋषियों की पत्नियां भी उस तेज को सहन न कर पाईं और गंगा नदी में प्रवाहित कर दिया। मां गंगा भी भगवान का तेज नहीं सहन कर सकीं तब उन्होंने किनारे पर उगे हुए सरकंडों यानी सरपत में भगवान शिव के तेज को फेंक दिया।
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नदी किनारे फेंके गए उसी तेज से भगवान शिव के बड़े पुत्र स्कंद भगवान की उत्पत्ति हुई। चूंकि भगवान स्कंद का पालन पोषण छह कृतिकाओं ने किया। इसीलिए कृतिकाओं द्वारा पालन पोषण किए जाने के कारण ही आगे चलकर इनका नाम भगवान कार्तिकेय पड़ा। कथा व्यास कमल दास ने बताया कि भगवान गणेश जी का जन्म माता पार्वती जी के शरीर के मैल से हुआ।
भगवान गणेश जी का सिर भगवान शिव जी ने काट डाला था। पुत्र का सिर अपने पति द्वारा काट डालने से जब पार्वती अत्यधिक क्रोधित हो उठीं तब भगवान शिव ने हाथी का सिर काटकर भगवान गणेश जी के धड़ में लगा दिया। इस अवसर पर कथा व्यास कमल दास की पत्नी ज्ञानवती देवी मिश्रा ने बताया पिछले 7 दिनों से कस्बा वासी शिव महापुराण के पाठ को प्रतिदिन सुन रहे हैं।