नारनौल। संस्कृत और संस्कृति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। संस्कृत ज्ञान के बिना संस्कृति का विकास संभव नहीं है। ये बातें पटना विश्वविद्यालय के संस्कृत प्राध्यापक विष्णु प्रभाकर ने सेक्टर-1, पार्ट-2 स्थित अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक केंद्र मनुमुक्त भवन में आयोजित कार्यक्रम में कहीं।
उन्होंने कहा कि आज विकसित देशों में संस्कृत को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। अनेक बड़े विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ाई जा रही है और संस्कृत ग्रंथों पर शोध भी हो रहा है। जबकि अपने देश में संस्कृत भाषा उपेक्षित है और हम अपने धर्म और संस्कृति से विमुख होते जा रहे हैं। मनुमुक्त मानव मेमोरियल ट्रस्ट के चीफ ट्रस्टी डॉ. रामनिवास मानव ने कहा कि आज भारत में संस्कृत को मात्र कर्मकांड की भाषा मान लिया गया है, जो अनुचित है। संस्कृत को सर्वाधिक समृद्ध और वैज्ञानिक भाषा है। पौराणिक ग्रंथों में धर्म और संस्कृति, अध्यात्म और दर्शन, कला, साहित्य, ज्ञान और विज्ञान का विपुल भंडार छुपा हुआ है, जिसे संस्कृत पढ़कर ही समझा जा सकता है। इस दौरान प्रो. विष्णु को अंगवस्त्र, साहित्य और सम्मान-पत्र भेंट कर सम्मानित किया गया। इस दौरान डॉ. कांता भारती, राजकीय महिला महाविद्यालय की प्रोफेसर अंजू निमहोरिया, भागलपुर के अधिवक्ता उमेश माधव रहे।