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Mahendragarh-Narnaul News: बच्चे स्कूल बैग और अभिभावक खर्च तले दब रहे

Tue, 08 Apr 2025 12:09 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Tue, 08 Apr 2025 12:09 AM IST
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Children are burdened with school bags and parents with expenses
फोटो नंबर-01किताबों का दिया गया कच्चा बिल।
नारनौल। क्षेत्र के निजी स्कूलों में अब अप्रैल माह के दौरान दाखिला प्रक्रिया चल रही है। अभिभावक निजी स्कूलों में भारी भरकम फीस देकर बच्चों का दाखिला करवा रहे हैं। इस दाखिले की फीस के बाद एक और बहुत बड़ा खर्च उन पर किताबों का पड़ रहा है। निजी स्कूल अपनी मनमानी चलाते हुए अभिभावकों को एनसीईआरटी की किताबें लगवाने की बजाय निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें लगवा रहे हैं।
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इस बात को जानते हुए भी शिक्षा विभाग द्वारा कोई खास कार्रवाई अमल में नहीं लाई जा रही है, जिसके चलते निजी स्कूल संचालकों के हौसले बुलंद हैं। निजी स्कूल हर साल अपनी किताबों में कुछ न कुछ बदलाव कर देते हैं, जिसके कारण हर अभिभावक को नई किताबें ही खरीदनी पड़ती हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि ये किताबें भी अभिभावकों को ज्यादातर स्कूलों में या फिर स्कूल द्वारा तय किए गए पुस्तक विक्रेता के पास से ही खरीदनी पड़ती हैं। जबकि शिक्षा विभाग का आदेश है कि हर साल सिलेबस नहीं बदला जाएगा, लेकिन कमीशन के चक्कर में कई निजी स्कूल हर साल किताबें बदल देते हैं, जिसका खामियाजा अभिभावकों कि जेब पर पड़ता है। निजी प्रकाशकों की किताबें तीन हजार से लेकर दस हजार रुपये तक मिल रही हैं, जबकि एनसीईआरटी की किताबें 400 से एक हजार रुपये तक मिल जाती हैं। उसके बावजूद निजी स्कूल एनसीईआरटी की किताबें नहीं पढ़ाते हैं। निजी प्रकाशकों की किताबें लगवाने पर उनका कमीशन होता है। निजी पुस्तक विक्रेता ने नाम नहीं छापने पर बताया कि निजी प्रकाशकों की किताब लगवाने पर एक सेट पर ही 40 से 50 प्रतिशत तक कमीशन स्कूल को देना होता है।
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किताबों का मिलता है कच्चा बिल
निजी स्कूल ज्यादातर अपने पास से ही बच्चों को किताबें दे रहे हैं। इन किताबों का कोई बिल नहीं दिया जाता, बस एक पर्ची पर लिखकर दे दिया जाता है। वहीं, जिन स्कूलों ने पुस्तक विक्रेताओं से मिलीभगत की हुई है, वे अभिभावकों को कच्चा बिल ही देते हैं। दुकानदार द्वारा शिकायत के भय से पक्के बिल नहीं दिए जाते।
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