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Mahendragarh-Narnaul News: बिरेंद्र कारगिल युद्ध में दुश्मन के साथ लड़ते हो गए थे शहीद

Sun, 13 Jul 2025 07:59 PM IST
रोहतक ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल Updated Sun, 13 Jul 2025 07:59 PM IST
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Birendra was martyred fighting with the enemy in the Kargil war
फोटो 6शहीद बिरेंद्र सिंह की प्रतिमा।
फोटो 6 व 7
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संवाद न्यूज एजेंसी
मंडी अटेली। अहीरवाल क्षेत्र रणबांकुरों की पावन स्थली है। कारगिल युद्ध में भी यहां के वीर जवानों ने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। गढ़ी रुथल गांव के बिरेंद्र सिंह ने भी देश की रक्षा करते हुए शहादत दी थी। उनकी शहादत आज भी भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है। शहीद की पत्नी मनभावती देवी कहती हैं किसी भी व्यक्ति के लिए राष्ट्र सर्वोपरि है। मुझे अपने पति की शहादत पर गर्व है। पिता की शहादत को प्रेरणा मानते हुए बड़ा बेटा प्रवीण और छोटा बेटा टिंकू भी एमएससी कर सेना भर्ती की तैयारी कर रहे हैं।
बलिदानी बिरेंद्र के भाई ओमप्रकाश लांबा बताते हैं बिरेंद्र सिंह के मन में बचपन से ही देशभक्ति का जज्बा था। वे भारतीय सेना में अपनी इच्छा से भर्ती हुए थे। कारगिल में दुश्मन को नाकों चने चबाते हुए अपने प्राणों की कुर्बानी दी थी। ओमप्रकाश लांबा ने नम आंखों से बताया कि भाई के चले जाने का दुख तो है लेकिन शहीद का भाई होने से गर्व से सीना चौड़ा हो जाता है।
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19 साल की आयु में 18 ग्रेनेड बटालियन में हुए थे भर्ती
बिरेंद्र सिंह महज 19 की उम्र में 18 ग्रेनेड बटालियन में भर्ती हो गए थे। सिपाही के पद पर भर्ती होने के कुछ समय बाद वे नायक पद पर पदोन्नत हुए। इसी दौरान कारगिल युद्ध हुआ। टाइगर हिल पर 30 मई 1999 को वह दुश्मन से लोहा लेते हुए बलिदान हो गए। 2 जून 1999 को उनका पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटकर गांव पहुंचा था। शहादत के वक्त उनकी आयु महज 35 साल थी।
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दो दशक बाद भी नहीं बना स्मारक स्थल

शहीद की पत्नी ने कहा कि सरकार ने उनके पति बिरेंद्र को शहीद का दर्जा तो दिया लेकिन दो दशक बाद भी न तो उनका कोई स्मारक बना और न ही उनके नाम पर किसी स्कूल या मार्ग का नामकरण किया गया है।
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