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Mahendragarh-Narnaul News: प्राचीन मां दुर्गा मंदिर सदियों से रहा आस्था का केंद्र, शक्तिपीठ कांगड़ा का है स्वरुप
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फोटो संख्या:59-प्राचीन दुर्गा माता मंदिर में स्थापित अष्ट धातु की प्राचीन मूर्तियां--संवाद
संवाद न्यूज एजेंसी
महेंद्रगढ़। चैत्र नवरात्र शुरू होते ही प्राचीन दुर्गा माता मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ लगने शुरू हो गई है। शहर के बीचों बीच स्थित मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ मां दुर्गा में अटूट विश्वास को दर्शाती है। मंदिर में स्थापित हिमाचल से लाई गई अष्ट धातु की प्राचीन मूर्तियां यहां आने वाले हर श्रद्धालु को नतमस्तक कर देती है। प्राचीन मां दुर्गा मंदिर सदियों से आस्था का केंद्र रहा है। प्राचीन समय में मां दुर्गा राजाओं की कुलदेवी होती थी।
मंदिर पुजारी सीताराम ने बताया कि मां दुर्गा के इस प्राचीन मंदिर में आकर आराधना करने से भक्तों की हर मनोकामना पूरी हो जाती है। मां दुर्गा का यह प्राचीन मंदिर मराठों के काल का बना हुआ है। पीढ़ी दर पीढ़ी पुजारी परंपरा को निभाने के क्रम में वर्तमान में छठी पीढ़ी में यहां पर पुजारी सीताराम 55 वर्षों से पूजा कर रहे हैं। इस मंदिर में पूर्व में पुजारी ताराचंद व उनके गुरु की दो समाधि भी बनाई गई हैं। समय-समय पर यहां रामायण पाठ, सत्संग व भंडारे का आयोजन किया जाता है व वर्ष में आने वाले दोनों नवरात्र पर मेले लगते हैं। प्रतिदिन दिल्ली, राजस्थान से काफी संख्या में श्रद्धालु आते है उनकी मनोकामना पुरी होने पर हवन पूजन दान व माता के भंडारे लगाते है।
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यह है दुर्गा मंदिर का प्राचीन इतिहास
शहर में सब्जी मंडी में स्थित प्राचीन मां दुर्गा मंदिर 600 वर्ष पूर्व मराठा शासनकाल में तात्या टोपे ने माता की मूर्ति की स्थापना की थी। उस समय राजाओं की कुलदेवी होती थी। राजा प्रतिदिन मंदिर पूजा करते थे। राजा ने हिमाचल के नगरकोट से लाकर अष्ट धातु की बनी मूर्ति से दुर्गा मां को विराजमान किया गया है। माता को शक्ति पीठ कांगड़ा का स्वरूप कहा जाता है व भैरव का प्राचीन रूप भी यहां विराजमान है। उसके बाद राजाओं ने माता मंदिर के समीप शिवालय बनाया गया। मंदिर पुजारी सीताराम ने बताया कि 1970 में मंदिर में पुजारी बने थे। तब यहां झाड़ियां उगी हुई थीं न ही मंदिर के चहारदीवारी थी। मंदिर में पूजा करने वाले श्रद्धालुओं के साथ मिलकर मंदिर के चारों तरफ सफाई की गई। वर्तमान में मां दुर्गा के इस प्राचीन मंदिर के मुख्य द्वार से प्रवेश करने पर सामने मंदिर परिसर में स्थापित हनुमान प्रतिमा, शिवालय, हनुमान मंदिर, राधा-कृष्ण मंदिर, संतोषी मंदिर व हनुमान मंदिर हैं। इस मंदिर परिसर में 49 वर्षों से लगे त्रिवेणी के प्राचीन होने की ओर संकेत करते हैं। मां दुर्गा के इस मंदिर में हिमाचल के नगरकोट से लाकर स्थापित की गई अष्टधातु की प्राचीन मूर्तियां हर श्रद्धालु को नतमस्तक कर देती हैं। दुर्गा मंदिर में नवरात्र के दौरान दुर्गा चालिसा, दुर्गा सप्त का पाठ करते है। मंदिर 900 गज में फैला हुआ यह मंदिर अपने आप में इतिहास समेटे है।मित्र मंडल सेवा मंडल की ओर से दुर्गा मंदिर के बाहर गेट पर हनुमान मंदिर बनवाया, 1997 में हनुमान मंदिर, 2005 में संंतोष, 2012 में राधा-कृष्ण मंदिर बनाया गया।
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महेंद्रगढ़। चैत्र नवरात्र शुरू होते ही प्राचीन दुर्गा माता मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ लगने शुरू हो गई है। शहर के बीचों बीच स्थित मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ मां दुर्गा में अटूट विश्वास को दर्शाती है। मंदिर में स्थापित हिमाचल से लाई गई अष्ट धातु की प्राचीन मूर्तियां यहां आने वाले हर श्रद्धालु को नतमस्तक कर देती है। प्राचीन मां दुर्गा मंदिर सदियों से आस्था का केंद्र रहा है। प्राचीन समय में मां दुर्गा राजाओं की कुलदेवी होती थी।
मंदिर पुजारी सीताराम ने बताया कि मां दुर्गा के इस प्राचीन मंदिर में आकर आराधना करने से भक्तों की हर मनोकामना पूरी हो जाती है। मां दुर्गा का यह प्राचीन मंदिर मराठों के काल का बना हुआ है। पीढ़ी दर पीढ़ी पुजारी परंपरा को निभाने के क्रम में वर्तमान में छठी पीढ़ी में यहां पर पुजारी सीताराम 55 वर्षों से पूजा कर रहे हैं। इस मंदिर में पूर्व में पुजारी ताराचंद व उनके गुरु की दो समाधि भी बनाई गई हैं। समय-समय पर यहां रामायण पाठ, सत्संग व भंडारे का आयोजन किया जाता है व वर्ष में आने वाले दोनों नवरात्र पर मेले लगते हैं। प्रतिदिन दिल्ली, राजस्थान से काफी संख्या में श्रद्धालु आते है उनकी मनोकामना पुरी होने पर हवन पूजन दान व माता के भंडारे लगाते है।
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यह है दुर्गा मंदिर का प्राचीन इतिहास
शहर में सब्जी मंडी में स्थित प्राचीन मां दुर्गा मंदिर 600 वर्ष पूर्व मराठा शासनकाल में तात्या टोपे ने माता की मूर्ति की स्थापना की थी। उस समय राजाओं की कुलदेवी होती थी। राजा प्रतिदिन मंदिर पूजा करते थे। राजा ने हिमाचल के नगरकोट से लाकर अष्ट धातु की बनी मूर्ति से दुर्गा मां को विराजमान किया गया है। माता को शक्ति पीठ कांगड़ा का स्वरूप कहा जाता है व भैरव का प्राचीन रूप भी यहां विराजमान है। उसके बाद राजाओं ने माता मंदिर के समीप शिवालय बनाया गया। मंदिर पुजारी सीताराम ने बताया कि 1970 में मंदिर में पुजारी बने थे। तब यहां झाड़ियां उगी हुई थीं न ही मंदिर के चहारदीवारी थी। मंदिर में पूजा करने वाले श्रद्धालुओं के साथ मिलकर मंदिर के चारों तरफ सफाई की गई। वर्तमान में मां दुर्गा के इस प्राचीन मंदिर के मुख्य द्वार से प्रवेश करने पर सामने मंदिर परिसर में स्थापित हनुमान प्रतिमा, शिवालय, हनुमान मंदिर, राधा-कृष्ण मंदिर, संतोषी मंदिर व हनुमान मंदिर हैं। इस मंदिर परिसर में 49 वर्षों से लगे त्रिवेणी के प्राचीन होने की ओर संकेत करते हैं। मां दुर्गा के इस मंदिर में हिमाचल के नगरकोट से लाकर स्थापित की गई अष्टधातु की प्राचीन मूर्तियां हर श्रद्धालु को नतमस्तक कर देती हैं। दुर्गा मंदिर में नवरात्र के दौरान दुर्गा चालिसा, दुर्गा सप्त का पाठ करते है। मंदिर 900 गज में फैला हुआ यह मंदिर अपने आप में इतिहास समेटे है।मित्र मंडल सेवा मंडल की ओर से दुर्गा मंदिर के बाहर गेट पर हनुमान मंदिर बनवाया, 1997 में हनुमान मंदिर, 2005 में संंतोष, 2012 में राधा-कृष्ण मंदिर बनाया गया।