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Mahendragarh-Narnaul News: 20 साल पुराने 50 फीसदी कुएं और बोरवेल ठप
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मनोज राजपूत
महेंद्रगढ़। डार्क जोन में शामिल जिले का भूजल स्तर बढ़ाने के नाम पर पिछले पांच सालों में विभिन्न परियोजनाओं पर करीब 200 करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद भी स्थिति काफी चिंताजनक हैं। पिछले 20 सालों के दौरान करीब 50 प्रतिशत पुराने कुएं व ट्यूबवेल पानी के अभाव में ठप हो गए हैं।
जिले में नहरी पानी का सहारा है, लेकिन अधिकांश नहरें भी सीसी बेस पर बना दी हैं, जिनसे पानी का भूमि में रिसाव कम होने से हालात और अधिक गंभीर होते गए। नहर एवं सिंचाई विभाग के जिम्मेदार भी वर्ष के महज तीन माह बारिश के मौसम में मिलने वाले अतिरिक्त नहरी पानी से भूजल स्तर सुधार का दावा कर रहे हैं। नहरी पानी आने में देरी होने पर जिला पेयजल का संकट छा जाता है।
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भूजल रिचार्ज के नाम पर 200 करोड़ खर्च नहीं मिल रहा लाभ
नहर एवं सिंचाई विभाग की ओर से जिलेभर में भूजल स्तर रिचार्ज के लिए विभिन्न परियोजनाओं पर पिछले पांच सालों में करीब 200 करोड़ रुपये खर्च कर दिए। सालभर में तीन माह बारिश के मौसम में मिलने वाले अतिरिक्त पानी पर निर्भर अनेक जोहड़, वाटर स्टोरेज टैंक, रिचार्ज टैंक, दौहान व कृष्णावती नदियों में पानी छोड़ने की परियोजनाएं तैयार की गई थी। यह वर्ष के 9 माह सूखी पड़ी रहती हैं, केवल तीन माह में पानी छोड़ा जाता है। ऐसे में भूजल स्तर सुधार की उम्मीद लगाई जा रही है। जेएलएन में साल के नौ माह के दौरान करीब 400 से 700 क्यूसेक पानी मिलता है जो केवल प्यास बुझाने के लिए है। नहर एवं सिंचाई विभाग ने कभी ऐसी परियोजनाओं पर ध्यान ही नहीं दिया जिनके माध्यम से वर्षभर भूजल रिचार्ज हो सके।
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यूं बिगड़ती गई जिले में भूजल स्तर की स्थिति
1899 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले जिले में कुल 412470 एकड़ भूमि सिंचित है। जिले की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार वर्ष में दो बार फसलें ली जाती हैं। दोनों सीजन में फसलों में बोरवेलों के माध्यम से वर्षभर भूमिगत पानी का दौहन किया जाता है। 20 वर्ष पूर्व तक कुओं के माध्यम से मोनोब्लॉक मोटरों से वर्षभर खेतों की सिंचाई की जाती थी। अब, जिले में कहीं भी कुओं से सीधे रस्सी के सहारे पानी नहीं मिल पा रहा है। किसानों ने खेतों में सिंचाई के लिए बोरवेल का सहारा लिया तो 300 से 1500 फीट गहराई तक सबमर्सिबल मोटरों के माध्यम से भूमि से पानी का दौहन किया गया। समय पर बारिश नहीं होने से पानी के संरक्षण के लिए प्रत्येक गांवों में बने जोहड़ भी वर्षभर सूखे रहे, जिस कारण भूजल रिचार्ज में काफी कमी आ गई और धीरे-धीरे भूजल स्तर की स्थिति गंभीर हालत में पहुंचती गई।
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सीसी बेस पर बनी नहरों ने भूमि में पानी का नहीं हो रहा रिसाव
जिले की पेयजल के लिए जीवन रेखा समझी जाने वाली जेएलएन में दो साल पूर्व तक मिट्टी से बनी टाइलें लगी थीं, जो तेजी से भूमि में पानी का रिसाव करती थी। इस कारण इसके नजदीक भूजल स्तर काफी हद तक ठीक था। दो साल पूर्व सीसी बेस पर बनने के कारण अब उन ट्यूबवेलों में भी पानी का अभाव होता गया। जिले की सभी नहरों को सीसी बेस बना दिया। भूजल स्तर नीचे गिरने के कारण किसान भी ट्यूबवेलों में पाइप बढ़ाकर और अधिक गहराई तक पानी लेते रहे, जिस कारण भूजल स्तर का अति दौहन से हालात और अधिक बिगड़ते गए।
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10 लाख खर्च होने के बावजूद भी नसीब नहीं हो पा रहा पेयजल
सतनाली क्षेत्र के 20 वर्ष पूर्व बने अधिकांश कुओं व बोरवेलों में पानी सूख चुका है। क्षेत्र के किसान खेतों की सिंचाई के लिए 10 लाख रुपये तक बोरवेल पर खर्च कर रहे हैं, लेकिन अनेक स्थानों पर सिंचाई करना तो दूर पेयजल भी नसीब नहीं हो पा रहा है। इस क्षेत्र में करीब 20 साल पूर्व जिन कुओं से ग्रामीण रस्सी के सहारे पेयजल निकालते थे, वह भी सूख चुके हैं। अनेक किसानों ने सिंचाई के लिए दो-तीन बोरवेल कराए, लेकिन वह भी महज सालभर में ही ठप हो गए।
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वर्जन
नहर सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य सहित अन्य विभागों के अधिकारियों के साथ बैठक कर ऐसी परियोजनाएं तैयार की जाएंगी, जो वर्षभर भूजल स्तर को रिचार्ज कर सकें। भविष्य में ऐसी परियोजनाएं तैयार करने पर अधिक ध्यान दिया जाएगा। क्षेत्र में नहरी पानी का दायरा एवं उपलब्धता बढ़ाने के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं। अनेक परियोजनाएं भी ऐसी तैयार की गई हैं, जो भूजल स्तर सुधार में कारगर साबित होंगी।
कंवर सिंह यादव, विधायक महेंद्रगढ़।
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महेंद्रगढ़। डार्क जोन में शामिल जिले का भूजल स्तर बढ़ाने के नाम पर पिछले पांच सालों में विभिन्न परियोजनाओं पर करीब 200 करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद भी स्थिति काफी चिंताजनक हैं। पिछले 20 सालों के दौरान करीब 50 प्रतिशत पुराने कुएं व ट्यूबवेल पानी के अभाव में ठप हो गए हैं।
जिले में नहरी पानी का सहारा है, लेकिन अधिकांश नहरें भी सीसी बेस पर बना दी हैं, जिनसे पानी का भूमि में रिसाव कम होने से हालात और अधिक गंभीर होते गए। नहर एवं सिंचाई विभाग के जिम्मेदार भी वर्ष के महज तीन माह बारिश के मौसम में मिलने वाले अतिरिक्त नहरी पानी से भूजल स्तर सुधार का दावा कर रहे हैं। नहरी पानी आने में देरी होने पर जिला पेयजल का संकट छा जाता है।
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भूजल रिचार्ज के नाम पर 200 करोड़ खर्च नहीं मिल रहा लाभ
नहर एवं सिंचाई विभाग की ओर से जिलेभर में भूजल स्तर रिचार्ज के लिए विभिन्न परियोजनाओं पर पिछले पांच सालों में करीब 200 करोड़ रुपये खर्च कर दिए। सालभर में तीन माह बारिश के मौसम में मिलने वाले अतिरिक्त पानी पर निर्भर अनेक जोहड़, वाटर स्टोरेज टैंक, रिचार्ज टैंक, दौहान व कृष्णावती नदियों में पानी छोड़ने की परियोजनाएं तैयार की गई थी। यह वर्ष के 9 माह सूखी पड़ी रहती हैं, केवल तीन माह में पानी छोड़ा जाता है। ऐसे में भूजल स्तर सुधार की उम्मीद लगाई जा रही है। जेएलएन में साल के नौ माह के दौरान करीब 400 से 700 क्यूसेक पानी मिलता है जो केवल प्यास बुझाने के लिए है। नहर एवं सिंचाई विभाग ने कभी ऐसी परियोजनाओं पर ध्यान ही नहीं दिया जिनके माध्यम से वर्षभर भूजल रिचार्ज हो सके।
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यूं बिगड़ती गई जिले में भूजल स्तर की स्थिति
1899 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले जिले में कुल 412470 एकड़ भूमि सिंचित है। जिले की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार वर्ष में दो बार फसलें ली जाती हैं। दोनों सीजन में फसलों में बोरवेलों के माध्यम से वर्षभर भूमिगत पानी का दौहन किया जाता है। 20 वर्ष पूर्व तक कुओं के माध्यम से मोनोब्लॉक मोटरों से वर्षभर खेतों की सिंचाई की जाती थी। अब, जिले में कहीं भी कुओं से सीधे रस्सी के सहारे पानी नहीं मिल पा रहा है। किसानों ने खेतों में सिंचाई के लिए बोरवेल का सहारा लिया तो 300 से 1500 फीट गहराई तक सबमर्सिबल मोटरों के माध्यम से भूमि से पानी का दौहन किया गया। समय पर बारिश नहीं होने से पानी के संरक्षण के लिए प्रत्येक गांवों में बने जोहड़ भी वर्षभर सूखे रहे, जिस कारण भूजल रिचार्ज में काफी कमी आ गई और धीरे-धीरे भूजल स्तर की स्थिति गंभीर हालत में पहुंचती गई।
सीसी बेस पर बनी नहरों ने भूमि में पानी का नहीं हो रहा रिसाव
जिले की पेयजल के लिए जीवन रेखा समझी जाने वाली जेएलएन में दो साल पूर्व तक मिट्टी से बनी टाइलें लगी थीं, जो तेजी से भूमि में पानी का रिसाव करती थी। इस कारण इसके नजदीक भूजल स्तर काफी हद तक ठीक था। दो साल पूर्व सीसी बेस पर बनने के कारण अब उन ट्यूबवेलों में भी पानी का अभाव होता गया। जिले की सभी नहरों को सीसी बेस बना दिया। भूजल स्तर नीचे गिरने के कारण किसान भी ट्यूबवेलों में पाइप बढ़ाकर और अधिक गहराई तक पानी लेते रहे, जिस कारण भूजल स्तर का अति दौहन से हालात और अधिक बिगड़ते गए।
10 लाख खर्च होने के बावजूद भी नसीब नहीं हो पा रहा पेयजल
सतनाली क्षेत्र के 20 वर्ष पूर्व बने अधिकांश कुओं व बोरवेलों में पानी सूख चुका है। क्षेत्र के किसान खेतों की सिंचाई के लिए 10 लाख रुपये तक बोरवेल पर खर्च कर रहे हैं, लेकिन अनेक स्थानों पर सिंचाई करना तो दूर पेयजल भी नसीब नहीं हो पा रहा है। इस क्षेत्र में करीब 20 साल पूर्व जिन कुओं से ग्रामीण रस्सी के सहारे पेयजल निकालते थे, वह भी सूख चुके हैं। अनेक किसानों ने सिंचाई के लिए दो-तीन बोरवेल कराए, लेकिन वह भी महज सालभर में ही ठप हो गए।
वर्जन
नहर सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य सहित अन्य विभागों के अधिकारियों के साथ बैठक कर ऐसी परियोजनाएं तैयार की जाएंगी, जो वर्षभर भूजल स्तर को रिचार्ज कर सकें। भविष्य में ऐसी परियोजनाएं तैयार करने पर अधिक ध्यान दिया जाएगा। क्षेत्र में नहरी पानी का दायरा एवं उपलब्धता बढ़ाने के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं। अनेक परियोजनाएं भी ऐसी तैयार की गई हैं, जो भूजल स्तर सुधार में कारगर साबित होंगी।
कंवर सिंह यादव, विधायक महेंद्रगढ़।