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Kurukshetra News: ... जब बेटे के तिरस्कार से आहत मां ने छोड़े प्राण

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 15 Oct 2024 04:26 AM IST
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... when a mother, hurt by her son's disdain, gave up her life
कुरुक्षेत्र। आज के उपभोक्तावादी युग में अधिकाधिक धन, यश, आराम आदि ही जीवन का चरम लक्ष्य माना जाता है। ऐसी हालत में पारिवारिक मूल्य खत्म होते जा रहे हैं और मां-बाप अपनी संतान द्वारा उपेक्षित हो जाते हैं। यहां तक कि उनका तिरस्कार तक कर दिया जाता है, जिससे उनका बुढ़ापा बेहद बोझिल हो जाता है।
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समाज का यह आईना नाटक चीफ की दाव के जरिए दिखाया गया, जिसे देख दर्शकों की आंखें नम हो गई। कला कीर्ति भवन में न्यू उत्थान थियेटर ग्रुप की ओर से तीन दिवसीय उत्थान उत्सव का शुभारंभ इसी नाटक के साथ किया गया। भीष्म साहनी की कहानी चीफ की दावत एक संवेदनशील रचना है।
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थियेटर ग्रुप के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत कहानी चीफ की दावत का निर्देशन रंगकर्मी विकास शर्मा द्वारा किया गया। हरियाणा कला परिषद के संयुक्त सहयोग से कला कीर्ति भवन में आयोजित उत्थान उत्सव के पहले दिन मुख्यअतिथि नागेंद्र शर्मा के साथ विशिष्ट अतिथि गीता जयंती मेला प्राधिकरण सदस्य सौरभ चौधरी, वरिष्ठ रंगकर्मी बृजकिशोर शर्मा, केडीबी के सदस्य अशोक रोशा सहित अन्य शामिल हुए। मंच का संचालन डाॅ. मोहित गुप्ता ने किया।
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नाटक की कहानी शामनाथ के इर्दगिर्द घूमती है, जहां अपने बॉस को खुश करने के लिए शामनाथ उन्हें घर पर दावत के लिए आमंत्रित करता है। लेकिन अपनी मां के अनपढ़ व गांव की होने के कारण उसे बॉस के सामने आने से मना कर देता है। मां दावत के लिए अपनी सहेली के घर जाने की बात करती है तो बेटा घर से बाहर जाने से मना कर देता है। बेटे के तिरस्कार और बहू की डांट के आगे मां कुछ नही बोल पाती।
घर में शामनाथ के बॉस आ जाते हैं। शामनाथ तरक्की पाने की चाह में अपने चीफ को खुश करने के लिए कोई कमी नहीं छोड़ता। मंहगी व्हीस्की और बढ़िया डिनर होने के बाद जब कहानी जब आगे बढ़ती है तो अचानक बॉस की नजर शामनाथ की मां पर पड़ती है। शामनाथ से बॉस जब बूढ़ी औरत के बारे में पूछते हैं, तो शामनाथ बताता है कि वह उसकी मां है। अनपढ़ और गांव की होने के कारण मां सबके सामने नहीं आना चाहती थी। मां को देखकर चीफ बहुत खुश होते हैं, और मां से ढ़ेर सारी बातें करते हैं। मां का बॉस से मिलना शामनाथ की तरक्की में सहायक सिद्ध होता है।
बॉस मां को एक फुलकारी बनाने को कहते हैं, मां के मना करने पर भी शामनाथ फुलकारी के लिए हां कर देता है लेकिन जब बॉस के जाने के बाद मां मना करती है, तो शामनाथ मां को फटकार लगाता है और बुरा भला कहना शुरु कर देता है। ऐसे में मां अकेली पड़ जाती है और बेटे के तिरस्कार से आहत होकर अपने प्राण छोड़ देती है। सूत्रधार कहानी का मूल अंत दिखाने के बाद दर्शकों से रुबरु होकर एक और अंत दिखाता है जिसमें शामनाथ को अपने किए पर शर्मिदंगी होती है, और वह मां से माफी मांगता है। मां अपने बेटे और बहू को माफ कर देती है और इस प्रकार नाटक का सुखद अंत होता है।





नाटक एक राग दो स्वर का मंचन आज

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उत्थान उत्सव के समापन अवसर पर आज 15 अक्तूबर को शाम साढ़े छह बजे राजेंद्र कुमार शर्मा द्वारा लिखित नाटक एक राग दो स्वर का मंचन किया जाएगा। विकास शर्मा के निर्देशन में मंचित नाटक में पति-पत्नी के रिश्ते में आई खट्टास से उनके रिश्ते पर पड़ने वाले प्रभाव को दिखाया जाएगा।
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