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समाज की दशा मानव के मन की दशा के पर निर्भर : स्वामी ज्ञानानंद
Tue, 28 Oct 2025 02:19 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
Updated Tue, 28 Oct 2025 02:19 AM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से अमिन रोड में आध्यात्मिक सत्संग समागम का आयोजन किया गया। इसमें दिव्य गुरु आशुतोष महाराज की शिष्य स्वामी ज्ञानानंद ने समाज की दशा का वर्णन किया।
उन्होंने कहा कि समाज की दशा मानव के मन की दशा के ऊपर निर्भर करती है। जब किसी वृक्ष के फलों को कीड़ा लग जाए तो उसकी जड़ों को खाद पानी और दवाई से सींचा जाता है ताकि फिर से वह वृक्ष स्वस्थ हो पाए। इसी प्रकार वैमनस्यता, स्वार्थ परायणता, भ्रष्टाचार, अशुद्ध आचरण समाज रूपी वृक्ष के रोग है जिन्हें समाप्त करने के लिए इसकी जड़ पर कार्य करना होगा और समाज का निर्माण करने वाले मानव ही इसकी जड़ हैं।
स्वामी ने इस समस्या का निदान देते हुए कहा कि समाज में परिवर्तन तभी संभव है जब समाज का निर्माण करने वाले मानव के हृदय के भीतर सकारात्मक परिवर्तन आए। मानव के हृदय परिवर्तन के लिए ब्रह्मनिष्ठ गुरु का सानिध्य अति आवश्यक है। यह तथ्य विचारणीय है कि संसार में हम छोटे से छोटा कार्य भी बिना गुरु के दिशा-निर्देश को सफलतापूर्वक सिद्ध नहीं कर सकते तो क्या हम बिना गुरु के अपने कर्म संस्कारों और अपनी बिगड़ी हुई आदतों को केवल अपने पुरुषार्थ से सुधार सकते हैं।
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कुरुक्षेत्र। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से अमिन रोड में आध्यात्मिक सत्संग समागम का आयोजन किया गया। इसमें दिव्य गुरु आशुतोष महाराज की शिष्य स्वामी ज्ञानानंद ने समाज की दशा का वर्णन किया।
उन्होंने कहा कि समाज की दशा मानव के मन की दशा के ऊपर निर्भर करती है। जब किसी वृक्ष के फलों को कीड़ा लग जाए तो उसकी जड़ों को खाद पानी और दवाई से सींचा जाता है ताकि फिर से वह वृक्ष स्वस्थ हो पाए। इसी प्रकार वैमनस्यता, स्वार्थ परायणता, भ्रष्टाचार, अशुद्ध आचरण समाज रूपी वृक्ष के रोग है जिन्हें समाप्त करने के लिए इसकी जड़ पर कार्य करना होगा और समाज का निर्माण करने वाले मानव ही इसकी जड़ हैं।
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स्वामी ने इस समस्या का निदान देते हुए कहा कि समाज में परिवर्तन तभी संभव है जब समाज का निर्माण करने वाले मानव के हृदय के भीतर सकारात्मक परिवर्तन आए। मानव के हृदय परिवर्तन के लिए ब्रह्मनिष्ठ गुरु का सानिध्य अति आवश्यक है। यह तथ्य विचारणीय है कि संसार में हम छोटे से छोटा कार्य भी बिना गुरु के दिशा-निर्देश को सफलतापूर्वक सिद्ध नहीं कर सकते तो क्या हम बिना गुरु के अपने कर्म संस्कारों और अपनी बिगड़ी हुई आदतों को केवल अपने पुरुषार्थ से सुधार सकते हैं।
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