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सुदामा चरित्र श्रीमद्भागवत व भारतीय संस्कृति में निस्वार्थ मित्रता : कौशिक
Mon, 25 May 2026 01:41 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
Updated Mon, 25 May 2026 01:41 AM IST
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कुरुक्षेत्र। श्रीमद् भागवत महापुराण कथा सुनतीं महिलाएं। स्वयं
संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। जय मां दुर्गा-जय श्री महाकाल ट्रस्ट की ओर से वार्ड-20 के गुरुदेव नगर, 7-बी में श्रीमद्भागवत महापुराण कथा हवन और भंडारे के साथ संपन्न हुई। समापन दिवस पर कथाव्यास पंडित विकास कौशिक ने सुदामा चरित्र व परीक्षित मोक्ष आदि प्रसंगों के साथ भागवत जी की शिक्षाएं बताई। उन्होंने बताया कि सुदामा चरित्र श्रीमद्भागवत और भारतीय संस्कृति में वर्णित निस्वार्थ मित्रता, प्रेम और भक्ति का भावुक प्रसंग है। यह प्रसंग बताता है कि कैसे सांसारिक ऊंच-नीच से ऊपर उठकर ईश्वर अपने भक्त को कभी अकेला नहीं छोड़ते।
उन्होंने बताया कि सुदामा भगवान श्रीकृष्ण के बचपन के परम मित्र थे। बड़े होने पर श्रीकृष्ण द्वारका के राजा बन गए जबकि सुदामा अत्यंत सादगी भरा और गरीबी का जीवन व्यतीत करने लगे। एक बार अपनी पत्नी के आग्रह पर, सुदामा अपने मित्र श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका के लिए निकल पड़े। सुदामा के कपड़ाें और दशा को देख द्वारपालों ने उन्हें रोक लिया। जब श्रीकृष्ण को सूचना मिलते ही वे नंगे पैर दौड़ते हुए गए और सुदामा को गले लगा लिया।
श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण ने सुदामा की पोटली ली और बड़े चाव से चावल खाए। जब सुदामा विदा लेकर अपने गांव लौटे, तो उन्हें अपना गांव और झोपड़ी नहीं मिली। सुदामा को श्रीकृष्ण की कृपा से अत्यंत भव्य महल प्राप्त हुआ। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्ची दोस्ती में अमीरी-गरीबी कोई मायने नहीं रखती। कथा को विश्राम देने के पश्चात हवन में सभी भक्तों ने आहुतियां दी और भंडारे में प्रसाद ग्रहण किया।
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इस दौरान काशी से सनातन शास्त्र मर्मज्ञ संत गुरुचरण दास, शुकदेव आचार्य, रुद्रपुरी प्यौदा, आचार्य अभिषेक कुश, महंत नरेश पुरी क्योड़क(कैथल), डॉ. स्वामी शंकरानंद सरस्वती, महंत वीरपुरी ग्योंग(कैथल), साध्वी कौशिकी और साध्वी डॉ. मोक्षिता आदि संत मंच पर विराजमान हुए। पूर्व राज्य मंत्री सुभाष सुधा, मुख्य यजमान पंडित राजेश मोदगिल, पार्षद मनिंदर सिंह छिंदा, अटल शर्मा, मास्टर रमेश कौशिक आदि मौजूद रहे।
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कुरुक्षेत्र। जय मां दुर्गा-जय श्री महाकाल ट्रस्ट की ओर से वार्ड-20 के गुरुदेव नगर, 7-बी में श्रीमद्भागवत महापुराण कथा हवन और भंडारे के साथ संपन्न हुई। समापन दिवस पर कथाव्यास पंडित विकास कौशिक ने सुदामा चरित्र व परीक्षित मोक्ष आदि प्रसंगों के साथ भागवत जी की शिक्षाएं बताई। उन्होंने बताया कि सुदामा चरित्र श्रीमद्भागवत और भारतीय संस्कृति में वर्णित निस्वार्थ मित्रता, प्रेम और भक्ति का भावुक प्रसंग है। यह प्रसंग बताता है कि कैसे सांसारिक ऊंच-नीच से ऊपर उठकर ईश्वर अपने भक्त को कभी अकेला नहीं छोड़ते।
उन्होंने बताया कि सुदामा भगवान श्रीकृष्ण के बचपन के परम मित्र थे। बड़े होने पर श्रीकृष्ण द्वारका के राजा बन गए जबकि सुदामा अत्यंत सादगी भरा और गरीबी का जीवन व्यतीत करने लगे। एक बार अपनी पत्नी के आग्रह पर, सुदामा अपने मित्र श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका के लिए निकल पड़े। सुदामा के कपड़ाें और दशा को देख द्वारपालों ने उन्हें रोक लिया। जब श्रीकृष्ण को सूचना मिलते ही वे नंगे पैर दौड़ते हुए गए और सुदामा को गले लगा लिया।
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श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने सिंहासन पर बैठाया। श्रीकृष्ण ने सुदामा की पोटली ली और बड़े चाव से चावल खाए। जब सुदामा विदा लेकर अपने गांव लौटे, तो उन्हें अपना गांव और झोपड़ी नहीं मिली। सुदामा को श्रीकृष्ण की कृपा से अत्यंत भव्य महल प्राप्त हुआ। यह प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्ची दोस्ती में अमीरी-गरीबी कोई मायने नहीं रखती। कथा को विश्राम देने के पश्चात हवन में सभी भक्तों ने आहुतियां दी और भंडारे में प्रसाद ग्रहण किया।
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इस दौरान काशी से सनातन शास्त्र मर्मज्ञ संत गुरुचरण दास, शुकदेव आचार्य, रुद्रपुरी प्यौदा, आचार्य अभिषेक कुश, महंत नरेश पुरी क्योड़क(कैथल), डॉ. स्वामी शंकरानंद सरस्वती, महंत वीरपुरी ग्योंग(कैथल), साध्वी कौशिकी और साध्वी डॉ. मोक्षिता आदि संत मंच पर विराजमान हुए। पूर्व राज्य मंत्री सुभाष सुधा, मुख्य यजमान पंडित राजेश मोदगिल, पार्षद मनिंदर सिंह छिंदा, अटल शर्मा, मास्टर रमेश कौशिक आदि मौजूद रहे।