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मां की सेवा की कीमत नहीं ली जाती, इसलिए स्वतंत्रता सेनानी मुजतर जी ने ताम्रपत्र सहित अन्य सुविधाएं नहीं ली
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मां की सेवा की कीमत नहीं ली जाती, यही कारण था पिताजी ने न ताम्रपत्र लिया, न पेंशन, गैस एजेंसी और न ही अन्य सुविधा। गुलामी के युग में उनसे जो बना, उसे उन्होंने मां की सेवा माना। ये कहना है कि प्रख्यात साहित्यकार और स्वतंत्रता सेनानी पंडित बाल कृष्ण मुजतर के पुत्र एडवोकेट संजय मुजतर का। संजय ने कहा कि उनका परिवार हर दम पिता को साथ महसूस करते हैं। पिता के आदर्शों पर गर्व है। वे प्रचार से दूरी अपनाते थे। यहां तक कि अपनी मृत्यु से करीब 20 वर्ष पहले उन्होंने अपनी पुस्तक दस्तावेज में लिखा कि उनकी मौत की खबर किसी को न दी जाए। गौरतलब है कि मुजतर के अंतिम संस्कार पर भी राजकीय सम्मान नहीं था।
हरियाणा का इतिहास लिखने वाले प्रख्यात इतिहासकार डॉ. केसी यादव ने भी अपनी पुस्तकों में मुजतर जी के बारे में बहुत कुछ लिखा। इसमें उन्होंने मुजतर जी के व्यक्तित्व, अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ उनकी गतिविधियां और अंबाला जेल की डायरी का जिक्र किया है, जिसमें उन्होंने लिखा कि पंडित बाल कृष्ण मुजतर आजादी की लड़ाई में एक समर्पित और मंजे सिपाही थे। अंग्रेजी साम्राज्यवाद का उन्मूलन उनका नारा था। महात्मा गांधी से प्रभावित मुजतर थे, लेकिन वे गांधी जी के नरम दल की बजाय गर्म दल के सक्रिय सदस्य बने। मुजतर जी का जन्म दो अक्तूबर 1921 में कुरुक्षेत्र के पंडित राजाराम भारद्वाज के घर हुआ। जब वे दसवीं में थे तो उनकी मुलाकात खान अब्दुल गफ्फार खान और लाला दुनीचंद अंबालवी से हुई और मुलाकात ने मुजतर पर गहरा असर छोड़ा, वे आजादी के संघर्ष में कूद पड़े।
मुजतर ने जलसे जुलूसों में बढ़चढ़ कर भाग लिया, जिनमें वे अंग्रेजों के खिलाफ भाषण और बुलंद आवाज में नारे लगाते थे। उन्होंने बीए की परीक्षा 1941 में डीएवी कॉलेज लाहौर से पास की, यहां वे विद्यार्थी फ्रंट पर सक्रिय रहे। इस दौरान उन्हें कई बार गिरफ्तार भी किया गया। ये द्वितीय महायुद्ध के दिन थे और नौजवान इस युद्ध का विरोध कर रहे थे। जब कम्युनिस्टों ने इस युद्ध को पीपल वार की संज्ञा दी तो मुजतर ने स्टूडेंट फेडरेशन से नाता तोड़ लिया और राष्ट्रवादी विद्यार्थी संघ के सक्रिय सदस्य बन गए।
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उस समय इस संगठन के नेता यश और कामरेड राजेंद्र थे। मुजतर ने यहां कई दोस्तों के साथ मिलकर मिंटोपार्क लाहौर से भूमिगत एंटी ब्रिटिश साहित्य भी छाप कर पंफलेट्स निकाले, इनमें मुख्य थे, लाल डंडोरा, लाल झंडा, मुनादी और चिंगारी, इनमें अंग्रेज शासकों की घिनौनी हरकतों और बर्बरता का जिक्र किया गया। मुजतर जी ने करीब 40 से अधिक पुस्तकें लिखीं, इनमें उनकी पुस्तक (दस्तावेज) में 1936 से 1948 तक की गतिविधियां, 1942 की अगस्त क्रांति और डॉ. राममनोहर लोहिया से मुलाकात के अलावा नेताजी सुभाष चंद्र बोस और इकबाल से हुई मुलाकात का जिक्र है। इस पुस्तक में अंबाला जेल डायरी, 29 अप्रैल 1947 से 20 मई 1947 का भी उल्लेख किया है। वहीं उन्होंने अपनी पुस्तक में एक बात का जिक्र करते हुए लिखा कि जब उन्हें अंबाला जेल में ले जाया गया तो उस समय जेल लाये जाने वाले हर व्यक्ति पर फिनायल का छिड़काव किया जाता था, ताकि व्यक्ति कोई बाहरी बीमारी लेकर जेल में न आ जाए। तब उन्होंने इसका विरोध किया। विरोध करने पर उन्हें तत्कालीन जेल अधीक्षक खरैती लाल कालिया के समक्ष पेश किया गया, जिस पर जेल अधीक्षक ने पुलिस अधिकारी से कहा कि ये पढ़े लिखे नजर आते हैं। इन पर किसी प्रकार की फिनायल का छिड़काव न किया जाए।
मुजतर जी का यह था अंतिम संदेश
मुजतर जी का देहांत 18 अप्रैल 2007 को हुआ था और उन्हें अर्थी पर लेटाकर नहीं, बल्कि श्मशान भूमि तक उनकी पारिवारिक कार में ले जाया गया। दस्तावेज में उन्होंने लिखा था कि उनके निधन पर कोई आंसू न बहाए, शव के निकट गीता का पाठ न हो, मृत्यु के समय तीनों पुत्रों में से जो भी मौजूद हो, वहीं संस्कार करे। यदि परिवार का कोई सदस्य उस समय बाहर हो तो उसे टेलीफोन या तार से सूचना न दी जाए। मृतक शरीर के पांव न छूए जाएं, महिलाएं सुहाग चिह्न न हटाएं। शवयात्रा पर भीड़ इकट्ठी न की जाए।
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हरियाणा का इतिहास लिखने वाले प्रख्यात इतिहासकार डॉ. केसी यादव ने भी अपनी पुस्तकों में मुजतर जी के बारे में बहुत कुछ लिखा। इसमें उन्होंने मुजतर जी के व्यक्तित्व, अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ उनकी गतिविधियां और अंबाला जेल की डायरी का जिक्र किया है, जिसमें उन्होंने लिखा कि पंडित बाल कृष्ण मुजतर आजादी की लड़ाई में एक समर्पित और मंजे सिपाही थे। अंग्रेजी साम्राज्यवाद का उन्मूलन उनका नारा था। महात्मा गांधी से प्रभावित मुजतर थे, लेकिन वे गांधी जी के नरम दल की बजाय गर्म दल के सक्रिय सदस्य बने। मुजतर जी का जन्म दो अक्तूबर 1921 में कुरुक्षेत्र के पंडित राजाराम भारद्वाज के घर हुआ। जब वे दसवीं में थे तो उनकी मुलाकात खान अब्दुल गफ्फार खान और लाला दुनीचंद अंबालवी से हुई और मुलाकात ने मुजतर पर गहरा असर छोड़ा, वे आजादी के संघर्ष में कूद पड़े।
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मुजतर ने जलसे जुलूसों में बढ़चढ़ कर भाग लिया, जिनमें वे अंग्रेजों के खिलाफ भाषण और बुलंद आवाज में नारे लगाते थे। उन्होंने बीए की परीक्षा 1941 में डीएवी कॉलेज लाहौर से पास की, यहां वे विद्यार्थी फ्रंट पर सक्रिय रहे। इस दौरान उन्हें कई बार गिरफ्तार भी किया गया। ये द्वितीय महायुद्ध के दिन थे और नौजवान इस युद्ध का विरोध कर रहे थे। जब कम्युनिस्टों ने इस युद्ध को पीपल वार की संज्ञा दी तो मुजतर ने स्टूडेंट फेडरेशन से नाता तोड़ लिया और राष्ट्रवादी विद्यार्थी संघ के सक्रिय सदस्य बन गए।
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उस समय इस संगठन के नेता यश और कामरेड राजेंद्र थे। मुजतर ने यहां कई दोस्तों के साथ मिलकर मिंटोपार्क लाहौर से भूमिगत एंटी ब्रिटिश साहित्य भी छाप कर पंफलेट्स निकाले, इनमें मुख्य थे, लाल डंडोरा, लाल झंडा, मुनादी और चिंगारी, इनमें अंग्रेज शासकों की घिनौनी हरकतों और बर्बरता का जिक्र किया गया। मुजतर जी ने करीब 40 से अधिक पुस्तकें लिखीं, इनमें उनकी पुस्तक (दस्तावेज) में 1936 से 1948 तक की गतिविधियां, 1942 की अगस्त क्रांति और डॉ. राममनोहर लोहिया से मुलाकात के अलावा नेताजी सुभाष चंद्र बोस और इकबाल से हुई मुलाकात का जिक्र है। इस पुस्तक में अंबाला जेल डायरी, 29 अप्रैल 1947 से 20 मई 1947 का भी उल्लेख किया है। वहीं उन्होंने अपनी पुस्तक में एक बात का जिक्र करते हुए लिखा कि जब उन्हें अंबाला जेल में ले जाया गया तो उस समय जेल लाये जाने वाले हर व्यक्ति पर फिनायल का छिड़काव किया जाता था, ताकि व्यक्ति कोई बाहरी बीमारी लेकर जेल में न आ जाए। तब उन्होंने इसका विरोध किया। विरोध करने पर उन्हें तत्कालीन जेल अधीक्षक खरैती लाल कालिया के समक्ष पेश किया गया, जिस पर जेल अधीक्षक ने पुलिस अधिकारी से कहा कि ये पढ़े लिखे नजर आते हैं। इन पर किसी प्रकार की फिनायल का छिड़काव न किया जाए।
मुजतर जी का यह था अंतिम संदेश
मुजतर जी का देहांत 18 अप्रैल 2007 को हुआ था और उन्हें अर्थी पर लेटाकर नहीं, बल्कि श्मशान भूमि तक उनकी पारिवारिक कार में ले जाया गया। दस्तावेज में उन्होंने लिखा था कि उनके निधन पर कोई आंसू न बहाए, शव के निकट गीता का पाठ न हो, मृत्यु के समय तीनों पुत्रों में से जो भी मौजूद हो, वहीं संस्कार करे। यदि परिवार का कोई सदस्य उस समय बाहर हो तो उसे टेलीफोन या तार से सूचना न दी जाए। मृतक शरीर के पांव न छूए जाएं, महिलाएं सुहाग चिह्न न हटाएं। शवयात्रा पर भीड़ इकट्ठी न की जाए।