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Kurukshetra News: आध्यात्मिक समागम का किया आगाज
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कुरुक्षेत्र। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा नई अनाज मंडी, में भव्य आध्यात्मिक सत्संग समागम का आयोजन किया गया, जिसका शुभारंभ वेद मंत्रोचारण के साथ किया गया।
कार्यक्रम के दौरान दिव्य गुरु आशुतोष की शिष्य साध्वी वैष्णवी भारती ने समाज की दशा का वर्णन करते हुए कहा कि समाज की दशा मानव के मन की दशा के ऊपर निर्भर करती है। जब किसी वृक्ष के फलों को कीड़ा लग जाए तो उसकी जड़ों को खाद पानी से सींचा जाता है ताकि फिर से वह वृक्ष स्वस्थ हो पाए।
वैमनस्यता, स्वार्थ परायणता, भ्रष्टाचार, अशुद्ध आचरण समाज रूपी वृक्ष के रोग है, जिन्हें समाप्त करने के लिए इसकी जड़ पर कार्य करना होगा और समाज का निर्माण करने वाले मानव ही इसकी जड़ हैं।
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उन्होंने कहा कि समाज में परिवर्तन तभी संभव है जब समाज का निर्माण करने वाले मानव के हृदय के भीतर सकारात्मक परिवर्तन आए। मानव के हृदय परिवर्तन के लिए ब्रह्मनिष्ठ गुरु का सानिध्य अति आवश्यक है।
संसार में हम छोटे से छोटा कार्य भी बिना गुरु के दिशा निर्देश के सफलतापूर्वक सिद्ध नहीं कर सकते तो क्या हम बिना गुरु के अपने कर्म संस्कारों को केवल अपने पुरुषार्थ से सुधार सकते हैं। जब ब्रह्मनिष्ठ संत अपने तपोबल से एकत्रित की गई ऊर्जा का शक्तिपात ब्रह्मज्ञान के द्वारा हमारी आत्मा पर करते हैं तभी हमारे जीवन की गति सकारात्मक होती है और हम प्रत्येक कार्य परोपकार की भावना और दैवीय प्रेरणा से करते हैं तब संपूर्ण मानव समाज का कल्याण होता है।
उन्होंने कहा कि समाज रूपी इस वृक्ष को अगर हम फिर से स्वस्थ करना चाहते हैं तो इसके मूल मानवीय हृदय का आज ब्रह्म ज्ञान रूपी अमृत से सिंचन होगा।
तभी समाज का वृक्ष आनंद की छाया देने वाला और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूपी फल प्रदान करने वाला होगा, जिससे हम अपने मानव होने के कर्तव्य को पूर्ण कर पाएंगे और यह इस पृथ्वी के लिए हमारा सर्वश्रेष्ठ योगदान होगा।
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कार्यक्रम के दौरान दिव्य गुरु आशुतोष की शिष्य साध्वी वैष्णवी भारती ने समाज की दशा का वर्णन करते हुए कहा कि समाज की दशा मानव के मन की दशा के ऊपर निर्भर करती है। जब किसी वृक्ष के फलों को कीड़ा लग जाए तो उसकी जड़ों को खाद पानी से सींचा जाता है ताकि फिर से वह वृक्ष स्वस्थ हो पाए।
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वैमनस्यता, स्वार्थ परायणता, भ्रष्टाचार, अशुद्ध आचरण समाज रूपी वृक्ष के रोग है, जिन्हें समाप्त करने के लिए इसकी जड़ पर कार्य करना होगा और समाज का निर्माण करने वाले मानव ही इसकी जड़ हैं।
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उन्होंने कहा कि समाज में परिवर्तन तभी संभव है जब समाज का निर्माण करने वाले मानव के हृदय के भीतर सकारात्मक परिवर्तन आए। मानव के हृदय परिवर्तन के लिए ब्रह्मनिष्ठ गुरु का सानिध्य अति आवश्यक है।
संसार में हम छोटे से छोटा कार्य भी बिना गुरु के दिशा निर्देश के सफलतापूर्वक सिद्ध नहीं कर सकते तो क्या हम बिना गुरु के अपने कर्म संस्कारों को केवल अपने पुरुषार्थ से सुधार सकते हैं। जब ब्रह्मनिष्ठ संत अपने तपोबल से एकत्रित की गई ऊर्जा का शक्तिपात ब्रह्मज्ञान के द्वारा हमारी आत्मा पर करते हैं तभी हमारे जीवन की गति सकारात्मक होती है और हम प्रत्येक कार्य परोपकार की भावना और दैवीय प्रेरणा से करते हैं तब संपूर्ण मानव समाज का कल्याण होता है।
उन्होंने कहा कि समाज रूपी इस वृक्ष को अगर हम फिर से स्वस्थ करना चाहते हैं तो इसके मूल मानवीय हृदय का आज ब्रह्म ज्ञान रूपी अमृत से सिंचन होगा।
तभी समाज का वृक्ष आनंद की छाया देने वाला और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूपी फल प्रदान करने वाला होगा, जिससे हम अपने मानव होने के कर्तव्य को पूर्ण कर पाएंगे और यह इस पृथ्वी के लिए हमारा सर्वश्रेष्ठ योगदान होगा।

अभिनेता शाहरूख खान के साथ खड़ा अंबाला का वैभव अरोड़ा:

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