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रोजाना एक कटोरी चावल पर सात साल सिंगापुर में बिताए

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 23 Jan 2022 02:12 AM IST
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Spent seven years in Singapore on a bowl of rice a day, Kurukshetra
आईएनए के सिपाही रहे जगीर सिंह को सम्मानित करतीं तत्कालीन डीसी सुमेधा कटारिया। (फाइल फोटो) - फोटो : Kurukshetra
संवाद न्यूज एजेंसी
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पिहोवा। न दाल न रोटी, सिर्फ रोजाना मिलने वाले एक कटोरी चावल पर सात साल सिंगापुर में बिताए। इस दौरान खंभों के साथ बांधकर सैनिकों के साथ होने वाले अत्याचारों को भी अपनी आंखों से देखा। अत्याचारों को देखकर भी आजादी के दीवानों के पैर नहीं डगमगाए। आखिरकार आजाद देश भारत में खुली हवा में सांस लेने का मौका मिला। ये दास्तां है आजाद हिंद फौज (आईएनए) के सिपाही स्वतंत्रता सेनानी जगीर सिंह की। पिता की यह यादें बेटे त्रिलोचन सिंह वासी कराह साहिब ने विशेष बातचीत में साझा कीं।
त्रिलोचन सिंह ने बताया कि उनका बचपन और जवानी नेताजी सुभाषचंद्र बोस की बहादुरी और वीरता के किस्से सुनकर गुजरा। उनके पिता जगीर सिंह नेताजी के किस्से सुनाकर उनमें जोश भर देते थे। भले ही उनके पिता जगीर सिंह आज इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उनकी बातें आज भी उन्हेें हिम्मत और जोश देते है। तीन साल पहले 8 जुलाई को जगीर सिंह का निधन हो गया था। पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।
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त्रिलोचन सिंह ने बताया कि उनके पिता जगीर सिंह का जन्म 1921 में पंजाब के बल्लू माजरा में हुआ था। खेतीबाड़ी करके वह अपने परिवार का पालन करते थे। पिता शुरू से नेताजी सुभाषचंद्र बोस से काफी प्रभावित थे। वे 1939 में अंबाला छावनी में आईएनए में भर्ती हुए थे। आईएनए में भर्ती होने के बाद उन्हें रोड स्टार, जौहर बारु के बाद सिंगापुर में देशसेवा करने का अवसर मिला। सिंगापुर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के कई बार विचार भी सुनें। उन्होंने बताया कि सिंगापुर में नेताजी ने उनके पिता व अन्य सैनिकों को एकत्रित करके अपने भाषण में कहा था कि सभी अपने देश लौट जाओ, मैं अब सिंगापुर छोड़कर जा रहा हूं। हमारा सिंगापुर में जितना कार्य और मकसद था, वह पूरा हो चुका है अब सभी आजाद देश भारत में मिलेंगे, लेकिन इसके बाद कभी नेता जी नहीं मिले और न ही उनकी आवाज सुनने को मिली।
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नेताजी के जाने के बाद सिंगापुर में हड़ताल होने के कारण स्थिति बिगड़ती गई और उनको सात साल सिंगापुर में बिताने पड़े थे। जहां उनको न रोटी मिली न ही दाल, सिर्फ रोजाना एक कटोरी मिलने वाले चावल से गुजारा करना पड़ा था। इस दौरान उन्होंने सैनिकों के साथ हुए अत्याचारों को भी अपनी आंखों से देखा। इस दौरान उन्हें वहां नेताजी की मृत्यु की सूचना भी मिली, जिस पर किसी को विश्वास नहीं हुआ था, लेकिन नेताजी के प्रयासों से देश को आजादी मिल गई। वे वापस अपने आजाद देश में भी आ गए थे।
त्रिलोचन सिंह ने बताया कि उनके पिता जगीर सिंह ने कभी नेताजी की मौत का विश्वास नहीं किया और हरदम उनकी सलामती की दुआ भी की। अपने आखिरी समय में भी उन्होंने नेताजी से मिलने की उम्मीद को नहीं छोड़ा। आज भले ही उनके पिता जगीर सिंह उनके साथ नहीं है, लेकिन उनकी बातें आज भी उनको व उनके बच्चों के लिए प्रेरणा है। उनके पोते-पड़पोते उनके दिखाए रास्ते पर ही चल रहे हैं।

नहीं मिली दो महीने की पेंशन : त्रिलोचन सिंह
त्रिलोचन सिंह ने बताया कि उनके पिता जगीर सिंह की मृत्यु से पहले उनकी दो महीने की पेंशन बकाया है। इस मामले को लेकर वह डीसी को भी शिकायत कर चुके हैं, कोई सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने सीएम को भी डाक से पत्र भेजा था। अभी भी उनके पिता की दो महीने की पेंशन अटकी है।
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