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सिंगापुर में नेताजी ने कहा था अब आजाद भारत में मिलेंगे, फिर नहीं सुनीं उनकी आवाज
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न दाल न रोटी, सिर्फ रोजाना मिलने वाले एक कटोरी चावल पर सात साल सिंगापुर में बिताए। इस दौरान खंभों के साथ बांधकर सैनिकों के साथ होने वाले अत्याचारों को भी देखा, लेकिन इन अत्याचारों को देखकर भी आजादी के दीवानों के पैर नहीं डगमगाए। आखिरकार आजाद देश भारत में खुली हवा में सांस लेने का मौका मिला। ये दास्तान है आजाद हिंद फौज (आईएनए) के सिपाही स्वतंत्रता सेनानी जगीर सिंह की। इस दास्तां को उनके बेटे त्रिलोचन सिंह वासी कराह साहिब ने साझा किया।
त्रिलोचन सिंह ने बताया कि उनका बचपन और जवानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बहादुरी और वीरता के किस्से सुनकर बीता। उनके पिता जगीर सिंह नेताजी के किस्से सुनाकर उसमें जोश भर देते थे। भले ही उनके पिता जगीर सिंह आज इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उनकी बातें आज भी उनको हिम्मत और जोश देती हैं।
बताया कि उनके पिता जगीर सिंह का जन्म 1921 में पंजाब के बल्लू माजरा में हुआ था। खेती बाड़ी करके वह अपने परिवार का पालन करते थे। उनके पिता शुरू से नेताजी सुभाष चंद्र बोस से काफी प्रभावित थे। उनसे प्रभावित होकर उन्होंने 1939 में अंबाला छावनी में आईएनए में भर्ती हुए थे। आईएनए में भर्ती होने के बाद उन्हें रोड स्टार, जौहर बारु के बाद सिंगापुर में देशसेवा करने का अवसर मिला। सिंगापुर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के कई बार विचार भी सुने।
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उन्होंने बताया कि सिंगापुर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपने सिपाहियों को एकत्रित करके अपने भाषण में कहा था कि सभी अपने देश को लौट जाओ, मैं अब सिंगापुर छोड़कर जा रहा हूं। हमारा सिंगापुर में जितना काम और मकसद था वह पूरा हो चुका हैं। अब आजाद देश भारत में मिलेंगे, लेकिन इसके बाद कभी नेता जी नहीं मिले और न ही उनकी आवाज सुनने को मिली।
बताया कि नेताजी के सिंगापुर से जाने के बाद वहां हड़ताल के कारण स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ती गई। उनको सात साल सिंगापुर में ही बिताने पड़े थे। इस दौरान उनको न रोटी मिली न ही दाल, सिर्फ रोजाना एक कटोरी मिलने वाले चावल से गुजारा करना पड़ा था। उन्होंने सैनिकों के साथ हुए अत्याचारों को भी देखा। बाद में उनको वहां नेताजी की मृत्यु की सूचना भी मिली। इस पर किसी को विश्वास नहीं हुआ था, लेकिन नेताजी के प्रयासों से देश को आजादी मिल गई थी।
त्रिलोचन सिंह ने बताया कि देश आजाद होने के बाद वह अपने आजाद देश लौट आए, उनको दोबारा नेताजी की आवाज सुनने को नहीं मिली। उनके पिता जगीर सिंह ने कभी नेताजी की मृत्यु पर यकीन नहीं किया। हरदम उनकी सलामती की दुआ भी की। अपने आखिरी समय में भी उन्होंने नेताजी से मिलने की उम्मीद को नहीं छोड़ा। आज भले ही उनके पिता जगीर सिंह उनको साथ नहीं है, लेकिन उनकी बातें आज भी उनको व उनके बच्चों के लिए प्रेरणा है। उनके पोते-पड़पोते उनके दिखाए रास्ते पर ही चल रहे हैं।
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त्रिलोचन सिंह ने बताया कि उनका बचपन और जवानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की बहादुरी और वीरता के किस्से सुनकर बीता। उनके पिता जगीर सिंह नेताजी के किस्से सुनाकर उसमें जोश भर देते थे। भले ही उनके पिता जगीर सिंह आज इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उनकी बातें आज भी उनको हिम्मत और जोश देती हैं।
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बताया कि उनके पिता जगीर सिंह का जन्म 1921 में पंजाब के बल्लू माजरा में हुआ था। खेती बाड़ी करके वह अपने परिवार का पालन करते थे। उनके पिता शुरू से नेताजी सुभाष चंद्र बोस से काफी प्रभावित थे। उनसे प्रभावित होकर उन्होंने 1939 में अंबाला छावनी में आईएनए में भर्ती हुए थे। आईएनए में भर्ती होने के बाद उन्हें रोड स्टार, जौहर बारु के बाद सिंगापुर में देशसेवा करने का अवसर मिला। सिंगापुर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के कई बार विचार भी सुने।
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उन्होंने बताया कि सिंगापुर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपने सिपाहियों को एकत्रित करके अपने भाषण में कहा था कि सभी अपने देश को लौट जाओ, मैं अब सिंगापुर छोड़कर जा रहा हूं। हमारा सिंगापुर में जितना काम और मकसद था वह पूरा हो चुका हैं। अब आजाद देश भारत में मिलेंगे, लेकिन इसके बाद कभी नेता जी नहीं मिले और न ही उनकी आवाज सुनने को मिली।
बताया कि नेताजी के सिंगापुर से जाने के बाद वहां हड़ताल के कारण स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ती गई। उनको सात साल सिंगापुर में ही बिताने पड़े थे। इस दौरान उनको न रोटी मिली न ही दाल, सिर्फ रोजाना एक कटोरी मिलने वाले चावल से गुजारा करना पड़ा था। उन्होंने सैनिकों के साथ हुए अत्याचारों को भी देखा। बाद में उनको वहां नेताजी की मृत्यु की सूचना भी मिली। इस पर किसी को विश्वास नहीं हुआ था, लेकिन नेताजी के प्रयासों से देश को आजादी मिल गई थी।
त्रिलोचन सिंह ने बताया कि देश आजाद होने के बाद वह अपने आजाद देश लौट आए, उनको दोबारा नेताजी की आवाज सुनने को नहीं मिली। उनके पिता जगीर सिंह ने कभी नेताजी की मृत्यु पर यकीन नहीं किया। हरदम उनकी सलामती की दुआ भी की। अपने आखिरी समय में भी उन्होंने नेताजी से मिलने की उम्मीद को नहीं छोड़ा। आज भले ही उनके पिता जगीर सिंह उनको साथ नहीं है, लेकिन उनकी बातें आज भी उनको व उनके बच्चों के लिए प्रेरणा है। उनके पोते-पड़पोते उनके दिखाए रास्ते पर ही चल रहे हैं।