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Kurukshetra News: भूमि विवाद मामले में शशि बाला की याचिका खारिज
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कुरुक्षेत्र। सिविल जज सीनियर डिवीजन दवेंद्र की अदालत ने सिरसाला गांव के एक चर्चित भूमि विवाद मामले में अपना फैसला सुनाया है। शशि बाला बनाम गुरदयाल सिंह और अन्य में दायर याचिका को लागत सहित खारिज कर दिया गया। यह मामला 601 कनाल 18 मरला भूमि के बंटवारे से जुड़ा था जिसमें शशि बाला ने बंटवारा आदेशों को चुनौती दी थी। विशेष रूप से खसरा नंबर 61/4 में रास्ते के आवंटन को लेकर चुनौती दी गई थी।
सेक्टर 5 निवासी शशि बाला ने 30 मार्च को सिविल कोर्ट में याचिका दायर की थी। उन्होंने 31 जनवरी 2008, 16 अप्रैल 2008, 6 अगस्त 2008 और 21 अगस्त 2008 के बंटवारा आदेशों को अवैध, अप्रभावी और गैर-कानूनी घोषित करने की मांग की थी। ये आदेश गुरदयाल सिंह बनाम साधु राम आदि के तहत पारित किए गए थे। शशि बाला ने दावा किया कि खसरा नंबर 61/4 में रास्ता गलत तरीके से दर्शाया गया जिससे उनकी संपत्ति प्रभावित हुई। उन्होंने स्थायी निषेधाज्ञा (स्टे) की भी मांग की थी ताकि प्रतिवादी उन्हें इस भूमि से बेदखल न कर सकें।
शशि बाला ने तर्क दिया कि उन्होंने 2007 में विभिन्न बिक्री पत्रों के माध्यम से 28 कनाल एक मरला भूमि खरीदी थी और वे खसरा नंबर 61/4 सहित अन्य खसरा नंबरों पर कब्जे में थी। उनका दावा था कि बंटवारा कार्रवाई में उन्हें पक्षकार नहीं बनाया गया और न ही उन्हें कोई नोटिस दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। उन्होंने यह भी कहा कि बंटवारा प्रक्रिया में अनियमितताएं थीं और खसरा नंबर 61/4/1 में रास्ता गलत तरीके से चिह्नित किया गया जबकि वे उस पर कब्जा रखती थीं। इस दावे के समर्थन में उन्होंने एक स्थानीय आयुक्त की रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें कहा गया कि उक्त भूमि पर कोई रास्ता मौजूद नहीं है और वहां उनकी गेहूं की फसल थी।
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प्रतिवादी बलजीत कौर व अन्य ने तर्क दिया कि सिविल कोर्ट का इस मामले में कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है, क्योंकि पंजाब भूमि राजस्व अधिनियम की धारा 158 के तहत ऐसी कार्रवाइयों पर सिविल कोर्ट का क्षेत्राधिकार प्रतिबंधित है। उन्होंने कहा कि बंटवारा कार्रवाई 2003 में शुरू हुई थी, जब शशि बाला सह-मालिक नहीं थीं। उन्होंने 2007 में भूमि खरीदी और उनके विक्रेताओं को बंटवारा कार्रवाई की जानकारी थी। प्रतिवादियों ने यह भी दावा किया कि बंटवारा कार्यवाही पूरी तरह से वैध थी और खसरा नंबर 61/4/1 में रास्ता उनके हिस्से में आया था। उन्होंने स्थानीय आयुक्त की रिपोर्ट को यह कहकर खारिज किया कि यह उनके अनुपस्थिति में तैयार की गई थी।
न्यायाधीश दवेंद्र ने अपने 31 पृष्ठों के फैसले में कहा कि बंटवारा कार्रवाई में कोई बड़ी प्रक्रियात्मक त्रुटि नहीं थी। हालांकि कुछ छोटी अनियमितताएं थीं, जैसे सह-मालिकों की संख्या में बदलाव लेकिन ये प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करने वाली नहीं थी। अदालत ने माना कि शशि बाला को बंटवारा कार्रवाई की जानकारी थी या होनी चाहिए थी, क्योंकि उनके विक्रेताओं को इसकी जानकारी थी। उन्हें कार्रवाई में शामिल होने के लिए आवेदन करना चाहिए था, जो उन्होंने नहीं किया। अदालत ने यह भी कहा कि सिविल कोर्ट का क्षेत्राधिकार पंजाब भूमि राजस्व अधिनियम के तहत प्रतिबंधित है और शशि बाला को राजस्व अधिकारियों के समक्ष अपील या पुनरीक्षण का सहारा लेना चाहिए था। इसलिए उनकी याचिका को खारिज कर दिया गया और प्रतिवादियों के पक्ष में लागत सहित आदेश पारित किया गया।
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सेक्टर 5 निवासी शशि बाला ने 30 मार्च को सिविल कोर्ट में याचिका दायर की थी। उन्होंने 31 जनवरी 2008, 16 अप्रैल 2008, 6 अगस्त 2008 और 21 अगस्त 2008 के बंटवारा आदेशों को अवैध, अप्रभावी और गैर-कानूनी घोषित करने की मांग की थी। ये आदेश गुरदयाल सिंह बनाम साधु राम आदि के तहत पारित किए गए थे। शशि बाला ने दावा किया कि खसरा नंबर 61/4 में रास्ता गलत तरीके से दर्शाया गया जिससे उनकी संपत्ति प्रभावित हुई। उन्होंने स्थायी निषेधाज्ञा (स्टे) की भी मांग की थी ताकि प्रतिवादी उन्हें इस भूमि से बेदखल न कर सकें।
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शशि बाला ने तर्क दिया कि उन्होंने 2007 में विभिन्न बिक्री पत्रों के माध्यम से 28 कनाल एक मरला भूमि खरीदी थी और वे खसरा नंबर 61/4 सहित अन्य खसरा नंबरों पर कब्जे में थी। उनका दावा था कि बंटवारा कार्रवाई में उन्हें पक्षकार नहीं बनाया गया और न ही उन्हें कोई नोटिस दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। उन्होंने यह भी कहा कि बंटवारा प्रक्रिया में अनियमितताएं थीं और खसरा नंबर 61/4/1 में रास्ता गलत तरीके से चिह्नित किया गया जबकि वे उस पर कब्जा रखती थीं। इस दावे के समर्थन में उन्होंने एक स्थानीय आयुक्त की रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें कहा गया कि उक्त भूमि पर कोई रास्ता मौजूद नहीं है और वहां उनकी गेहूं की फसल थी।
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प्रतिवादी बलजीत कौर व अन्य ने तर्क दिया कि सिविल कोर्ट का इस मामले में कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है, क्योंकि पंजाब भूमि राजस्व अधिनियम की धारा 158 के तहत ऐसी कार्रवाइयों पर सिविल कोर्ट का क्षेत्राधिकार प्रतिबंधित है। उन्होंने कहा कि बंटवारा कार्रवाई 2003 में शुरू हुई थी, जब शशि बाला सह-मालिक नहीं थीं। उन्होंने 2007 में भूमि खरीदी और उनके विक्रेताओं को बंटवारा कार्रवाई की जानकारी थी। प्रतिवादियों ने यह भी दावा किया कि बंटवारा कार्यवाही पूरी तरह से वैध थी और खसरा नंबर 61/4/1 में रास्ता उनके हिस्से में आया था। उन्होंने स्थानीय आयुक्त की रिपोर्ट को यह कहकर खारिज किया कि यह उनके अनुपस्थिति में तैयार की गई थी।
न्यायाधीश दवेंद्र ने अपने 31 पृष्ठों के फैसले में कहा कि बंटवारा कार्रवाई में कोई बड़ी प्रक्रियात्मक त्रुटि नहीं थी। हालांकि कुछ छोटी अनियमितताएं थीं, जैसे सह-मालिकों की संख्या में बदलाव लेकिन ये प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करने वाली नहीं थी। अदालत ने माना कि शशि बाला को बंटवारा कार्रवाई की जानकारी थी या होनी चाहिए थी, क्योंकि उनके विक्रेताओं को इसकी जानकारी थी। उन्हें कार्रवाई में शामिल होने के लिए आवेदन करना चाहिए था, जो उन्होंने नहीं किया। अदालत ने यह भी कहा कि सिविल कोर्ट का क्षेत्राधिकार पंजाब भूमि राजस्व अधिनियम के तहत प्रतिबंधित है और शशि बाला को राजस्व अधिकारियों के समक्ष अपील या पुनरीक्षण का सहारा लेना चाहिए था। इसलिए उनकी याचिका को खारिज कर दिया गया और प्रतिवादियों के पक्ष में लागत सहित आदेश पारित किया गया।