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सपनों का पीछा कर ईमानदारी से पूरा करें
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रत्नावली महोत्सव में अपनी बात रखते फिल्म अभिनेता राजेंद्र गुप्ता। संवाद
- फोटो : Kurukshetra
संवाद न्यूज एजेंसी
कुरुक्षेत्र। युवा अपने सपनों का पीछा करें उन्हें पूरा करें। जिसको जो अच्छा लगता है वो ईमानदारी से बिना किसी को नुकसान पहुंचाए पूरा करें। इसको पूरा करने में समय तो लग सकता है। अपनी मेहनत व कोशिश पर विश्वास रखें व दूसरे का नुकसान न करें, मंजिल तक जरूर पहुंच जाएंगे। सफलता का यह मंत्र कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के राज्य स्तरीय रत्नावली समारोह में रविवार को ऑडिटोरियम हाल में फिल्म अभिनेता एवं केयू के एलुमनाई राजेंद्र गुप्ता ने दिया।
वे यहां युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग के निदेशक डॉ. महासिंह पूनिया ने संवाद कर रहे थे। उन्होंने अपनी जीवन यात्रा के बारे में बताया कि उन्होंने अपने परिवार वालो की इच्छा के विरुद्ध एक्टिंग को अपने कॅरियर के रूप में चुना और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ने दाखिला लिया। उन्होंने बताया कि जो व्यक्ति संवेदनाओं को कुचल सकता है वो बिजनेस में सफल होता है, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और अभिनय को अपने कॅरियर के रूप में चुना।
राजेंद्र गुप्ता ने कहा कि नाटक एक खेल है जो पढ़ाई की तरह बोरिंग नहीं है। नाटक में भावनाओं एवं मानवीय मूल्यों का समावेश होता है। उन्होंने पुरानी यादें ताजा करते हुए कहा कि वे कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में वर्ष 1963 में यूनिवर्सिटी कॉलेज के बीएससी कैमिस्ट्री आनर्स के विद्यार्थी रहें हैं तथा उसी समय में सुप्रसिद्ध गजल गायक जगजीत सिंह भी स्नातकोत्तर कक्षा में पढ़ते थे। उन्होंने कहा कि इतने बड़े स्तर पर रत्नावली का आयोजन हरियाणवी संस्कृति को लेकर किया जा रहा है वो काबिल-ए-तारीफ है।
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अभिनेता एवं कलाकार राजेंद्र गुप्ता ने बताया कि वे फिल्म लगान, पृथ्वीराज चौहान सहित नाटक तलाश, इंतजार, चिड़ियाघर एवं चंद्रकांता में अभिनय कर चुके हैं। दर्शकों ने उन्हें भरपूर प्यार दिया है। उन्होंने हरियाणवी फिल्म दादा लख्मी चंद में अपने रोल के बारे में बताया तथा कहा कि यह एक महत्वपूर्ण फिल्म है। इसे सभी लोग देखें व इसका आनंद उठाए। अच्छा कार्य करें आपका काम बोलता है। उन्होंने राजेश्वर वशिष्ठ की कविता भी सुनाई। मर चुका है रावण का शरीर स्तब्ध है सारी लंका सुनसान है किले कही कोई उत्साह नहीं कहीं नहीं चल रहा है कोई दिया। उन्होंने हूबनाथ पांडेय की लिखित कविता सबसे बड़ा झूठ है कि अमर है आत्मा, मरी हुई आत्माओं की शव यात्रा में कई बार शामिल हुआ हूं मैं, कभी-कभी देह से पहले ही मर जाती है आत्मा जिसकी लाश उठाए हुए घिसटते देखे हैं मैने अनगिनत देह को बड़े ही शायराना अंदाज में सुनाया जिसको सभी ने ध्यानपूर्वक सुना।
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कुरुक्षेत्र। युवा अपने सपनों का पीछा करें उन्हें पूरा करें। जिसको जो अच्छा लगता है वो ईमानदारी से बिना किसी को नुकसान पहुंचाए पूरा करें। इसको पूरा करने में समय तो लग सकता है। अपनी मेहनत व कोशिश पर विश्वास रखें व दूसरे का नुकसान न करें, मंजिल तक जरूर पहुंच जाएंगे। सफलता का यह मंत्र कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के राज्य स्तरीय रत्नावली समारोह में रविवार को ऑडिटोरियम हाल में फिल्म अभिनेता एवं केयू के एलुमनाई राजेंद्र गुप्ता ने दिया।
वे यहां युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग के निदेशक डॉ. महासिंह पूनिया ने संवाद कर रहे थे। उन्होंने अपनी जीवन यात्रा के बारे में बताया कि उन्होंने अपने परिवार वालो की इच्छा के विरुद्ध एक्टिंग को अपने कॅरियर के रूप में चुना और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ने दाखिला लिया। उन्होंने बताया कि जो व्यक्ति संवेदनाओं को कुचल सकता है वो बिजनेस में सफल होता है, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और अभिनय को अपने कॅरियर के रूप में चुना।
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राजेंद्र गुप्ता ने कहा कि नाटक एक खेल है जो पढ़ाई की तरह बोरिंग नहीं है। नाटक में भावनाओं एवं मानवीय मूल्यों का समावेश होता है। उन्होंने पुरानी यादें ताजा करते हुए कहा कि वे कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में वर्ष 1963 में यूनिवर्सिटी कॉलेज के बीएससी कैमिस्ट्री आनर्स के विद्यार्थी रहें हैं तथा उसी समय में सुप्रसिद्ध गजल गायक जगजीत सिंह भी स्नातकोत्तर कक्षा में पढ़ते थे। उन्होंने कहा कि इतने बड़े स्तर पर रत्नावली का आयोजन हरियाणवी संस्कृति को लेकर किया जा रहा है वो काबिल-ए-तारीफ है।
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अभिनेता एवं कलाकार राजेंद्र गुप्ता ने बताया कि वे फिल्म लगान, पृथ्वीराज चौहान सहित नाटक तलाश, इंतजार, चिड़ियाघर एवं चंद्रकांता में अभिनय कर चुके हैं। दर्शकों ने उन्हें भरपूर प्यार दिया है। उन्होंने हरियाणवी फिल्म दादा लख्मी चंद में अपने रोल के बारे में बताया तथा कहा कि यह एक महत्वपूर्ण फिल्म है। इसे सभी लोग देखें व इसका आनंद उठाए। अच्छा कार्य करें आपका काम बोलता है। उन्होंने राजेश्वर वशिष्ठ की कविता भी सुनाई। मर चुका है रावण का शरीर स्तब्ध है सारी लंका सुनसान है किले कही कोई उत्साह नहीं कहीं नहीं चल रहा है कोई दिया। उन्होंने हूबनाथ पांडेय की लिखित कविता सबसे बड़ा झूठ है कि अमर है आत्मा, मरी हुई आत्माओं की शव यात्रा में कई बार शामिल हुआ हूं मैं, कभी-कभी देह से पहले ही मर जाती है आत्मा जिसकी लाश उठाए हुए घिसटते देखे हैं मैने अनगिनत देह को बड़े ही शायराना अंदाज में सुनाया जिसको सभी ने ध्यानपूर्वक सुना।