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प्रभु से अपने मजीठे रंगने की प्रार्थना करें : साैम्या भारती
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कुरुक्षेत्र। श्रीकृष्ण कथा के दौरान भजनों पर झूमती महिला श्रद्धालु।
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कुरुक्षेत्र। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से प्रोफेसर कॉलोनी में सात दिवसीय श्रीकृष्ण कथा के पांचवें दिन शिष्या साध्वी सौम्या भारती ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण पावन लीला से प्रेरणा दे रहे हैं।
वे कहते हैं कि हर जीव का जन्म इस संसार में प्रभु कि भक्ति को पाने के लिए हुआ हैं। सौभाग्यशाली है वह जीव जो अपनी आत्मा पर प्रभु भक्ति के रंग को लगाकर सदा के लिए प्रभु भक्त बनने का श्रेय प्राप्त कर लेते हैं जैसे गोपियां, राधा, मीरा और अर्जुन कई भक्तों ने अपनी आत्मा को प्रभु भक्ति के रंग में रंग लिया। उन्होंने कहा कि होली का पावन पर्व जीव आत्मा को प्रभु के रंग में रंगने का संदेश हैं, क्योंकि होली का आध्यात्मिक अर्थ भी है।
होली अर्थात हो गई! कौन किसका गया महापुरुषों के अनुसार यहां आत्मा और परमात्मा की बात की है। आत्मा उस परमात्मा की हो गई। ऐसी ही होली खेली थी, गोपियों ने कान्हा के संग। परंतु आज यह सास्कृतिक पर्व इतना वीभत्स रूप ले चुका हैं। गंदगी भरे प्रदर्शन, अश्लीलता, गलत हरकतें हर तरह के निम्न स्वरूप धारण कर चुका हैं। होली के पवित्र रंग बदरंग हो चले हैं। मस्ती की आड़ में द्वेष और वासना खुला नृत्य कर रहे हैं।
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इसलिए आज जरूरत है कि हम सभी फिर से इस कि गरिमा को समझे जो भक्ति भावना को बढ़ाने की दिव्य प्रेरणा यह पर्व हमें दे रहा है। इसी रंग में रंगी थी भक्त मीरा बाई जिस पर फिर संसार का कोई और रंग नही चढ़ा हम भी प्रभु से उसी भक्ति के रंग कि मांग करे आज तक न जाने कितने वसंत संसार के कच्चे फीके रंगों से अपने तन को रंगा है। पर अब प्रभु से प्रार्थना करे कि हमें भी अपने मजीठे रंग में रंग दे। कथा की समाप्ति आरती से की गई।
वे कहते हैं कि हर जीव का जन्म इस संसार में प्रभु कि भक्ति को पाने के लिए हुआ हैं। सौभाग्यशाली है वह जीव जो अपनी आत्मा पर प्रभु भक्ति के रंग को लगाकर सदा के लिए प्रभु भक्त बनने का श्रेय प्राप्त कर लेते हैं जैसे गोपियां, राधा, मीरा और अर्जुन कई भक्तों ने अपनी आत्मा को प्रभु भक्ति के रंग में रंग लिया। उन्होंने कहा कि होली का पावन पर्व जीव आत्मा को प्रभु के रंग में रंगने का संदेश हैं, क्योंकि होली का आध्यात्मिक अर्थ भी है।
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होली अर्थात हो गई! कौन किसका गया महापुरुषों के अनुसार यहां आत्मा और परमात्मा की बात की है। आत्मा उस परमात्मा की हो गई। ऐसी ही होली खेली थी, गोपियों ने कान्हा के संग। परंतु आज यह सास्कृतिक पर्व इतना वीभत्स रूप ले चुका हैं। गंदगी भरे प्रदर्शन, अश्लीलता, गलत हरकतें हर तरह के निम्न स्वरूप धारण कर चुका हैं। होली के पवित्र रंग बदरंग हो चले हैं। मस्ती की आड़ में द्वेष और वासना खुला नृत्य कर रहे हैं।
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इसलिए आज जरूरत है कि हम सभी फिर से इस कि गरिमा को समझे जो भक्ति भावना को बढ़ाने की दिव्य प्रेरणा यह पर्व हमें दे रहा है। इसी रंग में रंगी थी भक्त मीरा बाई जिस पर फिर संसार का कोई और रंग नही चढ़ा हम भी प्रभु से उसी भक्ति के रंग कि मांग करे आज तक न जाने कितने वसंत संसार के कच्चे फीके रंगों से अपने तन को रंगा है। पर अब प्रभु से प्रार्थना करे कि हमें भी अपने मजीठे रंग में रंग दे। कथा की समाप्ति आरती से की गई।