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Kurukshetra News: पूर्णिमा तिथि से आरंभ होगा पितृपक्ष, 16 दिन तक पृथ्वी पर वास करेंगे पितर

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 28 Sep 2023 02:13 AM IST
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Pitru Paksha will start from Purnima Tithi, ancestors will reside on earth for 16 days
कुरुक्षेत्र। भाद्र मास की पूर्णिमा (29 सितंबर) से पितृ पक्ष का आरंभ होने जा रहा है। मान्यता है कि पितृपक्ष के 16 दिन पितर परलोक से धरती पर वास करते हैं। पितृपक्ष में पितृ ऋण से मुक्ति के लिए पिंडदान, गतिकर्म व श्राद्ध कर्म करने की परंपरा है। इसके लिए श्रद्धालु विभिन्न तीर्थों पर पितरों के निमित्त पूजा करते हैं। इन तीर्थों में शामिल सरस्वती तीर्थ पिहोवा पितरों के मुक्तिधाम के लिए विश्व विख्यात है।
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उल्लेखनीय है कि जिस तरह हरिद्वार में अस्थि विसर्जन, कुरुक्षेत्र ब्रह्मसरोवर व सन्निहित सरोवर में सूर्यग्रहण स्नान, कपाल मोचन में ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति का तीर्थ है, उसी तरह सरस्वती तीर्थ, फल्गु तीर्थ (फरल) तथा गयाजी पितृ मोक्ष के तीर्थ हैं। पुराणों में सरस्वती तीर्थ को सर्वश्रेष्ठ तीर्थ की संज्ञा दी गई है। इस तीर्थ के बारे में उल्लिखित है कि आध गया पिहोवा, पूर्ण गया गयाजी अर्थात श्राद्ध कर्म के लिए गयाजी जाने से पूर्व सरस्वती तीर्थ में पिंडदान कराना आवश्यक है। यहां पिंडदान किए बगैर गयाजी में किया गया कर्म व्यर्थ समझा जाएगा। फल्गु तीर्थ में भी कर्म करने से पहले इस तीर्थ में पिंडदान अति आवश्यक है। मान्यता है कि सरस्वती तीर्थ में किया गया दान, पुण्य व पाप 13 दिन तक 13 गुणा तक फलीभूत होता है।
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अन्न से बने पिंड की होती है पूजा
तीर्थ पुरोहित परवेश कौशिक ने बताया कि सरस्वती तीर्थ पर अन्न से बने पिंड को मृतक जीव का स्वरूप मानकर उनकी पूजा कराई जाती है। तत्पश्चात इस पिंड का जल से तर्पण किया जाता है। पिंडदान से पूर्व नवग्रह शांति की पूजा होती है। हालांकि यहां सालभर पिंडदान का कार्य होता है, मगर चैत्र चौदस, अमावस और विशेषकर पितृपक्ष में पिंडदान करने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि पितृगण तीर्थ पर विराजमान होकर यजमान द्वारा किए गए पिंड को ग्रहण करते हैं।
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पितृ ऋण से मुक्ति का कर्म श्राद्ध
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परवेश कौशिक ने बताया कि मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान पितर परलोक से आकर धरती पर वास करते हैं। कुछ स्थानों पर श्राद्ध को कनागत कहा जाता है, क्योंकि इस दौरान सूर्य कन्या राशि में संचार करते हैं। पितृ ऋण से मुक्ति के लिए ही पितृ पक्ष के 16 दिनों में पितरों के निमित्त कर्म का विधान शास्त्रों में वर्णित है। यहां के तीर्थ पुरोहिताें के पास 250 साल से ज्यादा का विभिन्न जातीय वंशावली बहियों में दर्ज है।

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सरस्वती तीर्थ का महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार पृथ्वी के प्रथम महाराजा पृथु के पिता राजा वेन कोढ़ से ग्रस्त थे। पृथुदक (पिहोवा) के सरस्वती तीर्थ में स्नान करने से राजा वेन कोढ़ रोग से मुक्त हो गए थे। जिस स्थान पर राजा वेन रोग से मुक्त हुए थे, उसी स्थान पर पृथु ने उनका श्राद्ध व तर्पण था। वहीं द्वापर के अंत में भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर पांडव युधिष्ठिर ने महाभारत युद्ध में मारे गए अपने संगे-संबंधियों और योद्धाओं की आत्मिक शांति के लिए सरस्वती तीर्थ पर पिंडदान किया था।
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