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तीर्थों में श्राद्ध करने से पितर सर्वदा संतुष्ट रहते हैं : सुरेश
ब्यूरो/अमर उजाला कुरुक्षेत्र
Updated Sun, 27 Sep 2015 11:26 PM IST
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सोमवार से शुरू हुए श्राद्ध पितृ पक्ष 12 अक्तूबर तक रहेंगे। यह कहना है श्री दुर्गा देवी मंदिर पिपली के पुजारी डॉ. सुरेश मिश्रा का जो कि मंदिर में आयोजित सत्संग में श्रद्घालुओं को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि श्राद्ध को भाद्रपद माह की पूर्णिमा से लेकर आश्विन माह की अमावस्या तक मनाया जाता है। पूर्णिमा का श्राद्ध पहला और अमावस्या का श्राद्ध अंतिम होता है। हिंदू माह की तिथि के अनुसार व्यक्ति मृत्यु पाता है उसी तिथि के दिन उसका श्राद्ध मनाया जाता है।
जिस व्यक्ति की तिथि याद ना रहे तब उसके लिए अमावस्या के दिन उसका श्राद्ध करने का विधान होता है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि आश्विन कृष्ण पक्ष में पितर पृथ्वी लोक पर आते हैं और अपने हिस्से का भाग अवश्य किसी ना किसी रुप में ग्रहण करते है। भोजन में जो भी खिलाया जाता है वह पितरों तक पहुंच ही जाता है।
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कैसे करें पिंडदान
धार्मिक मान्यतानुसार आश्विन मास के कृष्णपक्ष में पितरों के नाम पर तर्पण व पिंडदान देने से पितरों को शांति मिलती है और वह जातक को सुखी रहने का आशीर्वाद देते है। इस दिन सुपात्र ब्राह्मण व पंडितों को श्रद्धापूर्वक भोजन, मिष्ठान्न वस्त्रादि का दान दक्षिणा सहित देना चाहिए और विशेषकर गाय, कुत्ते या कौवे, चीटियों व अग्नि आदि को भोजन कराना चाहिए।
इसका रखें ध्यान
अकाल मृत्यु, आत्महत्या, शस्त्रादि और विषादि आदि से मृत व्यक्ति का श्राद्ध रविवार को करें। अज्ञात तिथियों वाले मृत व्यक्तियों का श्राद्ध सोमवती अमावस्या को करें। गया, गंगा, प्रयाग, कुरुक्षेत्र तथा अन्य प्रमुख तीर्थों में श्राद्ध करने से पितर सर्वदा संतुष्ट रहते हैं। श्राद्ध कर्म में श्रद्धा, शुद्धता, स्वच्छता एवं पवित्रता पर विशेष ध्यान देना चाहिए, इनके अभाव में श्राद्ध निष्फल हो जाता है।
श्राद्ध की महत्वपूर्ण तिथियां
श्राद्ध दिनांक समय दिन
पूर्णिमा 28 सितंबर 8:20 तक सोमवार
प्रतिपदा 28 सितंबर 8:21 से पूर्ण दिन सोमवार
द्वित्तीया 29 सितंबर पूरा दिन मंगलवार
तृतीया 30 सितंबर पूरा दिन बुधवार
चतुर्थी 1 अक्तूबर पूरा दिन बृहस्पतिवार
पंचमी 2 अक्तूबर पूरा दिन शुक्रवार
षष्ठी 3 अक्तूबर पूरा दिन शनिवार
सप्तमी 4 अक्तूबर पूरा दिन रविवार
अष्टमी 5 अक्तूबर पूरा दिन सोमवार
नवमी 6 अक्तूबर पूरा दिन मंगलवार
दशमी 7 अक्तूबर पूरा दिन बुधवार
एकादशी 8 अक्तूबर पूरा दिन बृहस्पतिवार
द्वादशी 9 अक्तूबर पूरा दिन शुक्रवार
त्रयोदशी 10 अक्तूबर पूरा दिन शनिवार
चतुर्दशी 11 अक्तूबर पूरा दिन रविवार
सोमवती अमावस्या 12 अक्तूबर पूरा दिन सोमवार
श्राद्ध पक्ष में करते हैं पूर्वजों को याद : पंडित कलाधर
लाडवा। लाडवा के ज्वाला जी मंदिर के पुजारी और ज्योतिषविद् पंडित कलाधर शास्त्री ने बताया कि अश्विन मास का श्राद्ध पक्ष अपने पूर्वजों को याद करने का समय है। प्रत्येक हिंदू को अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। श्राद्ध करने से पितर प्रसन्न और तृप्त होते हैं और अपनी संतती को भरपूर आशीर्वाद देते हैं। पूर्वजों के देहावसान तिथियों के दिन जो श्राद्ध किया जाता है, उसे संवत्सरिक श्राद्ध कहते हैं। श्राद्ध के दिन सर्व प्रथम पितरों के निमित्त देव, ऋषि, मनुष्य पितृ तर्पण का विधान हमारे शास्त्रों में है। श्रद्धा पूर्वक ब्राह्मण को भोजन कराने का इस दिन बहुत महत्व है। शास्त्रों में कहा गया है :
श्राद्धं कन्यागते भानौ यो न कुर्यात् गृहाश्रमी,
धनपुत्रा: कुतस्तस्य पितृशापाग्रि पीडनात्।।
अर्थात पितर तिथि पर पिंडतर्पण न पाने पर निराश होकर वापस अपने पितृलोक चले जाते हैं। अत: सद्गृहस्थ को चाहिए कि अपने पितरों की तिथि पर उनको तर्पण आदी कर उन्हें प्रसन्न करे, जिससे वे आपको आशीर्वाद देकर ही पितृलोक जाएं।
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उन्होंने कहा कि श्राद्ध को भाद्रपद माह की पूर्णिमा से लेकर आश्विन माह की अमावस्या तक मनाया जाता है। पूर्णिमा का श्राद्ध पहला और अमावस्या का श्राद्ध अंतिम होता है। हिंदू माह की तिथि के अनुसार व्यक्ति मृत्यु पाता है उसी तिथि के दिन उसका श्राद्ध मनाया जाता है।
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जिस व्यक्ति की तिथि याद ना रहे तब उसके लिए अमावस्या के दिन उसका श्राद्ध करने का विधान होता है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि आश्विन कृष्ण पक्ष में पितर पृथ्वी लोक पर आते हैं और अपने हिस्से का भाग अवश्य किसी ना किसी रुप में ग्रहण करते है। भोजन में जो भी खिलाया जाता है वह पितरों तक पहुंच ही जाता है।
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कैसे करें पिंडदान
धार्मिक मान्यतानुसार आश्विन मास के कृष्णपक्ष में पितरों के नाम पर तर्पण व पिंडदान देने से पितरों को शांति मिलती है और वह जातक को सुखी रहने का आशीर्वाद देते है। इस दिन सुपात्र ब्राह्मण व पंडितों को श्रद्धापूर्वक भोजन, मिष्ठान्न वस्त्रादि का दान दक्षिणा सहित देना चाहिए और विशेषकर गाय, कुत्ते या कौवे, चीटियों व अग्नि आदि को भोजन कराना चाहिए।
इसका रखें ध्यान
अकाल मृत्यु, आत्महत्या, शस्त्रादि और विषादि आदि से मृत व्यक्ति का श्राद्ध रविवार को करें। अज्ञात तिथियों वाले मृत व्यक्तियों का श्राद्ध सोमवती अमावस्या को करें। गया, गंगा, प्रयाग, कुरुक्षेत्र तथा अन्य प्रमुख तीर्थों में श्राद्ध करने से पितर सर्वदा संतुष्ट रहते हैं। श्राद्ध कर्म में श्रद्धा, शुद्धता, स्वच्छता एवं पवित्रता पर विशेष ध्यान देना चाहिए, इनके अभाव में श्राद्ध निष्फल हो जाता है।
श्राद्ध की महत्वपूर्ण तिथियां
श्राद्ध दिनांक समय दिन
पूर्णिमा 28 सितंबर 8:20 तक सोमवार
प्रतिपदा 28 सितंबर 8:21 से पूर्ण दिन सोमवार
द्वित्तीया 29 सितंबर पूरा दिन मंगलवार
तृतीया 30 सितंबर पूरा दिन बुधवार
चतुर्थी 1 अक्तूबर पूरा दिन बृहस्पतिवार
पंचमी 2 अक्तूबर पूरा दिन शुक्रवार
षष्ठी 3 अक्तूबर पूरा दिन शनिवार
सप्तमी 4 अक्तूबर पूरा दिन रविवार
अष्टमी 5 अक्तूबर पूरा दिन सोमवार
नवमी 6 अक्तूबर पूरा दिन मंगलवार
दशमी 7 अक्तूबर पूरा दिन बुधवार
एकादशी 8 अक्तूबर पूरा दिन बृहस्पतिवार
द्वादशी 9 अक्तूबर पूरा दिन शुक्रवार
त्रयोदशी 10 अक्तूबर पूरा दिन शनिवार
चतुर्दशी 11 अक्तूबर पूरा दिन रविवार
सोमवती अमावस्या 12 अक्तूबर पूरा दिन सोमवार
श्राद्ध पक्ष में करते हैं पूर्वजों को याद : पंडित कलाधर
लाडवा। लाडवा के ज्वाला जी मंदिर के पुजारी और ज्योतिषविद् पंडित कलाधर शास्त्री ने बताया कि अश्विन मास का श्राद्ध पक्ष अपने पूर्वजों को याद करने का समय है। प्रत्येक हिंदू को अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। श्राद्ध करने से पितर प्रसन्न और तृप्त होते हैं और अपनी संतती को भरपूर आशीर्वाद देते हैं। पूर्वजों के देहावसान तिथियों के दिन जो श्राद्ध किया जाता है, उसे संवत्सरिक श्राद्ध कहते हैं। श्राद्ध के दिन सर्व प्रथम पितरों के निमित्त देव, ऋषि, मनुष्य पितृ तर्पण का विधान हमारे शास्त्रों में है। श्रद्धा पूर्वक ब्राह्मण को भोजन कराने का इस दिन बहुत महत्व है। शास्त्रों में कहा गया है :
श्राद्धं कन्यागते भानौ यो न कुर्यात् गृहाश्रमी,
धनपुत्रा: कुतस्तस्य पितृशापाग्रि पीडनात्।।
अर्थात पितर तिथि पर पिंडतर्पण न पाने पर निराश होकर वापस अपने पितृलोक चले जाते हैं। अत: सद्गृहस्थ को चाहिए कि अपने पितरों की तिथि पर उनको तर्पण आदी कर उन्हें प्रसन्न करे, जिससे वे आपको आशीर्वाद देकर ही पितृलोक जाएं।