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अनियमितताओं की रसोई में जच्चा का खाना
अमर उजाला, कुरुक्षेत्र
Updated Tue, 08 Jul 2014 10:32 PM IST
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कुरुक्षेत्र। एनएचएम की जननी-शिशु सुरक्षा योजना के तहत सरकारी अस्पतालों में जच्चा को बासी खाना दिया जा रहा है। जबकि एनआरएचएम के अधिकारियों की मानें तो अस्पतालों में स्पेशल रसोई इसीलिए बनाई है कि शिशु को जन्म देने वाली महिलाओं को ताजा भोजन परोसा जाए।
बावजूद इसके अस्पताल की रसोई में इन नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही है। रसोई में रखा फ्रिज न केवल बासी खाद्य सामग्री से भरा है, बल्कि फ्रिज में वह भी मिला जो परोसा नहीं जाता।
अमर उजाला ने जब रसोई का जायजा लिया तो यहां बड़े फ्रिजर में बासी ग्रेवी, दलिया और दाल से भरी बाल्टियां नजर आईं। इसके अलावा मार्च-2014 की पैकिंग वाले बटर के कई डिब्बे नजर आए। यहां तैनात स्टाफ से ज्ञात हुआ कि फ्रिज में रखा दलिया सुबह का है, जबकि दाल एक दिन पुरानी है।
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सफाई के लिहाज से रसोई के हालात चरमराए थे। रही सही कसर कामर्शियल रसोई में उपयोग हो रहे घरेलू एलपीजी सिलेंडर ने पूरी की। पेट्रोलियम मंत्रालय के नियमानुसार कामर्शियल एक्टिविटी में घरेलू गैस सिलेंडर का उपयोग करना कानूनन अपराध है। सवाल ये उठ रहे हैं कि अगर अस्पताल बनाए रसोई घर का समय-समय पर निरीक्षण होता तो शायद यहां इस तरह के हालात कतई पैदा नहीं होते।
ये है एनएचएम की योजना और सप्लाई
नेशनल हेल्थ मिशन की ग्रांट से अस्पताल में जच्चा के भोजन की व्यवस्था का जिम्मा ठेकेदार को दिया है। ठेकेदार को यह भुगतान अस्पताल प्रशासन 100 रुपये प्रति दिन के हिसाब से करता है। ठेकेदार इन 100 रुपये में सुबह नाश्ते में मीठा दलिया, दोपहर के भोजन में दाल-रोटी और खिचड़ी और रात के भोजन में एक सब्जी, दो रोटी, खिचड़ी और 250 ग्राम दूध प्रतिदिन उपलब्ध कराता है। ठेकेदार की मानें तो प्रतिदिन अस्पताल में 50 से 60 महिलाओं को तीन समय का भोजन परोसा जाता है।
जिला नोडल अधिकारी की प्रतिक्रिया
नेशनल हेल्थ मिशन के जिला नोडल अधिकारी डॉ. एनपी सिंह के मुताबिक अस्पताल में रसोई घर बनाने का उद्देश्य ही ये है कि यहां जननी को ताजा भोजन परोसा जा सके। उन्होंने कहा कि बासी भोजन परोसा जाना गलत है। उन्होंने बताया कि नार्मल डिलीवरी के बाद जननी को तीन दिन, सिजेरियन आपरेशन के बाद सात दिन और डिलीवरी के बाद संबंधित डॉक्टर द्वारा दाखिल रखे जाने पर जितने दिन भी जननी अस्पताल में दाखिल रहती है उसे तीन समय का भोजन मुफ्त दिया जाता है। उन्होंने कहा कि इस मामले की रिपोर्ट आने पर एक्शन लिया जाएगा।
इसे अपने ढाबे पर भेज देते हैं
ठेकेदार की रसोई में कार्यरत स्टाफ मेंबर वीरेंद्र ने बताया कि जो बचा खाना है वह अपने सेक्टर-7 स्थित ढाबे पर भेज देते हैं और जो बटर के पैकेट रखे हैं वह भी ढाबे के हैं। हालांकि उन्होंने यह भी बताया कि कई बार डॉक्टरों के लिए इसी बटर से खाना बनाकर परोसा जाता है। गौरतलब है कि रसोई में सिर्फ जच्चा के भोजन तैयार करने की अनुमति है, लेकिन यहां डाक्टरों को भी मक्खन लगाकर भोजन परोसा जा रहा है। संभवत: इसीलिए रसोई घर में बरती जा रही अनियमितताओं की अनदेखी हो रही है।
ऐसा नहीं है : डॉ. मुकेश
अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. मुकेश से जब इस बाबत जानकारी ली तो उन्होंने रसोई घर में बरती जा रही अनियमितताओं को मानने से साफ इंकार कर दिया। उन्होंने जायजा लिए बगैर दो टूक शब्दों में कहा कि ऐसा नहीं है। जब उनसे घरेलू गैस सिलेंडर का इस्तेमाल कर नियमों की धज्जियां उड़ाने की जानकारी दी तो उन्होंने कहा कि यह उनकी जिम्मेदारी नहीं है।
तो ठेका होगा रद्द : सीएमओ
सीएमओ डॉ. जेएस ग्रेवाल ने कहा कि अस्पताल की रसोई में ठेकेदार द्वारा बरती जा रही खामियां सही पाई तो तुरंत प्रभाव से ठेका रद्द कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि मरीजों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ सहन नहीं किया जाएगा। सीएमओ के अनुसार वह अभी चंडीगढ़ हैं, अस्पताल पहुंचने पर स्वयं मौके का निरीक्षण करेंगे।
ठेकेदार पर मजदूरी नहीं देने का आरोप
गांव उमरी निवासी प्रेमचंद ने बताया कि वह काफी समय से सिविल अस्पताल के जच्चा-बच्चा केंद्र स्थित रसोई में काम कर चुका है। करीब आठ माह से उसका वेतन नहीं दिया जा रहा। उसके मुताबिक ढाई माह पूर्व उसका एक्सीडेंट हो गया था और बाजू में फ्रैक्चर के चलते वह काम पर नहीं जा सका। अब जब वह ठेकेदार और डॉ. सुरेंद्र राणा से उसके 22 हजार रुपये भुगतान करने को कहा तो इन्होंने टरका दिया।
सभी आरोप निराधार : ठेकेदार
ठेकेदार कृष्ण गुप्ता ने फोन पर दी प्रतिक्रिया में प्रेमचंद द्वारा लगाए आरोपों को निराधार बताया, जबकि अस्पताल के रसोई घर में मिली अनियमितताओं पर सफाई देने के बजाय लगातार यही बोलते रहे कि वे मिल बैठ कर बात कर लेते हैं।
मामले की जांच जोगी : डीसी
डीसी निखिल गजराज ने कहा कि बासी भोजन देना गलत है और यदि ऐसा हो रहा है, तो जांच कराई जाएगी। उन्होंने कहा कि जिला स्वास्थ्य विभाग को लापरवाही न बरतने की हिदायत दी जाएगी।
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बावजूद इसके अस्पताल की रसोई में इन नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही है। रसोई में रखा फ्रिज न केवल बासी खाद्य सामग्री से भरा है, बल्कि फ्रिज में वह भी मिला जो परोसा नहीं जाता।
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अमर उजाला ने जब रसोई का जायजा लिया तो यहां बड़े फ्रिजर में बासी ग्रेवी, दलिया और दाल से भरी बाल्टियां नजर आईं। इसके अलावा मार्च-2014 की पैकिंग वाले बटर के कई डिब्बे नजर आए। यहां तैनात स्टाफ से ज्ञात हुआ कि फ्रिज में रखा दलिया सुबह का है, जबकि दाल एक दिन पुरानी है।
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सफाई के लिहाज से रसोई के हालात चरमराए थे। रही सही कसर कामर्शियल रसोई में उपयोग हो रहे घरेलू एलपीजी सिलेंडर ने पूरी की। पेट्रोलियम मंत्रालय के नियमानुसार कामर्शियल एक्टिविटी में घरेलू गैस सिलेंडर का उपयोग करना कानूनन अपराध है। सवाल ये उठ रहे हैं कि अगर अस्पताल बनाए रसोई घर का समय-समय पर निरीक्षण होता तो शायद यहां इस तरह के हालात कतई पैदा नहीं होते।
ये है एनएचएम की योजना और सप्लाई
नेशनल हेल्थ मिशन की ग्रांट से अस्पताल में जच्चा के भोजन की व्यवस्था का जिम्मा ठेकेदार को दिया है। ठेकेदार को यह भुगतान अस्पताल प्रशासन 100 रुपये प्रति दिन के हिसाब से करता है। ठेकेदार इन 100 रुपये में सुबह नाश्ते में मीठा दलिया, दोपहर के भोजन में दाल-रोटी और खिचड़ी और रात के भोजन में एक सब्जी, दो रोटी, खिचड़ी और 250 ग्राम दूध प्रतिदिन उपलब्ध कराता है। ठेकेदार की मानें तो प्रतिदिन अस्पताल में 50 से 60 महिलाओं को तीन समय का भोजन परोसा जाता है।
जिला नोडल अधिकारी की प्रतिक्रिया
नेशनल हेल्थ मिशन के जिला नोडल अधिकारी डॉ. एनपी सिंह के मुताबिक अस्पताल में रसोई घर बनाने का उद्देश्य ही ये है कि यहां जननी को ताजा भोजन परोसा जा सके। उन्होंने कहा कि बासी भोजन परोसा जाना गलत है। उन्होंने बताया कि नार्मल डिलीवरी के बाद जननी को तीन दिन, सिजेरियन आपरेशन के बाद सात दिन और डिलीवरी के बाद संबंधित डॉक्टर द्वारा दाखिल रखे जाने पर जितने दिन भी जननी अस्पताल में दाखिल रहती है उसे तीन समय का भोजन मुफ्त दिया जाता है। उन्होंने कहा कि इस मामले की रिपोर्ट आने पर एक्शन लिया जाएगा।
इसे अपने ढाबे पर भेज देते हैं
ठेकेदार की रसोई में कार्यरत स्टाफ मेंबर वीरेंद्र ने बताया कि जो बचा खाना है वह अपने सेक्टर-7 स्थित ढाबे पर भेज देते हैं और जो बटर के पैकेट रखे हैं वह भी ढाबे के हैं। हालांकि उन्होंने यह भी बताया कि कई बार डॉक्टरों के लिए इसी बटर से खाना बनाकर परोसा जाता है। गौरतलब है कि रसोई में सिर्फ जच्चा के भोजन तैयार करने की अनुमति है, लेकिन यहां डाक्टरों को भी मक्खन लगाकर भोजन परोसा जा रहा है। संभवत: इसीलिए रसोई घर में बरती जा रही अनियमितताओं की अनदेखी हो रही है।
ऐसा नहीं है : डॉ. मुकेश
अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. मुकेश से जब इस बाबत जानकारी ली तो उन्होंने रसोई घर में बरती जा रही अनियमितताओं को मानने से साफ इंकार कर दिया। उन्होंने जायजा लिए बगैर दो टूक शब्दों में कहा कि ऐसा नहीं है। जब उनसे घरेलू गैस सिलेंडर का इस्तेमाल कर नियमों की धज्जियां उड़ाने की जानकारी दी तो उन्होंने कहा कि यह उनकी जिम्मेदारी नहीं है।
तो ठेका होगा रद्द : सीएमओ
सीएमओ डॉ. जेएस ग्रेवाल ने कहा कि अस्पताल की रसोई में ठेकेदार द्वारा बरती जा रही खामियां सही पाई तो तुरंत प्रभाव से ठेका रद्द कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि मरीजों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ सहन नहीं किया जाएगा। सीएमओ के अनुसार वह अभी चंडीगढ़ हैं, अस्पताल पहुंचने पर स्वयं मौके का निरीक्षण करेंगे।
ठेकेदार पर मजदूरी नहीं देने का आरोप
गांव उमरी निवासी प्रेमचंद ने बताया कि वह काफी समय से सिविल अस्पताल के जच्चा-बच्चा केंद्र स्थित रसोई में काम कर चुका है। करीब आठ माह से उसका वेतन नहीं दिया जा रहा। उसके मुताबिक ढाई माह पूर्व उसका एक्सीडेंट हो गया था और बाजू में फ्रैक्चर के चलते वह काम पर नहीं जा सका। अब जब वह ठेकेदार और डॉ. सुरेंद्र राणा से उसके 22 हजार रुपये भुगतान करने को कहा तो इन्होंने टरका दिया।
सभी आरोप निराधार : ठेकेदार
ठेकेदार कृष्ण गुप्ता ने फोन पर दी प्रतिक्रिया में प्रेमचंद द्वारा लगाए आरोपों को निराधार बताया, जबकि अस्पताल के रसोई घर में मिली अनियमितताओं पर सफाई देने के बजाय लगातार यही बोलते रहे कि वे मिल बैठ कर बात कर लेते हैं।
मामले की जांच जोगी : डीसी
डीसी निखिल गजराज ने कहा कि बासी भोजन देना गलत है और यदि ऐसा हो रहा है, तो जांच कराई जाएगी। उन्होंने कहा कि जिला स्वास्थ्य विभाग को लापरवाही न बरतने की हिदायत दी जाएगी।