कुरुक्षेत्र की महाभारत कालीन साइट: अभिमन्यु के टीले पर मिला प्राचीन शंख, कुषाणकालीन होने की संभावना
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के शोधार्थी जसबीर सिंह, विनोद कुमार और गुलशन गांव अभिमन्युपुर के अभिमन्यु टीले पर करीब डेढ़ माह से पुरातात्विक शोध कार्य कर रहे हैं। इस दौरान उन्हें प्राचीन शंख मिला है। जिसका पता वहां के ग्रामीणों को चला तो बड़ी संख्या भीड़ लग गई।
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कुरुक्षेत्र के अभिमन्युपुर गांव स्थित अभिमन्यु के टीले पर शोध के दौरान बेहद प्राचीन शंख मिला है, जो कुषाणकालीन माना जा रहा है। महाभारत कालीन साइट से मिले इस शंख को लेकर इतिहासकारों के साथ ही पुरातत्ववेत्ताओं में भी कौतुहल है। यही कारण है कि कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय का प्राचीन इतिहास विभाग भी इसकी जांच में जुट गया है। वहीं पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की टीम भी इस साइट पर जांच के लिए पहुंचने वाली है।
महाभारत से जुड़े इस क्षेत्र को लेकर इतिहासकारों और पुरातत्ववेत्ताओं की बढ़ी जिज्ञासा
अभिमन्यु के टीले पर शोध के दौरान प्राचीन शंख मिलने का पता चला तो बड़ी संख्या में ग्रामीण वहां एकत्रित हो गए। हर कोई इसे देखकर हैरान रह गया। शोधार्थियों की मानें तो यह करीब दो हजार साल पुराना हो सकता है। इससे हमारी प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति का भी पता चलता है।
विदित हो कि टीले का इतिहास महाभारत से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि महाभारत में वर्णित सात वनों में से अदिति वन अमीन गांव में था, जबकि यह भी माना गया है कि अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घेरकर इसी स्थान पर मारा गया था। ऐसे में इस टीले से शंख के मिलने पर प्राचीन मान्यताओं को भी बल मिला है।
यक्ष-यक्षणी की पत्थर की मिल चुकीं मूर्तियां, दिल्ली राष्ट्रीय संग्रहालय में है प्रदर्शित
इसी टीले पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की ओर से पहले भी रिसर्च किया जा चुका है। करीब 50 साल पहले यहां दो पिलरों पर बनी यक्ष-यक्षणी कि पत्थर की मूर्तियां भी मिली थीं, जो कि आस पास के क्षेत्रों में आज भी चर्चा का विषय है। वर्तमान में भी ये मूर्तियां दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रदर्शित हैं।
डेढ़ माह से कर रहे शोध
इस टीले की ऊंचाई 18 से 20 फुट के करीब है, जिस पर कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के शोधार्थियों की ओर से लगातार शोध किए जा रहे हैं। विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के शोधार्थी जसबीर सिंह, विनोद कुमार और गुलशन टीले पर करीब डेढ़ माह से पुरातात्विक शोध कार्य कर रहे हैं। इसी दौरान ये शंख मिला है।
कुषाणकालीन है शंख : जसबीर
राखीगढ़ी में भी शोध कर चुके शोधार्थी जसबीर सिंह का कहना है कि टीले पर यह शंख कुषाणकालीन लेयर पर ही मिला है, जिसके साथ उस समय के कई अन्य अवशेष भी मिले हैं। इस संबंध में पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को भी जानकारी दी गई है। जल्द एक पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की टीम यहां जांच के लिए पहुंचेगी।
टेराकोटा से बना है शंख : भट्टाचार्या
पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की उपनिदेशक डॉ बिनानी भट्टाचार्या का कहना है कि यह शंख ही है और टेराकोटा (पक्की मिट्टी) से बना है। हालांकि यह अभी जांच का विषय है कि यह किस समयकाल के दौरान का है, लेकिन यह पाषाणकालीन हो सकता है। पहले भी उस समय के ऐसे शंख अन्य जगहों पर मिल चुके हैं और ये सजावट के लिए भी घरों में रखे जाते रहे हैं। जांच के बाद ही सही जानकारी हो सकती है।
खोदाई से अन्य महाभारतकालीन वस्तुएं मिलना संभव : डॉ राजपाल
कुवि के प्राचीन इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ राजपाल का कहना है कि यह शंख पाषाणकालीन हो सकता है। यहां पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की ओर से खुदाई की जाए तो महाभारतकालीन अन्य वस्तुएं मिलना भी संभव हैं। पहले भी यहां यक्ष-यक्षणी की मूर्तियां मिल चुकी हैं। यह बेहद ऐतिहासिक टीला है।