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Kurukshetra News: बिजली चोरी मामले में निचली अदालत का फैसला पलटा

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 06 Oct 2025 01:55 AM IST
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Lower court's decision in power theft case overturned
कुरुक्षेत्र। अतिरिक्त जिला जज अनिल कुमार की अदालत ने उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम लिमिटेड (यूएचबीवीएनएल) और अन्य की ओर से दायर सिविल अपील को स्वीकार करते हुए सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की ओर से पारित फैसले को रद्द कर दिया। निचली अदालत ने सुबे सिंह के उत्तराधिकारियों के पक्ष में घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा का मुकदमा मंजूर किया था, जिसे अपील में गैर-कानूनी और बिना अधिकारिता का माना गया।
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सुबे सिंह ने यूएचबीवीएनएल और इसके अधिकारियों के खिलाफ सिविल मुकदमा दायर किया था, जिसे उनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी व उनके बेटे रोहित ने आगे बढ़ाया। उनका दावा था कि उनके आवासीय परिसर में बिजली कनेक्शन नियमित रूप से बिल भुगतान के साथ उपयोग किया जा रहा था और कोई अनियमितता नहीं थी। फिर भी निगम ने 13 जनवरी 2018 को कथित निरीक्षण के आधार पर बिजली चोरी का आरोप लगाते हुए 1,89,337 रुपये का मूल्यांकन और 60 हजार रुपये का संयोजन शुल्क मांगा लिया। सुबे सिंह ने इस निरीक्षण को कई कारणों के साथ अवैध बताते हुए निगम की ओर से जारी मेमो रद्द करने व उनकी बिजली आपूर्ति काटने या मुकदमा दर्ज करने से रोकने की अपील की थी।
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यूएचबीवीएनएल ने तर्क दिया कि 13 जनवरी 2018 को सुबे सिंह के पुत्र रोहित की उपस्थिति में निरीक्षण किया गया। इसमें मीटर से पहले अवैध कनेक्शन के माध्यम से बिजली चोरी का मामला पाया गया। निरीक्षण की वीडियोग्राफी और रिपोर्ट तैयार की गई, जिस पर रोहित ने हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। निगम ने बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 135 और 152 के तहत नोटिस जारी किए और कुल 2,49,337 रुपये की मांग की। निगम ने दावा किया कि यह स्पष्ट बिजली चोरी का मामला है और वादी को कोई राहत नहीं मिलनी चाहिए।
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निचली अदालत ने तीन अक्टूबर 2024 को सुबे सिंह के पक्ष में फैसला सुनाया, यह मानते हुए कि निरीक्षण में प्रक्रियात्मक अनियमितताएं थीं, जैसे कि कोई प्रारंभिक मूल्यांकन नहीं हुआ और वादी को सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया। अदालत ने मेमो को शून्य घोषित किया और निगम को बिजली आपूर्ति काटने से रोक दिया।

निगम ने तर्क दिया कि बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 145 सिविल कोर्ट की अधिकारिता को स्पष्ट रूप से रोकती है। बिजली चोरी और मूल्यांकन से संबंधित मामले केवल बिजली अधिनियम के तहत अधिकृत अधिकारियों द्वारा तय किए जा सकते हैं।
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