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संतों की संगत में हरि कथा सुनने से होती है भगवान की प्राप्ति : सुदीक्षा
Wed, 06 Aug 2025 06:03 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
Updated Wed, 06 Aug 2025 06:03 AM IST
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लाडवा। श्री सरस्वती सत्संग सभा लाडवा की ओर से आयोजित प्राचीन हनुमान मंदिर के प्रांगण में श्री राम कथा का शुभारंभ साध्वी सरस्वती के भजन से हुआ। इससे संगत भाव विभोर हो उठी।
कथा का आरंभ करते हुए संत देवी सुदीक्षा सरस्वती ने बताया कि संतों की संगत में हरि कथा सुनने से भगवान की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति पुरुषार्थ करता है भगवान का आशीर्वाद भी उसे ही मिलता है। सत्संग पुरुषार्थ और निर्मल कर्म से प्राप्त होता है। उन्होंने कहा की लाडवा में हजारों लोग रहते हैं सभी अपने कामों में व्यस्त हैं लेकिन सत्संग का आशीर्वाद आनंद केवल यहां बैठे हुए लोगों को ही प्राप्त हो रहा है।
शरीर में हृदय और जीभ दोनों ही बहुत कोमल अंग है। इन में कठोरता नहीं ,हड्डी नहीं, हृदय को निर्मल रखो, प्रसन्न रखो और जीभ से मीठे वचन बोलो वह अपने लिए भी और अपनों के लिए भी। अपनों के प्रति मन में द्वेष को त्यागना चाहिए। सुख के साधन चिंता से नहीं मिलते,यह हमारे पूर्व जन्मों के पुण्य से प्राप्त होते हैं, जो हमारी किस्मत में नहीं वह हमें नहीं मिलेगा। दूसरों के वैभव को देखकर कोठी बंगलो को देख ,गाड़ियों को देखकर हम दुखी होते हैं हमारे पास क्यों नहीं। मन को दुखी करने का कोई अर्थ नहीं है। क्योंकि उनको जो प्राप्त हुआ है वह उनके पूर्व जन्मों के पुण्य कर्मों से प्राप्त हुआ है । आप भी अपने जीवन में पुण्य कर्म करें ताकि भविष्य में आपको भी यह सुख प्राप्त हो। इस दौरान प्रधान गोपी रहेजा, निशु शर्मा, सुनील गर्ग, सोम प्रकाश शर्मा, अश्विनी गोस्वामी व अन्य सभी सदस्यों ने बाहर से आई संगत का स्वागत किया।
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कथा का आरंभ करते हुए संत देवी सुदीक्षा सरस्वती ने बताया कि संतों की संगत में हरि कथा सुनने से भगवान की प्राप्ति होती है। जो व्यक्ति पुरुषार्थ करता है भगवान का आशीर्वाद भी उसे ही मिलता है। सत्संग पुरुषार्थ और निर्मल कर्म से प्राप्त होता है। उन्होंने कहा की लाडवा में हजारों लोग रहते हैं सभी अपने कामों में व्यस्त हैं लेकिन सत्संग का आशीर्वाद आनंद केवल यहां बैठे हुए लोगों को ही प्राप्त हो रहा है।
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शरीर में हृदय और जीभ दोनों ही बहुत कोमल अंग है। इन में कठोरता नहीं ,हड्डी नहीं, हृदय को निर्मल रखो, प्रसन्न रखो और जीभ से मीठे वचन बोलो वह अपने लिए भी और अपनों के लिए भी। अपनों के प्रति मन में द्वेष को त्यागना चाहिए। सुख के साधन चिंता से नहीं मिलते,यह हमारे पूर्व जन्मों के पुण्य से प्राप्त होते हैं, जो हमारी किस्मत में नहीं वह हमें नहीं मिलेगा। दूसरों के वैभव को देखकर कोठी बंगलो को देख ,गाड़ियों को देखकर हम दुखी होते हैं हमारे पास क्यों नहीं। मन को दुखी करने का कोई अर्थ नहीं है। क्योंकि उनको जो प्राप्त हुआ है वह उनके पूर्व जन्मों के पुण्य कर्मों से प्राप्त हुआ है । आप भी अपने जीवन में पुण्य कर्म करें ताकि भविष्य में आपको भी यह सुख प्राप्त हो। इस दौरान प्रधान गोपी रहेजा, निशु शर्मा, सुनील गर्ग, सोम प्रकाश शर्मा, अश्विनी गोस्वामी व अन्य सभी सदस्यों ने बाहर से आई संगत का स्वागत किया।
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