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मुखिया की मौत से परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़, अब एकलौते बेटे पर जिम्मेदारी
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तीन नए कृषि कानून को रद्द करने की मांग को लेकर दिल्ली बॉर्डर में चल रहा धरना आंदोलनरत किसानों के साथ उनके परिवार पर भी भारी पड़ रहा है। आंदोलन के दौरान कई किसानों की शहादत के कारण उनके परिवारों को कभी न भूल सकने वाला जख्म दे दिया। दिल्ली में चल रहा किसान आंदोलन में गांव गुमथलागढ़ू के किसान परिवार के मुखिया सुरेंद्र सिंह (65) की दिल्ली से लौटते समय गांव गुमथलागढ़ू में सड़क क्रॉस करते समय अज्ञात वाहन की चपेट में आने से मौत हो गई थी। मुखिया की मौत के बाद उनका परिवार टूट गया, क्योकि उनके सिर पर ही खेती, पशुपालन व घर का कामकाज चल रहा था। अब परिवार के एकलौते बेटे गुरलाल सिंह पर परिवार सहित खेती व कामकाज की जिम्मेदारी आ गई है।
गुरलाल ने बताया कि वे अक्सर बीमार रहते है और उनके पिता सुरेंद्र सिंह ही खेती, पशुपालन सहित घर की पूरी जिम्मेदारी संभालते थे। उनके जाने के बाद उन पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है। उनकी मां गुरविंद्र कौर भी बीमार रहती है। वह कोशिश कर रहे है कि पिता के बाद खेती का काम संभाल सकें। उन्होंने बताया कि उनके पिता को आंदोलनरत किसानों की बहुत चिंता थी। 65 साल की उम्र होने के बाद भी वह सुबह खेती व पशुओं दूध का काम निपटाने के बाद गुरुद्वारा बाउली साहिब की ओर से किसानों के लिए लंगर की सेवा करने के लिए जाते थे। आंदोलन की शुरूआत से ही उन्होंने दिल्ली बॉर्डर पर आंदोलनरत किसानों को लंगर सेवा करने का जिम्मा लिया था। संवाद
बाक्स
20 दिन से सिंघु बॉर्डर पर डटा बेटा: सतविंद्र सिंह
किसान सतविंद्र सिंह ने बताया कि उसका 20 वर्षीय पारस बेटा पिछले 20 दिन से सिंघु बॉर्डर पर किसानों के साथ डटा गया हुआ है। जब तक तीनों कृषि कानून वापस नहीं हो जाते तब तक किसानों के साथ आंदोलन में ही डटा रहेगा। हमारी आजीविका का साधन खेती है और कई पीढ़ियों से पूर्वज खेती कर रहे हैं।
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आंदोलन की शुरूआत से अब तक आंदोलन में गया भाई: जसबीर
किसान जसबीर पंजेटा ने कहा कि उसका भाई सुरिंद्र 26 नवंबर से किसान आंदोलन में गया हुआ है। अब जब तक सरकार किसानों की मांगें नहीं मानेगी आंदोलन जारी रहेंगा। वह अपने भाई से बेहद प्रभावित है, जो किसान आंदोलन में अपनी भूमिका निभा रहा है।
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गुरलाल ने बताया कि वे अक्सर बीमार रहते है और उनके पिता सुरेंद्र सिंह ही खेती, पशुपालन सहित घर की पूरी जिम्मेदारी संभालते थे। उनके जाने के बाद उन पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है। उनकी मां गुरविंद्र कौर भी बीमार रहती है। वह कोशिश कर रहे है कि पिता के बाद खेती का काम संभाल सकें। उन्होंने बताया कि उनके पिता को आंदोलनरत किसानों की बहुत चिंता थी। 65 साल की उम्र होने के बाद भी वह सुबह खेती व पशुओं दूध का काम निपटाने के बाद गुरुद्वारा बाउली साहिब की ओर से किसानों के लिए लंगर की सेवा करने के लिए जाते थे। आंदोलन की शुरूआत से ही उन्होंने दिल्ली बॉर्डर पर आंदोलनरत किसानों को लंगर सेवा करने का जिम्मा लिया था। संवाद
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20 दिन से सिंघु बॉर्डर पर डटा बेटा: सतविंद्र सिंह
किसान सतविंद्र सिंह ने बताया कि उसका 20 वर्षीय पारस बेटा पिछले 20 दिन से सिंघु बॉर्डर पर किसानों के साथ डटा गया हुआ है। जब तक तीनों कृषि कानून वापस नहीं हो जाते तब तक किसानों के साथ आंदोलन में ही डटा रहेगा। हमारी आजीविका का साधन खेती है और कई पीढ़ियों से पूर्वज खेती कर रहे हैं।
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आंदोलन की शुरूआत से अब तक आंदोलन में गया भाई: जसबीर
किसान जसबीर पंजेटा ने कहा कि उसका भाई सुरिंद्र 26 नवंबर से किसान आंदोलन में गया हुआ है। अब जब तक सरकार किसानों की मांगें नहीं मानेगी आंदोलन जारी रहेंगा। वह अपने भाई से बेहद प्रभावित है, जो किसान आंदोलन में अपनी भूमिका निभा रहा है।