{"_id":"675011b639b8a47bc90b8e07","slug":"international-geeta-mahotsav-unesco-has-also-given-protection-to-kalbelia-dance-of-rajasthan-kurukshetra-news-c-45-1-knl1024-127791-2024-12-04","type":"story","status":"publish","title_hn":"अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव : यूनेस्को भी दे चुका राजस्थान के कालबेलिया नृत्य को संरक्षण","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव : यूनेस्को भी दे चुका राजस्थान के कालबेलिया नृत्य को संरक्षण
विज्ञापन
कुरुक्षेत्र। राजस्थान के प्रसिद्ध कालबेलिया लोक नृत्य को यूनेस्को भी मूर्त सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिनिधि सूची में शामिल कर चुका है। अब यही नृत्य अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव में पर्यटकों के लिए खास आकर्षण बना है। पिछले छह दिन से जोधपुर के कलाकार ब्रह्मसरोवर के घाटों पर इस नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति से समां बांध रहे हैं। कलाकारों की ऊर्जा और नृत्य की सुंदरता ने महोत्सव में एक नया रंग भर दिया।
कालबेलिया नृत्य राजस्थान के प्रमुख लोक नृत्यों में से एक है, जिसका संबंध कालबेलिया जनजाति से है जोकि परंपरागत रूप से सांप पकड़ने और उनके जहर से औषधि बनाने का कार्य करती थी। यह नृत्य उनकी जीवनशैली और सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतीक है। कलाकार कविता ने बताया कि इस नृत्य में महिलाएं पारंपरिक पोशाक पहनती हैं, जिन पर आकर्षक कढ़ाई और मिरर वर्क होता है। संगीत में बीन, डफली, सारंगी, ढोलक और हारमोनियम जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता है। यह नृत्य न केवल मनोरंजन का माध्यम है, बल्कि राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का परिचायक भी है।
यूनेस्को से मिली कालबेलिया को वैश्विक पहचान : महबूब
कलाकार महबूब खान का कहना है कि नवंबर 2010 में केन्या की राजधानी नैरोबी में आयोजित यूनेस्को की बैठक में कालबेलिया नृत्य को मूर्त सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया। यह राजस्थान की संस्कृति के लिए गर्व की बात है कि ये नृत्य अब विश्व स्तर पर प्रसिद्ध हो चुका है। कालबेलिया नृत्य हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। इसे संरक्षित करने और प्रोत्साहन देने के लिए ऐसे महोत्सव महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इससे न केवल कलाकारों को मंच मिलता है, बल्कि यह कला रूप नई पीढ़ियों तक भी पहुंचता है।
विज्ञापन
रोजगार का सहारा बना कालबेलिया नृत्य : जाकिर
कलाकार जाकिर खान बताते हैं कि कालबेलिया जनजाति में इस नृत्य को सांस्कृतिक और सामाजिक उत्सवों में प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाता था। यह जनजाति सांप पकड़ने और उनके जहर से औषधि बनाने का कार्य करती थी लेकिन जब सरकार द्वारा सांप पकड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया तो उसके बाद कोई रोजगार का साधन नहीं था, जिसके बाद काले वस्त्रों में महिलाएं सांपों की लहराती चाल पर नृत्य करने लगी तथा पुरुष साज बजाने लगे। उन्होंने बताया कि यह नृत्य सांपों की हरकतों की नकल से आगे बढ़कर एक कलात्मक अभिव्यक्ति बन गया। अब इसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रदर्शन के लिए भी अपनाया जाने लगा है।
विज्ञापन
कालबेलिया नृत्य राजस्थान के प्रमुख लोक नृत्यों में से एक है, जिसका संबंध कालबेलिया जनजाति से है जोकि परंपरागत रूप से सांप पकड़ने और उनके जहर से औषधि बनाने का कार्य करती थी। यह नृत्य उनकी जीवनशैली और सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतीक है। कलाकार कविता ने बताया कि इस नृत्य में महिलाएं पारंपरिक पोशाक पहनती हैं, जिन पर आकर्षक कढ़ाई और मिरर वर्क होता है। संगीत में बीन, डफली, सारंगी, ढोलक और हारमोनियम जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता है। यह नृत्य न केवल मनोरंजन का माध्यम है, बल्कि राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का परिचायक भी है।
विज्ञापन
यूनेस्को से मिली कालबेलिया को वैश्विक पहचान : महबूब
कलाकार महबूब खान का कहना है कि नवंबर 2010 में केन्या की राजधानी नैरोबी में आयोजित यूनेस्को की बैठक में कालबेलिया नृत्य को मूर्त सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया। यह राजस्थान की संस्कृति के लिए गर्व की बात है कि ये नृत्य अब विश्व स्तर पर प्रसिद्ध हो चुका है। कालबेलिया नृत्य हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। इसे संरक्षित करने और प्रोत्साहन देने के लिए ऐसे महोत्सव महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इससे न केवल कलाकारों को मंच मिलता है, बल्कि यह कला रूप नई पीढ़ियों तक भी पहुंचता है।
विज्ञापन
रोजगार का सहारा बना कालबेलिया नृत्य : जाकिर
कलाकार जाकिर खान बताते हैं कि कालबेलिया जनजाति में इस नृत्य को सांस्कृतिक और सामाजिक उत्सवों में प्रमुखता से प्रदर्शित किया जाता था। यह जनजाति सांप पकड़ने और उनके जहर से औषधि बनाने का कार्य करती थी लेकिन जब सरकार द्वारा सांप पकड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया तो उसके बाद कोई रोजगार का साधन नहीं था, जिसके बाद काले वस्त्रों में महिलाएं सांपों की लहराती चाल पर नृत्य करने लगी तथा पुरुष साज बजाने लगे। उन्होंने बताया कि यह नृत्य सांपों की हरकतों की नकल से आगे बढ़कर एक कलात्मक अभिव्यक्ति बन गया। अब इसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रदर्शन के लिए भी अपनाया जाने लगा है।