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Kurukshetra News: इलाज का खर्च न देने पर बीमा कंपनी पर 36 हजार का जुर्माना

Tue, 26 May 2026 02:35 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र Updated Tue, 26 May 2026 02:35 AM IST
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Insurance company fined Rs 36,000 for not paying medical expenses
करनाल। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने इलाज का खर्च नहीं देने पर टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी पर 36 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। कंपनी ने एक उपभोक्ता के स्वास्थ्य बीमा दावे को खारिज कर दिया था। आयोग ने कंपनी को आदेश दिया कि वह शिकायतकर्ता को अस्पताल में इलाज पर आए खर्च 2,81,781 रुपये को नाै प्रतिशत ब्याज के साथ अदा करे।
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आयोग के फैसले के अनुसार, बुढ़नपुर आबाद गांव निवासी महीपाल ने एक्सिस बैंक के माध्यम से टाटा एआईजी से पांच लाख रुपये की सम-इंश्योर्ड (बीमा राशि) वाली एक स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी खरीदी थी। इसमें उनकी पत्नी भी शामिल थीं। उन्होंने समय पर प्रीमियम देकर इस पॉलिसी का नवीनीकरण भी कराया। फरवरी 2022 में महीपाल की तबीयत खराब होने पर उन्हें दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां उनके इलाज पर कुल 2,81,781 रुपये खर्च हुए।
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अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद जब उन्होंने पैसों के लिए दावा किया तो कंपनी ने पुराने इलाज के रिकॉर्ड (कोरोनरी आर्टरी डिजीज) न देने का हवाला देते हुए दावे को खारिज कर दिया। इसके बाद पीड़ित ने उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाया।
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आयोग ने शिकायतकर्ता महीपाल के पक्ष में फैसला सुनाते हुए टाटा एआईजी को आदेश दिए कि वह उपभोक्ता के इलाज पर आए खर्च 2,81,781 की पूरी राशि क्लेम खारिज होने की तारीख (23.05.2022) से लेकर वास्तविक भुगतान तक नाै प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ दे। इसके अलावा उपभोक्ता को हुई मानसिक परेशानी और उत्पीड़न के लिए 25 हजार का भुगतान किया जाए। वहीं कानूनी लड़ाई के खर्च के रूप में 11 हजार रुपये की राशि भी दी जाए। इतना ही नहीं अदालत के आदेशों की अवहेलना करने और समय पर जुर्माना न भरने के कारण कंपनी को 2,500 का अतिरिक्त खर्च राज्य उपभोक्ता आयोग के कानूनी सहायता खाते में जमा करने का आदेश दिया गया है।
पुरानी बीमारी का कोई ठोस सबूत नहीं पेश कर पाई कंपनी

मामले की सुनवाई के दौरान टाटा एआईजी के वकील ने दलील दी कि शिकायतकर्ता ने वर्ष 2019 की बीमारी की बात छिपाई थी। हालांकि अदालत ने नोट किया कि बीमा कंपनी अपने इस दावे को साबित करने के लिए कोई भी ठोस सबूत या दस्तावेज पेश करने में नाकाम रही। कई मौके दिए जाने के बावजूद कंपनी ने अदालत में कोई सबूत पेश नहीं किया, जिसके बाद आयोग ने उनके साक्ष्य का अवसर बंद कर दिया था।
टिप्पणी : झूठे आश्वासन देकर पॉलिसी बेच देती हैं कंपनियां
आयोग के अध्यक्ष जसवंत सिंह और सदस्य सरबजीत कौर की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि आजकल बीमा कंपनियों का यह चलन बन गया है कि वे झूठे आश्वासन देकर पॉलिसी बेच देती हैं और प्रीमियम वसूल लेती हैं लेकिन जब क्लेम देने की बारी आती है, तो नियम-कायदों की आड़ में आनाकानी करती हैं।


अदालत ने भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि यदि पॉलिसी लेते समय उपभोक्ता की उम्र 45 वर्ष से अधिक है, तो कंपनी को पॉलिसी जारी करने से पहले उसका मेडिकल टेस्ट कराना अनिवार्य है। अगर कंपनी बिना मेडिकल टेस्ट के पॉलिसी जारी करती है, तो बाद में पुरानी बीमारी का बहाना बनाकर क्लेम खारिज नहीं किया जा सकता।
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