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हरियाणा से 3297 ने दी थी हंसते-हंसते जान, आधे से अधिक की नहीं हुई पहचान

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 10 May 2022 02:12 AM IST
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From Haryana, 3297 gave their lives laughing, more than half were not recognized, Kurukshetra
1857 में अंग्रेज सरकार के खिलाफ बगावत करने वाले भारतियों को इस प्रकार तोप के सामने खड़ा करके उड़ा दि - फोटो : Kurukshetra
अजय जौली
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कुरुक्षेत्र। भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम में हजारों भारतीयों ने शहादत देकर अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंका था। 165 साल पहले आज ही के दिन भड़की चिंगारी आजादी के बाद ही शांत हुई थी। अंग्रेजों के खिलाफ जंग-ए-आजादी में हरियाणा का भी विशेष योगदान रहा था। इस क्रांति में हरियाणा के 3,297 लोग शहीद हुए थे, जिनमें से सिर्फ 1,110 की ही पहचान हो पाई थी, बाकी 2,187 लोगों के शव अंग्रेजों की क्रूरता के कारण इतने क्षत विक्षत हो गए थे कि उनकी शिनाख्त भी नहीं हो पाई थी। सबसे ज्यादा 485 लोग महेंद्रगढ़ से शहीद हुए थे, जिनमें से मात्र 29 की ही पहचान हो पाई थी।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय परिसर में जंग-ए-आजादी को समर्पित संग्रहालय में इस क्रांति के वीरों की गाथा का सचित्र वर्णन किया गया है। प्रथम स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे ने जब चर्बी वाले कारतूस छीलने से मना किया, वह दृश्य भी दिखाया गया है। इसके अलावा झांसी की रानी, नाना साहेब, तात्या टोपे, बेगम हजरत महल, बहादुर शाह जफर व मौलवी अहमद शाह सहित सभी क्रांतिकारियों के योगदान को बखूबी दर्शाया गया है।
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हरियाणा के क्रांतिकारियों में मेवात के सदरूद्दीन, रेवाड़ी के तेलाराम व राव गोपाल देव, पलवल के गफ्फूर अली और हरसुख राय, फरीदाबाद के धानु सिंह व गुलाम मोहम्मद, बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह, फर्रुखनगर के नवाब अहमद अली व पटौदी के अकबर अली, पानीपत के इमाम बू अली कलंदर, खरखौदा के बिसारत अली, सांपला के साबर खां, दुजाना के हसल अली, दादरी के बहादुर जंग, भट्टू (हिसार) के मोहम्मद आजिम, रानियां के नवाब उदमीराम, झज्जर के नवाब अब्दुर्रहमान खां, खरखोदा के बिसारत अली, हांसी के लाला हुकमचंद, रूपर (अंबाला) के मेहर सिंह इत्यादि ने अपने प्राणों की आहुति दी। संवाद
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मेरठ से पहले अंबाला में शुरू हुआ था स्वतंत्रता संग्राम
इतिहासकार प्रो. केसी यादव के अनुसार प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम मेरठ से भी पहले हरियाणा के अंबाला में शुरू हुआ था। इस आशय की जानकारी अंबाला के डिप्टी कलेक्टर टीडी फोरसिथ ने पंजाब के मुख्य आयुक्त सर जॉन लारेंस को भेजी थी। दरअसल 10 मई 1857 को अंबाला छावनी की 60वीं नेटिव व पांचवीं नेटिव रेजिमेंटों के सैनिकों ने योजनाबद्ध तरीके से अंग्रेज सरकार को उखाड़ फेंकने की तैयारी कर ली थी, लेकिन एक सिपाही की ओर से इसकी जानकारी तत्कालीन डीसी को दिए जाने के कारण अंग्रेजों ने अंबाला छावनी में विद्रोही सैनिकों को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया। बाद में जब 60वीं नेटिव रेजिमेंट को रोहतक भेज दिया गया तो इसने वहां 10 जून को बगावत कर दी और क्रांतिकारियों के साथ मिल गए।

हर माह करीब 35 हजार पर्यटक आते हैं संग्रहालय देखने : डॉ. चावला
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय परिसर में स्थित 1857 की क्रांति को समर्पित इस संग्रहालय के क्यूरेटर डॉ. विवेक चावला ने बताया कि संग्रहालय को देखने हर माह करीब 35 हजार पर्यटक आते हैं। संग्रहालय में क्रांति के सभी नायकों की जानकारी उपलब्ध है।

 1857 की क्रांति को समर्पित संग्रहालय में दिखाया गया अंग्रेजों के साथ लड़ती रानी लक्ष्मी बाई का का द?

1857 की क्रांति को समर्पित संग्रहालय में दिखाया गया अंग्रेजों के साथ लड़ती रानी लक्ष्मी बाई का का द?- फोटो : Kurukshetra

 कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय स्थित 1857 की क्रांति को समर्पित संग्रहालय में स्थापित झांसी की रानी ल?

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय स्थित 1857 की क्रांति को समर्पित संग्रहालय में स्थापित झांसी की रानी ल?- फोटो : Kurukshetra

 कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय स्थित 1857 की क्रांति को समर्पित संग्रहालय में दर्शाया गया मंगल पांडे ?

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय स्थित 1857 की क्रांति को समर्पित संग्रहालय में दर्शाया गया मंगल पांडे ?- फोटो : Kurukshetra

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