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Kurukshetra News: पांच पीढ़ियों की परंपरा, फुलकारी कला को दे रहे नई उड़ान
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कुरुक्षेत्र। स्टाल नंबर 43 पर खरीदारी करती महिलाएं। संवाद
कुरुक्षेत्र। अगर इंसान के पास हौसला, हिम्मत और कुछ कर दिखाने का जुनून हो, तो वह अपनी मेहनत से हर मुकाम हासिल कर सकता है। कुछ ऐसा ही अनोखा जज्बा पटियाला के उस परिवार में बना हुआ है, जिसकी पांच पीढ़ियां निरंतर बुनकर और फुलकारी कला की परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं।
इस परिवार ने न सिर्फ अपनी पुरानी कला को जिंदा रखा है बल्कि इसे अपनी पहचान और जीवन का उद्देश्य भी बना लिया है। आने वाली हर पीढ़ी पिछली पीढ़ी से यह हुनर सीखती है और इसे निखारकर आगे बढ़ाती है। परिवार का मानना है कि परंपरा को बचाए रखना सबसे बड़ा सम्मान है, इसलिए शिक्षा के साथ-साथ कला को प्राथमिकता दी जाती है। अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव में पवित्र ब्रह्मसरोवर तट पर लगे शिल्प मेले में अपनी कला लेकर पहुंचे परिवार के सदस्यों में पटियाला की 68 वर्षीय लाजवंती इस परंपरा का मजबूत स्तंभ हैं।
वह न सिर्फ खुद बेहतरीन फुलकारी बनाती हैं बल्कि अब तक करीब चार हजार महिलाओं को प्रशिक्षित करके उन्हें आत्मनिर्भर बना चुकी हैं। लाजवंती बताती हैं कि उन्होंने यह हुनर अपनी मां से सीखा था और उनकी मां ने अपनी मां से। आज इस कला के सहारे हजारों महिलाएं अच्छा काम कर रही हैं।
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बेटी को बना रहे आत्मनिर्भर : स्टॉल नंबर 43 के संचालक अमित कुमार बताते हैं कि उनके परिवार में हुनर की कोई कमी नहीं है। उनकी 50 वर्षीय बहन लवली, 46 वर्षीय किरन और 36 वर्षीय भाई अरविंद्र, सभी नेशनल अवार्ड विजेता हैं। वह अपनी नौ साल की बेटी को भी यह कला सिखा रहे हैं।
महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना जीवन का उद्देश्य
लाजवंती महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत बनी हुई हैं। महिलाओं को प्रशिक्षण दे उन्हें आत्मनिर्भर भी बना रही हैं। यही उनका उद्देश्य है। लाजवंती बताती हैं कि उनकी मां से उन्होंने दस्तकारी का काम सीखा था, उनसे पहले मां ने अपनी मां से हुनर सीखा। लाजवंती ने बताया कि अब तक वह करीब चार हजार महिलाओं को आत्मनिर्भर बना चुकी हैं जो अच्छे स्तर पर काम कर रही हैं।
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इस परिवार ने न सिर्फ अपनी पुरानी कला को जिंदा रखा है बल्कि इसे अपनी पहचान और जीवन का उद्देश्य भी बना लिया है। आने वाली हर पीढ़ी पिछली पीढ़ी से यह हुनर सीखती है और इसे निखारकर आगे बढ़ाती है। परिवार का मानना है कि परंपरा को बचाए रखना सबसे बड़ा सम्मान है, इसलिए शिक्षा के साथ-साथ कला को प्राथमिकता दी जाती है। अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव में पवित्र ब्रह्मसरोवर तट पर लगे शिल्प मेले में अपनी कला लेकर पहुंचे परिवार के सदस्यों में पटियाला की 68 वर्षीय लाजवंती इस परंपरा का मजबूत स्तंभ हैं।
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वह न सिर्फ खुद बेहतरीन फुलकारी बनाती हैं बल्कि अब तक करीब चार हजार महिलाओं को प्रशिक्षित करके उन्हें आत्मनिर्भर बना चुकी हैं। लाजवंती बताती हैं कि उन्होंने यह हुनर अपनी मां से सीखा था और उनकी मां ने अपनी मां से। आज इस कला के सहारे हजारों महिलाएं अच्छा काम कर रही हैं।
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बेटी को बना रहे आत्मनिर्भर : स्टॉल नंबर 43 के संचालक अमित कुमार बताते हैं कि उनके परिवार में हुनर की कोई कमी नहीं है। उनकी 50 वर्षीय बहन लवली, 46 वर्षीय किरन और 36 वर्षीय भाई अरविंद्र, सभी नेशनल अवार्ड विजेता हैं। वह अपनी नौ साल की बेटी को भी यह कला सिखा रहे हैं।
महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना जीवन का उद्देश्य
लाजवंती महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत बनी हुई हैं। महिलाओं को प्रशिक्षण दे उन्हें आत्मनिर्भर भी बना रही हैं। यही उनका उद्देश्य है। लाजवंती बताती हैं कि उनकी मां से उन्होंने दस्तकारी का काम सीखा था, उनसे पहले मां ने अपनी मां से हुनर सीखा। लाजवंती ने बताया कि अब तक वह करीब चार हजार महिलाओं को आत्मनिर्भर बना चुकी हैं जो अच्छे स्तर पर काम कर रही हैं।

कुरुक्षेत्र। स्टाल नंबर 43 पर खरीदारी करती महिलाएं। संवाद