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Kurukshetra News: वर्ष 1977 में मिली थी धर्मनगरी को संसदीय क्षेत्र के तौर पर पहचान
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कुरुक्षेत्र। वर्तमान दौर में धर्मनगरी न केवल सीएम सिटी बन चुकी है बल्कि प्रदेश की राजनीति का भी केंद्र बनती जा रही है। लोकसभा चुनावों के चलते इस बार भी विभिन्न सियासी दलों के दिग्गज मैदान में आने लगे हैं, जिसके चलते यह प्रदेश की हॉट सीट बन गई है।
हालांकि अभी इस बार होने वाली चुनावी महाभारत के सभी योद्धा मैदान में नहीं आए हैं लेकिन राजनीतिक दलों के साथ-साथ आम लोगों की नजरें भी इस क्षेत्र पर टिक गई है। सियासी तौर पर केंद्र बने इस क्षेत्र को संसदीय रूप में वर्ष 1977 में ही पहचान मिल पाई थी जबकि इससे पहले कभी करनाल, अंबाला तो कभी कैथल का ही हिस्सा रही है। संसदीय क्षेत्र बनने पर यहां जनता पार्टी के रघुवीर सिंह विर्क पहले सांसद बने थे।
राजनीतिक जानकारों की मानें तो पहले आम चुनाव 1952 में हुए थे, जिस दौरान कुरुक्षेत्र जिला करनाल संसदीय क्षेत्र का हिस्सा था और उस दौरान सुभद्रा जोशी सांसद बनी थी। इसके बाद 1957 में दूसरे आम चुनाव के दौरान यह जिला अंबाला का हिस्सा भी बना। तीसरा आम चुनाव, 1962 में हुआ और इस दौरान भी जिला करनाल का ही एक हिस्सा था जबकि कैथल संसदीय क्षेत्र के तौर पर यहां से देवदत्त पुरी सांसद बने थे। इसके उपरांत 21 जनवरी 1973 में कुरुक्षेत्र जिला बना जबकि 1977 में इसे संसदीय क्षेत्र के तौर पर पहचान मिली जबकि इससे पहले कैथल संसदीय क्षेत्र का ही यह हिस्सा रहा और इस बीच 1967 और फिर 1971 में गुलजारी लाल नंदा सांसद बने थे। इसके बाद 1977 में इस क्षेत्र का पहला चुनाव हुआ तो जनता पार्टी के रघुवीर सिंह विर्क सांसद बने थे।
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अपने नाम से बनी पहचान, लेकिन बाहरी प्रत्याशियों को मिलता रहा सम्मान
कुरुक्षेत्र संसदीय क्षेत्र के तौर पर 1977 में पहचान मिली लेकिन सम्मान बाहरी प्रत्याशियों को ही ज्यादा मिलता रहा। 1977 में हुए चुनाव में जनता पार्टी के उम्मीदवार एवं करनाल के रघुवीर सिंह विर्क पहले ने जीत दर्ज की थी। 1980 में नारनौल के रहने वाले मनोहर लाल सैनी सांसद बने थे। 1984 में कांग्रेस से टोहाना के रहने वाले हरपाल सिंह जीते थे। 1989 में जनता दल से गुरदयाल सिंह सैनी जीते थे। हालांकि वर्तमान में उनका गांव कैंथला खुद कुरुक्षेत्र जिला का है, लेकिन उस समय यह करनाल का ही हिस्सा था। 1991 में सरदार तारा सिंह, 1996 में हिसार के ओपी जिंदल और फिर वर्ष 2004 व 2009 में उनके बेटे नवीन जिंदल यहां से सांसद बने। इसके बाद अंबाला के नारायणगढ़ के रहने वाले राजकुमार सैनी वर्ष 2014 में नायब सैनी 2019 में सांसद बने।
इस क्षेत्र से स्थानीय तौर पर रहने वाली एकमात्र प्रो कैलाशो सैनी ही सांसद बन पाई। हालांकि प्रतापगढ़ की रहने वाली कैलाशो सैनी दो बार लगातार सांसद बनीं लेकिन उनके बाद भी बाहरी प्रत्याशियों का ही खुलकर सम्मान किया गया जबकि कई स्थानीय दिग्गज नेता भी यहां मैदान में उतरकर जीत के लिए प्रयास करते रहे।
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हालांकि अभी इस बार होने वाली चुनावी महाभारत के सभी योद्धा मैदान में नहीं आए हैं लेकिन राजनीतिक दलों के साथ-साथ आम लोगों की नजरें भी इस क्षेत्र पर टिक गई है। सियासी तौर पर केंद्र बने इस क्षेत्र को संसदीय रूप में वर्ष 1977 में ही पहचान मिल पाई थी जबकि इससे पहले कभी करनाल, अंबाला तो कभी कैथल का ही हिस्सा रही है। संसदीय क्षेत्र बनने पर यहां जनता पार्टी के रघुवीर सिंह विर्क पहले सांसद बने थे।
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राजनीतिक जानकारों की मानें तो पहले आम चुनाव 1952 में हुए थे, जिस दौरान कुरुक्षेत्र जिला करनाल संसदीय क्षेत्र का हिस्सा था और उस दौरान सुभद्रा जोशी सांसद बनी थी। इसके बाद 1957 में दूसरे आम चुनाव के दौरान यह जिला अंबाला का हिस्सा भी बना। तीसरा आम चुनाव, 1962 में हुआ और इस दौरान भी जिला करनाल का ही एक हिस्सा था जबकि कैथल संसदीय क्षेत्र के तौर पर यहां से देवदत्त पुरी सांसद बने थे। इसके उपरांत 21 जनवरी 1973 में कुरुक्षेत्र जिला बना जबकि 1977 में इसे संसदीय क्षेत्र के तौर पर पहचान मिली जबकि इससे पहले कैथल संसदीय क्षेत्र का ही यह हिस्सा रहा और इस बीच 1967 और फिर 1971 में गुलजारी लाल नंदा सांसद बने थे। इसके बाद 1977 में इस क्षेत्र का पहला चुनाव हुआ तो जनता पार्टी के रघुवीर सिंह विर्क सांसद बने थे।
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अपने नाम से बनी पहचान, लेकिन बाहरी प्रत्याशियों को मिलता रहा सम्मान
कुरुक्षेत्र संसदीय क्षेत्र के तौर पर 1977 में पहचान मिली लेकिन सम्मान बाहरी प्रत्याशियों को ही ज्यादा मिलता रहा। 1977 में हुए चुनाव में जनता पार्टी के उम्मीदवार एवं करनाल के रघुवीर सिंह विर्क पहले ने जीत दर्ज की थी। 1980 में नारनौल के रहने वाले मनोहर लाल सैनी सांसद बने थे। 1984 में कांग्रेस से टोहाना के रहने वाले हरपाल सिंह जीते थे। 1989 में जनता दल से गुरदयाल सिंह सैनी जीते थे। हालांकि वर्तमान में उनका गांव कैंथला खुद कुरुक्षेत्र जिला का है, लेकिन उस समय यह करनाल का ही हिस्सा था। 1991 में सरदार तारा सिंह, 1996 में हिसार के ओपी जिंदल और फिर वर्ष 2004 व 2009 में उनके बेटे नवीन जिंदल यहां से सांसद बने। इसके बाद अंबाला के नारायणगढ़ के रहने वाले राजकुमार सैनी वर्ष 2014 में नायब सैनी 2019 में सांसद बने।
इस क्षेत्र से स्थानीय तौर पर रहने वाली एकमात्र प्रो कैलाशो सैनी ही सांसद बन पाई। हालांकि प्रतापगढ़ की रहने वाली कैलाशो सैनी दो बार लगातार सांसद बनीं लेकिन उनके बाद भी बाहरी प्रत्याशियों का ही खुलकर सम्मान किया गया जबकि कई स्थानीय दिग्गज नेता भी यहां मैदान में उतरकर जीत के लिए प्रयास करते रहे।