फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Haryana ›   Kurukshetra News ›   चार वर्षों में जिले की 176 नाबालिग बेटियों पर पड़ी गंदी नजर

चार वर्षों में जिले की 176 नाबालिग बेटियों पर पड़ी गंदी नजर

Wed, 27 Dec 2017 12:29 AM IST
Updated Wed, 27 Dec 2017 12:29 AM IST
विज्ञापन
चार वर्षों में जिले की 176 नाबालिग बेटियों पर पड़ी गंदी नजर
अमर उजाला ब्यूरो
विज्ञापन

कुरुक्षेत्र।
केंद्र से लेकर प्रदेश सरकार तक बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के नारे को बुलंद कर रही है। महिला पुलिस थाने खोले जा रहे हैं। इसके बावजूद आज भी बेटियां सुरक्षित नहीं हैं। नन्हीं बेटियों (नाबालिग) की अस्मत पर अपने तो कहीं गैर हाथ डाल रहे हैं। जिले में भी बेटियों की स्थिति हमारे समाज की मानसिकता पर सवाल खडे़ कर रही है। जिले में पिछले चार वर्षों में 176 नाबालिग बेटियों पर गंदी नजर डालने के मामले सामने आए हैं। इस वर्ष 45 बेटियों को ऐसे हालात का सामना करना पड़ा है। इनमें से 19 के साथ बलात्कार हुआ तो 26 बेटियां छेड़छाड़ का शिकार हुईं। पुलिस व विशेषज्ञों की मानें तो आज भी करीब 50 फीसदी बेटियां ही अपने साथ हुए ऐसे हादसों के विरोध में खड़ी हो पाती हैं। बहुत से मामले तो दबे रह जाते हैं। लोग आज भी इज्ज्त की दुहाई देकर बेटियों के यौन शोषण का जिक्र तक नहीं करते। कुछ मामले पंचायतों तक ही सिमट जाते है। शिक्षण संस्थानों में भी बच्चियों को ऐसे हालात का सामना करना पड़ता है। इससे हमारे शिक्षित समाज पर धब्बा लग रहा है।
वर्ष अनुसार पोक्सो एक्ट के तहत दर्ज मामले
वर्ष दर्ज मामले
2013 1
2014 25
2015 50
2016 56
2017 45
बॉक्स
जब महिला पुलिस ही नहीं तो बेटियां बताएं किसे
हालांकि जिला स्तर पर वर्ष 2015 में महिला पुलिस थाने महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए खोले गए थे, लेकिन सरकार आज तक इस थाने में जरूरत के अनुसार महिला पुलिस कर्मियों की नियुक्ति नहीं कर पाई है। अधिकतर थाने कुछ कर्मियों के भरोसे चले रहे हैं। ये कर्मी भी अन्य मामलों के साथ ही कोर्ट कार्रवाई आदि में व्यस्त रहती हैं। कई ब्लॉक पर तो एक भी महिला पुलिस कर्मी तैनात नहीं है।
विज्ञापन

बॉक्स
जिले में महिला पुलिस कर्मियों की स्थिति
पद स्वीकृत पद तैनात
इंस्पेक्टर 1 1
एसआई 9 7
एएसआई 18 13
एचसी 29 16
सिपाही 121 72
बॉक्स
स्कूलों में चलाया जाएगा जागरूकता अभियान : एसपी
पुलिस अधीक्षक अभिषेक गर्ग का कहना है कि बच्चियों के साथ दुष्कर्म और छेड़छाड़ आदि के मामलों में कई बार रिश्तेदार और परिवार के लोग ही आरोपी होते हैं। कई बार बाहरी लोग आरोपी होते है। पुलिस इस मामले में सतर्कता बरत रही है। आज भी अनेकों मामले पुलिस तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। कुछ बच्चियां ही हिम्मत कर आरोपी को सजा दिलाने के लिए आगे आती हैं। एसपी ने बताया कि पुलिस स्कूलों की छुट्टियां खत्म होते ही व्यापक स्तर पर बच्चियों को जागरूक करने के लिए स्कूलों में कार्यक्रम आयोजित करेगी। महिला पुलिस कर्मियों की संख्या जरूरत के अनुसार पूरी हो जाती है तो इस प्रकार के अपराध पर अंकुश लगाया जा सकता है। अभी तक जो लोग ऐसे मामलों में शामिल मिले हैं, उनका डाटा कंप्यूटराइज्ड किया जा रहा है। बेटियों को बचाने के लिए महिला हेल्प लाइन भी शुरू की गई है।
विज्ञापन
विज्ञापन

पश्चिमी सभ्यता में ढल रहा समाज का माहौल जिम्मेदार : जोशी
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर और वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक डॉ. हरदीप जोशी का कहना है कि हमारी सभ्यता पर पश्चिमी सभ्यता का गहरा असर पड़ रहा है। हमारे खानपान से लेकर पहनावे में भी बदलाव आ चुका है। इससे इस प्रकार की घटनाओं को बल मिल रहा है। इसमें मीडिया से लेकर फिल्म जगत भी जिम्मेदार है। कई बार बेहद कुंठित व्यक्ति भी ऐसी घटनाओं को अंजाम देते है, तो कई बार परिवार और पड़ोस के माहौल से भी ऐसी घटनाएं बढ़ने की संभावना होती है।


पीड़ित बच्चों का नहीं हो पाता पूरा मानसिक विकास : डॉ. सुरेंद्र
एलएनजेपी सिविल अस्पताल के मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. सुरेंद्र मंढान का कहना है कि जिन बच्चों के साथ नाबालिग अवस्था में दुष्कर्म आदि की घटनाएं हो जाती है। उनके पूरे जीवन पर इसका विपरीत असर रहता है। उनका मानसिक विकास रुक सा जाता है। वे उम्र के अनुसार अपना मानसिक विकास नहीं कर पाते। यहां तक कि अधिकतर बच्चे कुंठित अवस्था में रह जाते हैं। समाज से हटकर अकेले में ही रहना पसंद करते हैं। ऐसे बच्चों को भरपूर कांउसिलिंग के बाद भी घटना से उभरने में करीब दो वर्ष लग जाते हैं। इन बच्चों का विशेष ख्याल रखे जाने की आवश्यकता होती है।
विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय Hindi News वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें हर राज्य और शहर से जुड़ी क्राइम समाचार की
ब्रेकिंग अपडेट।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed