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नहाय खाय से छठ पूजा की शुरुआत

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 29 Oct 2022 01:51 AM IST
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Chhath Puja begins with Nahay Khay, Kurukshetra
संवाद न्यूज एजेंसी
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कुरुक्षेत्र। नहाय खाय से छठ महापर्व की शुरूआत शुक्रवार को हो गई। इस पर्व को लेकर श्रद्धालुओं में काफी उत्साह है। इस चार दिवसीय व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी होती है, इसी कारण इस व्रत का नाम छठ व्रत हो गया। इस पर्व को वर्ष में दो बार मनाया जाता है।
पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में। पारिवारिक सुख-समृद्धि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है। छठ पर्व में सूर्य और छठी मैया और सूर्य देव की पूजा की जाती है और उन्हें अघर्य दिया जाता है। सूर्य प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देने वाले देवता है, जो पृथ्वी पर सभी प्राणियों के जीवन का आधार हैं। सूर्य देव के साथ छठी मैया की पूजा का भी विधान है। सूर्य और छठी मैया का संबंध भाई बहन का है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो षष्ठी के दिन विशेष खगोलीय परिवर्तन होता है। इस दिन सूर्य की पराबैंगनी किरणें असामान्य रूप से एकत्र होती हैं और इनके कुप्रभावों से बचने के लिए सूर्य की ऊषा और प्रत्यूषा के रहते जल में खड़े रहकर छठ व्रत किया जाता है।
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पौराणिक मान्यता के अनुसार छठी मैया या षष्ठी माता संतानों की रक्षा करती हैं और उन्हें दीर्घायु प्रदान करती हैं। शास्त्रों में षष्ठी देवी को ब्रह्मा जी की मानस पुत्री भी कहा गया है। पुराणों में इन्हें माँ कात्यायनी भी कहा गया है, जिनकी पूजा नवरात्रि में षष्ठी तिथि पर होती है। षष्ठी देवी को ही बिहार-झारखंड में स्थानीय भाषा में छठ मैया कहा गया है।
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यह पर्व चार दिनों तक चलता है। पहले दिन सेंधा नमक, घी से बना हुआ अरवा चावल और कद्दू की सब्जी प्रसाद के रूप में ली जाती है। अगले दिन से उपवास आरंभ होता है। इस दिन रात में खीर बनती है। व्रतधारी रात में यह प्रसाद लेते हैं। तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य यानी दूध अर्पण करते हैं। अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते हैं।
इस पूजा में पवित्रता का ध्यान रखा जाता है। लहसून, प्याज वर्जित है। जिन घरों में यह पूजा होती है, वहां भक्तिगीत गाए जाते हैं। आजकल कुछ नई रीतियां भी आरंभ हो गई हैं, जैसे पंडाल और सूर्य देवता की मूर्ति की स्थापना करना। उस पर भी रोषनाई पर काफी खर्च होता है और सुबह के अर्घ्य के उपरांत आयोजनकर्ता माइक पर चिल्लाकर प्रसाद मांगते हैं। पटाखे भी जलाए जाते हैं।

रामायण और महाभारत काल से भी जुड़ी मान्यताएं
मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय फिर अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था। एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने थे। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है।
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