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Kurukshetra News: मंडप में कलाकार प्रस्तुत कर रहे स्टेट पार्टनर मध्य प्रदेश की संस्कृति

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 02 Dec 2022 09:00 AM IST
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Artist presenting culture of state partner Madhya Pradesh in pavilion
कुरुक्षेत्र। अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव में वीरवार को बधाई संग अन्य लोकनृत्यों की प्रस्तुति देख कलाकारों संग पयर्टक भी झूम उठे। इसके अलावा बरेदी, मटकी और अन्य नृत्यों ने लोक संस्कृति की अनोखी छटा पेश की। एक ओर जहां मध्य प्रदेश के मंडल में कलाकारों ने रंग जमाया, वहीं दूसरी ओर मनमोहक आदिवासी नृत्यों ने पर्यटकों और दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींचा।
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अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव में वीरवार को प्रमुख तौर पर बधाई लोक नृत्य प्रस्तुत किया गया। बुंदेलखंड अंचल में जन्म, विवाह और तीज-त्योहारों पर यह नृत्य किया जाता है। मनौती पूरी हो जाने पर देवी-देवताओं के द्वार पर भी बधाई नृत्य होता है। इस नृत्य में स्त्रियां और पुरुष दोनों ही उमंग से भरकर नृत्य करते हैं। स्त्रियां कुटुंब में नाती-पोतों के जन्म पर अपने वंश की वृद्धि की खुशी में घर के आंगन में बधाई नृत्य करती हैं और नेग-न्यौछावर बांटती हैं। बधाई के नर्तक, चेहरे के उल्लास, पद संचालन, लचक और रंगारंग वेशभूषा से दर्शकों का मन मोह लेते हैं। इस नृत्य में ढपला, टिमकी, रमतूला और बांसुरी आदि वाद्य प्रयुक्त होते हैं।
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वहीं बुंदेलखंड के बरेदी लोक नृत्य का संबंध हमारे देश की कृषक चरवाहा संस्कृति के साथ है। प्राचीन अध्येताओं ने यह सिद्ध किया कि बहुत पहले इस देश में आभीरय नामक एक अत्यन्त शक्तिशाली जाति का प्रवेश हुआ था, जो अपने साथ पुराने अपभ्रंश का रूप और आख्यानपरक विशद लोक कथाएं लेकर आये थे। कालान्तर में जातियों और संस्कृतियों के आपसी संबंध के कारण वह पृथक पहचान समाप्त हो गई, मगर आभीरों की भाषा और संस्कृति का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने श्री कृष्ण के जीवन और लीला चरित्र से स्वयं को जोड़ लिया। आज भी उत्तर भारत के अनेक अंचलों में दीपावली के समय यादव लोग नृत्य करते हैं। साथ ही गोपाल कृष्ण की लीलाओं विशेषकर किशोर लीलाओं के गीत गाते हैं। यह नृत्य दीपावली से 15 दिन यानी पूर्णिमा तक चलते हैं।
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ढिमरयाई बुंदेलखंड की ढीमर जाति का पारंपरिक नृत्य-गीत है। इस नृत्य में मुख्य नर्तकी हाथ में रेकड़ी वाद्य की सन्निधि से पारंपरिक गीतों की प्रस्तुति देती हैं। अन्य सहायक गायक-वादक मुख्य गायक का साथ देते हैं। गणगौर निमाड़ी जन-जीवन का गीति काव्य है। चैत्र दशमी से चैत्र सुदी तृतीया तक पूरे नौ दिनों तक चलने वाले इस गणगौर उत्सव का ऐसा एक भी कार्य नहीं, जो बिना गीत के हो। गणगौर के रथ सजाये व दौड़ाये जाते हैं। इसी अवसर पर गणगौर नृत्य भी किया जाता है। महिला और पुरुष रनु बाई और धणियर सूर्यदेव के रथों को सिर पर रखकर नाचते हैं। राजस्थान, गुजरात, मालवा में भी उतना ही लोकप्रिय है।
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बैगा जनजाति के करमा-परधौनी नृत्य
डिंडोरी जिले के चाड़ा के घने जंगलों में निवास करने वाली आदिम जनजाति बैगाओं के प्रमुख नृत्यों में करमा और दशहरा या बिलमा नृत्य है। इसके अलावा समय-समय पर बैगा परधौनी, झरपट, रीना नृत्य भी करते हैं। बैगा आदिवासियों में परधौनी नृत्य विवाह के अवसर पर बरात की अगवानी के समय किया जाता है। इसी अवसर पर लड़के वालों की ओर से आंगन में हाथी बनाकर नचाया जाता है।

मटकी लोक नृत्य
मालवा में मटकी नाच का अपना अलग परंपरागत स्वरूप है। विभिन्न अवसरों पर मालवा के गांव की महिलाएं मटकी नाच करती हैं। ढोलया ढोलक को एक खास लय जो मटकी के नाम से जानी जाती है, उसकी थाप पर महिलाएं नृत्य करती है। प्रारंभ में एक ही महिला नाचती है, इसे झेला कहते हैं। महिलाएं अपनी परंपरागत मालवी वेशभूषा में चेहरे पर घूंघट डाले नृत्य करती हैं। ढोल किमची और डंडे से बजाया जाता जाता है।
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