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Kurukshetra News: बलजीत सिंह दादूवाल के साथ बना गठजोड़ तो झींडा के लिए एचएसजीएमसी प्रधान बनने की राह हो गई आसान
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सेवा सिंह
कुरुक्षेत्र। करीब 24 साल के कड़े संघर्ष के बाद बनी पहली हरियाणा सिख गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी में सबसे मुख्य भूमिका जत्थेदार बलजीत सिंह दादूवाल की सामने आई है। चुनाव से लेकर कमेटी के प्रधान व कार्यकारिणी बनने तक हर किसी की उन पर निगाहें टिकी रहीं और वे गेम चेंजर साबित भी हुए। भले ही 19 जनवरी को हुए चुनाव में वे खुद कालावांली सीट वार्ड 35 पर 1771 वोटों से हार गए थे लेकिन इस हार के बावजूद वे अकेले ही नामित सदस्य बनने में कामयाब रहे थे। यही नहीं जगदीश सिंह झींडा के पंथक दल के भी महज नौ सदस्य ही विजयी हुए थे।
इससे निराश होकर उन्होंने अगले ही दिन सदस्यता से इस्तीफा भी दे दिया था जो वापस ले लिया गया। इसके बाद वे प्रधान बनने के लिए जोड़तोड़ लगाने लगे और सफल भी हुए। भले ही 22 आजाद सदस्य जीते, जिन्होंने अकाल पंथक मोर्चा भी बनाया तो समय के साथ इसमें कुछ सदस्य दूरी भी बना गए थे। उधर छह सदस्यों के साथ सिख पंथक दल के बलदेव सिंह कैमपुरा व तीन सदस्यों के साथ सिख समाज संस्था के दीदार सिंह नलवी ने भी अकाल पंथक मोर्चा के साथ गठजोड़ किया लेकिन वे कमेटी की प्रधानी तक नहीं पहुंच पाए। उधर जगदीश सिंह झींडा का कहना है कि वे और दादूवाल दोनों ही चुनाव में कमजोर रह गए थे लेकिन बादलाें को पीछे करने के लिए एक होना जरूरी था। दोनों एक हुए तो परिणाम भी सबके सामने हैं।
झींडा ने ही दीदार नलवी के साथ बजाया था अलग कमेटी का बिगुल
बता दें कि जगदीश सिंह झींडा व दीदार सिंह नलवी ने ही करीब 24 साल पहले कुरुक्षेत्र से ही प्रदेश की अलग कमेटी के लिए संघर्ष का बिगुल बजाया था। इसके लिए चलाए आंदोलन के लिए डेरा कार सेवा से ही रणनीति को अंजाम दिया था। गिरफ्तारियां दी तो जेल भी पहुंचे लेकिन संघर्ष कमजोर नहीं पड़ने दिया। इस संघर्ष में उनके साथ लगातार संगत व सिख नेता जुड़ते चले गए।
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प्रधानी का मौका आया तो राहेंं हो गईं जुदा
भले ही झींडा व नलवी ने साथ संघर्ष किया लेकिन जब स्थायी कमेटी के लिए प्रधानी का मौका आया तो दोनों की राहें जुदा हो गईं। दोनों ने ही अपना-अपना गुट बनाया, जिसके बैनर तले चुनाव भी लड़ा। कोई भी बहुमत तक नहीं पहुंचा तो जोड़तोड़ के लिए दूसरे गुटों का सहारा लिया। अब झींडा प्रधान बने तो नलवी ने ऐलान किया कि यह लोकतंत्र की हत्या है और इसे हाईकोर्ट में चुनौती देंगे।
वर्ष 1996 में ही पनप गई थी अलग कमेटी की टीस : झींडा
प्रधान बने जगदीश सिंह झींडा बताते हैं कि वर्ष 1996 में उन्होंने एसजीपीसी का चुनाव करनाल, पानीपत, रोहतक व सोनीपत की सीट से लड़ा था, जिसमें 3770 वोटों से जीत गए थे लेकिन उन्हें हराने के लिए बादल ने हर संभव प्रयास किए। चुनाव स्थगित तक किया। उसी समय टीस जग गई थी कि हरियाणा के गुरुघरों को बचाना है तो अलग कमेटी जरूरी है। इसके बाद उन्होंने 1999 में संघर्ष की अलख जगानी शुरू कर दी थी। धीरे-धीरे संघर्ष मजबूत होता गया और सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई पहुंची। आज संघर्ष काम आया है।
2014 से 20 तक रहे प्रधान
जुलाई 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की सरकार ने विधानसभा में हरियाणा सिख गुरुद्वारा प्रबंधन अधिनियम-2014 पारित कराया था। अधिनियम के तहत राज्य में गुरुद्वारों के मामलों के प्रबंधन के लिए एक अलग समिति का गठन किया गया था। एचएसजीपीसी बिल के मुताबिक अलग कमेटी को हरियाणा के गुरुद्वारों और उनकी संपत्तियों की देखभाल की जिम्मेदारी दी गई। इस कमेटी में जगदीश सिंह झींडा प्रधान बने थे, जो 2020 तक रहे। उनके साथ वरिष्ठ उपप्रधान दीदार सिंह नलवी भी रहे।
उधर सुप्रीम कोर्ट की ओर से वर्ष 2022 में अलग कमेटी पर मुहर लगा दी गई तो उसी समय से ही स्थायी कमेटी के चुनाव की मांग की जाने लगी थी। इसके बावजूद पहले महंत कर्मजीत सिंह, फिर भूपिंद्र सिंह असंध को कमान मिली थी।
वर्तमान में सीधे तौर पर 48 गुरुघरों का संचालन
जगदीश सिंह झींडा बताते हैं कि प्रदेश में 72 गुरुघर है, जिनमें 48 सीधे तौर पर कमेटी द्वारा संचालित है। दो गुरुघरों पर स्थानीय कमेटी तो दो पर अन्य द्वारा संचालन किया जा रहा है।
ये रहेंगी प्राथमिकताएं
जगदीश सिंह झींडा ने कहा कि उनकी प्राथमिकता में सबसे पहले श्री गुरु ग्रंथ साहिब को सुरक्षित करना है ताकि कहीं बेअदबी न हो। इसके बाद शिक्षा, स्वास्थ्य व धर्मप्रचार पर जोर दिया जाएगा।
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कुरुक्षेत्र। करीब 24 साल के कड़े संघर्ष के बाद बनी पहली हरियाणा सिख गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी में सबसे मुख्य भूमिका जत्थेदार बलजीत सिंह दादूवाल की सामने आई है। चुनाव से लेकर कमेटी के प्रधान व कार्यकारिणी बनने तक हर किसी की उन पर निगाहें टिकी रहीं और वे गेम चेंजर साबित भी हुए। भले ही 19 जनवरी को हुए चुनाव में वे खुद कालावांली सीट वार्ड 35 पर 1771 वोटों से हार गए थे लेकिन इस हार के बावजूद वे अकेले ही नामित सदस्य बनने में कामयाब रहे थे। यही नहीं जगदीश सिंह झींडा के पंथक दल के भी महज नौ सदस्य ही विजयी हुए थे।
इससे निराश होकर उन्होंने अगले ही दिन सदस्यता से इस्तीफा भी दे दिया था जो वापस ले लिया गया। इसके बाद वे प्रधान बनने के लिए जोड़तोड़ लगाने लगे और सफल भी हुए। भले ही 22 आजाद सदस्य जीते, जिन्होंने अकाल पंथक मोर्चा भी बनाया तो समय के साथ इसमें कुछ सदस्य दूरी भी बना गए थे। उधर छह सदस्यों के साथ सिख पंथक दल के बलदेव सिंह कैमपुरा व तीन सदस्यों के साथ सिख समाज संस्था के दीदार सिंह नलवी ने भी अकाल पंथक मोर्चा के साथ गठजोड़ किया लेकिन वे कमेटी की प्रधानी तक नहीं पहुंच पाए। उधर जगदीश सिंह झींडा का कहना है कि वे और दादूवाल दोनों ही चुनाव में कमजोर रह गए थे लेकिन बादलाें को पीछे करने के लिए एक होना जरूरी था। दोनों एक हुए तो परिणाम भी सबके सामने हैं।
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झींडा ने ही दीदार नलवी के साथ बजाया था अलग कमेटी का बिगुल
बता दें कि जगदीश सिंह झींडा व दीदार सिंह नलवी ने ही करीब 24 साल पहले कुरुक्षेत्र से ही प्रदेश की अलग कमेटी के लिए संघर्ष का बिगुल बजाया था। इसके लिए चलाए आंदोलन के लिए डेरा कार सेवा से ही रणनीति को अंजाम दिया था। गिरफ्तारियां दी तो जेल भी पहुंचे लेकिन संघर्ष कमजोर नहीं पड़ने दिया। इस संघर्ष में उनके साथ लगातार संगत व सिख नेता जुड़ते चले गए।
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प्रधानी का मौका आया तो राहेंं हो गईं जुदा
भले ही झींडा व नलवी ने साथ संघर्ष किया लेकिन जब स्थायी कमेटी के लिए प्रधानी का मौका आया तो दोनों की राहें जुदा हो गईं। दोनों ने ही अपना-अपना गुट बनाया, जिसके बैनर तले चुनाव भी लड़ा। कोई भी बहुमत तक नहीं पहुंचा तो जोड़तोड़ के लिए दूसरे गुटों का सहारा लिया। अब झींडा प्रधान बने तो नलवी ने ऐलान किया कि यह लोकतंत्र की हत्या है और इसे हाईकोर्ट में चुनौती देंगे।
वर्ष 1996 में ही पनप गई थी अलग कमेटी की टीस : झींडा
प्रधान बने जगदीश सिंह झींडा बताते हैं कि वर्ष 1996 में उन्होंने एसजीपीसी का चुनाव करनाल, पानीपत, रोहतक व सोनीपत की सीट से लड़ा था, जिसमें 3770 वोटों से जीत गए थे लेकिन उन्हें हराने के लिए बादल ने हर संभव प्रयास किए। चुनाव स्थगित तक किया। उसी समय टीस जग गई थी कि हरियाणा के गुरुघरों को बचाना है तो अलग कमेटी जरूरी है। इसके बाद उन्होंने 1999 में संघर्ष की अलख जगानी शुरू कर दी थी। धीरे-धीरे संघर्ष मजबूत होता गया और सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई पहुंची। आज संघर्ष काम आया है।
2014 से 20 तक रहे प्रधान
जुलाई 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा की सरकार ने विधानसभा में हरियाणा सिख गुरुद्वारा प्रबंधन अधिनियम-2014 पारित कराया था। अधिनियम के तहत राज्य में गुरुद्वारों के मामलों के प्रबंधन के लिए एक अलग समिति का गठन किया गया था। एचएसजीपीसी बिल के मुताबिक अलग कमेटी को हरियाणा के गुरुद्वारों और उनकी संपत्तियों की देखभाल की जिम्मेदारी दी गई। इस कमेटी में जगदीश सिंह झींडा प्रधान बने थे, जो 2020 तक रहे। उनके साथ वरिष्ठ उपप्रधान दीदार सिंह नलवी भी रहे।
उधर सुप्रीम कोर्ट की ओर से वर्ष 2022 में अलग कमेटी पर मुहर लगा दी गई तो उसी समय से ही स्थायी कमेटी के चुनाव की मांग की जाने लगी थी। इसके बावजूद पहले महंत कर्मजीत सिंह, फिर भूपिंद्र सिंह असंध को कमान मिली थी।
वर्तमान में सीधे तौर पर 48 गुरुघरों का संचालन
जगदीश सिंह झींडा बताते हैं कि प्रदेश में 72 गुरुघर है, जिनमें 48 सीधे तौर पर कमेटी द्वारा संचालित है। दो गुरुघरों पर स्थानीय कमेटी तो दो पर अन्य द्वारा संचालन किया जा रहा है।
ये रहेंगी प्राथमिकताएं
जगदीश सिंह झींडा ने कहा कि उनकी प्राथमिकता में सबसे पहले श्री गुरु ग्रंथ साहिब को सुरक्षित करना है ताकि कहीं बेअदबी न हो। इसके बाद शिक्षा, स्वास्थ्य व धर्मप्रचार पर जोर दिया जाएगा।