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साहब? अब हम विश्वविद्यालय के अधीन हैं या सरकार के
Updated Sun, 08 Jul 2018 12:25 AM IST
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सेवा सिंह
कुरुक्षेत्र। साहब! अब हम आयुष विश्वविद्यालय के अधीन या सरकार के? यह प्रश्न प्रदेश के एकमात्र श्री कृष्णा राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज में कार्यरत चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से लेकर हर प्राध्यापक की जुबान पर है, लेकिन इसका जवाब अभी किसी के पास नहीं है, जिसके चलते करीब 140 कर्मचारी संशय में फंसे हुए हैं। करीब दो वर्ष पहले विश्वविद्यालय की स्थापना को लेकर शुरू हुई कवायद के बाद जहां छह माह पहले ही गांव फतुहपुर में करीब 94 एकड़ में यह विश्वविद्यालय स्थापित करने पर मोहर लगी तो चार माह पहले आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति के तौर पर विभाग में ही निदेशक रहे डॉ बलदेव धीमान को कुलपति बनाया गया तो इसके बाद कॉलेज के प्राध्यापक कृष्ण कुमार जाटियान की नियुक्ति रजिस्ट्रार के पद पर की गई।
इसके बाद आयुर्वेदिक कॉलेज एवं अस्पताल के स्थाई व अस्थाई चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से लेकर प्राध्यापक एवं चिकित्सकों में भी हलचल मची हुई है। बता दें कि कॉलेज में जहां 40 प्राध्यापक व 30 गैर शिक्षक कर्मचारी स्थाई तौर पर कार्यरत है तो वहीं करीब इतना ही स्टॉफ आउट सोर्सिंग नीति के तहत लगा हुआ है। हालांकि संबंधित अधिकारियों के अनुसार विश्वविद्यालय को लेकर जारी अधिसूचना पत्र में उक्त कॉलेज को विश्वविद्यालय का ही एक भाग माना है, इसके बावजूद कर्मचारी से लेकर अधिकारी भी असमंजस में फंसे हुए हैं। अब प्रदेश के आयुर्वेदिक कॉलेजों को इस आयुष विश्वविद्यालय के अधीन किए जाने के बाद यह असमंजस और बढ़ गया है।
ऑप्शन मांगे जाने की इंतजार
कॉलेज के शिक्षक व अन्य कर्मचारी विश्वविद्यालय बनाए जाने के बाद से ही इंतजार में है कि उनसे ऑप्शन मांगा जाएगा कि वे सरकार के अधीन रहना चाहते है या फिर विश्वविद्यालय के अधीन। हालांकि अभी तक सरकार व विश्वविद्यालय की ओर से ऐसा कोई पत्र जारी नहीं किया गया, लेकिन हर कोई पहले से दोनों ओर से फायदे व नुकसान के आंकलन में जुटा है। वहीं अधिकारियों की मानें तो ऐसा ऑप्शन मांगे जाने की जरूरत ही नहीं है।
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कोई डेपुटेशन से वापस आ रहा तो कोई जाने को तैयार नहीं
सरकार के अधीन रहेंगे या विश्वविद्यालय के अधीन हो जाएंगे, इसी उलझन में जहां आयुर्वेदिक कॉलेज का कोई भी कर्मचारी व शिक्षक कहीं डेपुटेशन पर जाने को तैयार नहीं है तो वहीं पहले से डेपुटेशन पर गए कर्मी भी लौट रहे हैं।
कहीं फायदा तो कहीं नुकसान भी
कर्मचारी व शिक्षकों की मानें तो उन्हें दोनों ओर से कहीं फायदा है तो कहीं नुकसान भी नजर आ रहा है। विश्वविद्यालय के अधीन आने पर उनका तबादला होने की गुंजाइश नहीं रहेगी तो इसमें पेंशन न मिलने का भी खतरा है। वहीं सरकार के अधीन रहेंगे तो पुरानी नीति अनुसार पेंशन मिलने का फायदा होगा तो तबादले की भी हर समय संभावना बनी रहेगी।
स्थिति को स्पष्ट किया जाना चाहिए : राणा
कॉलेज के पंचकर्म विभागाध्यक्ष डॉ अशोक राणा का कहना है कि हर प्राध्यापक व कर्मचारी असमंजस में है कि वे वर्तमान में विश्वविद्यालय के अधीन है या फिर सरकार के अधीन। सरकार व विश्वविद्यालय को यह स्थिति स्पष्ट कर देनी चाहिए, ताकि सभी कर्मचारी बिना असमंजस के कार्य कर सके।
सभी कर्मचारी व शिक्षक स्वत: ही विश्वविद्यालय के अधीन : वीसी
विश्वविद्यालय के वीसी डॉ. बलदेव धीमान का कहना है कि कर्मचारियों से लेकर शिक्षक भी इसी उलझन में है कि वे किसके अधीन है और अनेकों शिक्षक उनसे भी यह प्रश्न पूछ चुके हैं, लेकिन यूनिवर्सिटी को लेकर जारी अधिसूचना के अनुसार जहां कॉलेज विश्वविद्यालय का ही एक अंग बन गया है तो स्वत: ही सभी कर्मचारी विश्वविद्यालय के अधीन हो जाते हैं। हालांकि सरकार की ओर से भी ऑप्शन मांगा जा सकता है, लेकिन यह ऑप्शन सभी कर्मचारी व शिक्षकों से मांगे जाने की जरूरत नहीं है।
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कुरुक्षेत्र। साहब! अब हम आयुष विश्वविद्यालय के अधीन या सरकार के? यह प्रश्न प्रदेश के एकमात्र श्री कृष्णा राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज में कार्यरत चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से लेकर हर प्राध्यापक की जुबान पर है, लेकिन इसका जवाब अभी किसी के पास नहीं है, जिसके चलते करीब 140 कर्मचारी संशय में फंसे हुए हैं। करीब दो वर्ष पहले विश्वविद्यालय की स्थापना को लेकर शुरू हुई कवायद के बाद जहां छह माह पहले ही गांव फतुहपुर में करीब 94 एकड़ में यह विश्वविद्यालय स्थापित करने पर मोहर लगी तो चार माह पहले आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति के तौर पर विभाग में ही निदेशक रहे डॉ बलदेव धीमान को कुलपति बनाया गया तो इसके बाद कॉलेज के प्राध्यापक कृष्ण कुमार जाटियान की नियुक्ति रजिस्ट्रार के पद पर की गई।
इसके बाद आयुर्वेदिक कॉलेज एवं अस्पताल के स्थाई व अस्थाई चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से लेकर प्राध्यापक एवं चिकित्सकों में भी हलचल मची हुई है। बता दें कि कॉलेज में जहां 40 प्राध्यापक व 30 गैर शिक्षक कर्मचारी स्थाई तौर पर कार्यरत है तो वहीं करीब इतना ही स्टॉफ आउट सोर्सिंग नीति के तहत लगा हुआ है। हालांकि संबंधित अधिकारियों के अनुसार विश्वविद्यालय को लेकर जारी अधिसूचना पत्र में उक्त कॉलेज को विश्वविद्यालय का ही एक भाग माना है, इसके बावजूद कर्मचारी से लेकर अधिकारी भी असमंजस में फंसे हुए हैं। अब प्रदेश के आयुर्वेदिक कॉलेजों को इस आयुष विश्वविद्यालय के अधीन किए जाने के बाद यह असमंजस और बढ़ गया है।
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ऑप्शन मांगे जाने की इंतजार
कॉलेज के शिक्षक व अन्य कर्मचारी विश्वविद्यालय बनाए जाने के बाद से ही इंतजार में है कि उनसे ऑप्शन मांगा जाएगा कि वे सरकार के अधीन रहना चाहते है या फिर विश्वविद्यालय के अधीन। हालांकि अभी तक सरकार व विश्वविद्यालय की ओर से ऐसा कोई पत्र जारी नहीं किया गया, लेकिन हर कोई पहले से दोनों ओर से फायदे व नुकसान के आंकलन में जुटा है। वहीं अधिकारियों की मानें तो ऐसा ऑप्शन मांगे जाने की जरूरत ही नहीं है।
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कोई डेपुटेशन से वापस आ रहा तो कोई जाने को तैयार नहीं
सरकार के अधीन रहेंगे या विश्वविद्यालय के अधीन हो जाएंगे, इसी उलझन में जहां आयुर्वेदिक कॉलेज का कोई भी कर्मचारी व शिक्षक कहीं डेपुटेशन पर जाने को तैयार नहीं है तो वहीं पहले से डेपुटेशन पर गए कर्मी भी लौट रहे हैं।
कहीं फायदा तो कहीं नुकसान भी
कर्मचारी व शिक्षकों की मानें तो उन्हें दोनों ओर से कहीं फायदा है तो कहीं नुकसान भी नजर आ रहा है। विश्वविद्यालय के अधीन आने पर उनका तबादला होने की गुंजाइश नहीं रहेगी तो इसमें पेंशन न मिलने का भी खतरा है। वहीं सरकार के अधीन रहेंगे तो पुरानी नीति अनुसार पेंशन मिलने का फायदा होगा तो तबादले की भी हर समय संभावना बनी रहेगी।
स्थिति को स्पष्ट किया जाना चाहिए : राणा
कॉलेज के पंचकर्म विभागाध्यक्ष डॉ अशोक राणा का कहना है कि हर प्राध्यापक व कर्मचारी असमंजस में है कि वे वर्तमान में विश्वविद्यालय के अधीन है या फिर सरकार के अधीन। सरकार व विश्वविद्यालय को यह स्थिति स्पष्ट कर देनी चाहिए, ताकि सभी कर्मचारी बिना असमंजस के कार्य कर सके।
सभी कर्मचारी व शिक्षक स्वत: ही विश्वविद्यालय के अधीन : वीसी
विश्वविद्यालय के वीसी डॉ. बलदेव धीमान का कहना है कि कर्मचारियों से लेकर शिक्षक भी इसी उलझन में है कि वे किसके अधीन है और अनेकों शिक्षक उनसे भी यह प्रश्न पूछ चुके हैं, लेकिन यूनिवर्सिटी को लेकर जारी अधिसूचना के अनुसार जहां कॉलेज विश्वविद्यालय का ही एक अंग बन गया है तो स्वत: ही सभी कर्मचारी विश्वविद्यालय के अधीन हो जाते हैं। हालांकि सरकार की ओर से भी ऑप्शन मांगा जा सकता है, लेकिन यह ऑप्शन सभी कर्मचारी व शिक्षकों से मांगे जाने की जरूरत नहीं है।