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वट अमावस्या पर डुबकी भी नहीं लगा सके श्रद्धालु
Updated Wed, 16 May 2018 01:00 AM IST
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17 करोड़ खर्च, मगर खास अवसर पर नहीं मिला ब्रह्म सरोवर के घाटों पर पानी
अमर उजाला ब्यूरो
कुरुक्षेत्र।
देश-दुनिया से कुरुक्षेत्र पहुंचने वाले श्रद्धालु अगर अहम अवसरों पर भी ब्रह्म सरोवर के घाटों पर आस्था की डुबकी लगाने के लिए पानी को तरसेंगे तो 17 करोड़ के स्वच्छ जल प्रोजेक्ट के क्या मायने ? यह सवाल सावित्री वट अमावस्या पर ब्रह्म सरोवर पर आस्था की डुबकी लगाने पहुंचे श्रद्धालुओं ने उठाए। दरअसल इन श्रद्धालुओं को वट अमावस्या पर ब्रह्म सरोवर के किसी भी घाट पर डुबकी लगाने के लिए पानी नसीब नहीं हुआ। ब्रह्म सरवोर के किसी भी घाट पर आधा फुट से ज्यादा पानी नहीं था। इससे भी बुरा हाल गीता जन्मस्थली ज्योतिसर में नजर आया। ज्योतिसर तीर्थ पर भी श्रद्धालुओं के स्नान करने को सरोवर में पानी उपलब्ध नहीं था।
बता दें कि भाखड़ा ब्रांच से ब्रह्म सरोवर में निरंतर स्वच्छ जल प्रवाह परियोजना के लिए 4.8 किलोमीटर तक 1600 एमएम डॉय की दो पाइप लाइन सप्लाई के लिए पंप तक बिछाई गई हैं। इस परियोजना के तहत 1600 एमएम डॉय की एक पाइप लाइन से निकासी के लिए पश्चिमी घाट से डाली गई है, जबकि पानी निकासी के लिए वीवीआईपी घाट के सामने पंप हाउस स्थापित किया गया है। इस प्रोजेक्ट का शिलान्यास जनवरी 2017 में हुआ था, जो पिछले महीने पूरा हो चुका है, लेकिन इसके बावजूद तीर्थ यात्रियों को ब्रह्म सरोवर में डुबकी लगाने के लिए पानी उपलब्ध नहीं हुआ।
केडीबी के संपदा प्रबंधक की प्रतिक्रिया
कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के संपदा प्रबंधक राजीव शर्मा का कहना है कि 17 करोड़ की लागत से प्रोजेक्ट पर काम लगभग पूरा हो चुका है, लेकिन अभी थोड़ा काम शेष है जिसकी वजह से पानी की आपूर्ति नहीं हो सकी। वहीं उन्होंने बताया कि ज्योतिसर तीर्थ के जीर्णोद्धार का काम अभी चल रहा है। हैरानी की बात यह है कि ब्रह्म सरोवर के जिस प्रोजेक्ट का अभी भी थोड़ा काम शेष बताया जा रहा है उस कार्य को पहले जून 2017 तक फिर सितंबर 2017 तक उसके बाद अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव-2017 से पहले पूरा करने का दावा किया या था,। पिछले दिनों इस प्रोजेक्ट का काम पूरा होने का फिर दावा किया गया था, जिसके बाद ब्रह्म सरोवर को स्वच्छ जल से लबालब भरा गया था, लेकिन खास अवसर पर पानी क्यों नहीं था और वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई ? इसका जवाब अधिकारी नहीं दे रहे।
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पति की लंबी आयु के लिए होता है व्रत : पंडित पवन
श्री ब्राह्मण एवं तीर्थोद्धार सभा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष पंडित पवन शर्मा शास्त्री ने कहा कि धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र के तीर्थों पर पावन अवसर पर स्नान का विशेष महत्व है। उन्होंने कहा कि इस अवसरों पर केडीबी को तीर्थों में स्वच्छ जल का प्रबंध पहले से करना चाहिए था। उन्होंने बताया कि ज्येष्ठ माह की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को वट सावित्री व्रत रखा जाता है। यह व्रत विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए रखती हैं। मंगलवार को महिलाओं ने अखंड सौभाग्य के फल की प्राप्ति के लिए वट सावित्री व्रत रखा और बरगद के वृक्ष की पूजा की।
धर्मग्रंथों के अनुसार ये है महत्व
धर्मग्रंथों के अनुसार इस दिन सावित्री ने अपने कठिन तप के बल से अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा यमराज से की थी। सदियों से वट वृक्ष के नीचे बैठकर पूजा एवं कथा सुनने सुनाने की परंपरा चली आ रही है। मान्यता है कि बरगद में मां लक्ष्मी का वास होता है ।
पिहोवा सरस्वती तीर्थ पर उमड़े श्रद्धालु
ज्येष्ठ मास की अमावस पर सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु सरस्वती तीर्थ पर पहुंचे और तीर्थ में स्नान के बाद पूजा अर्चना की। तीर्थ पुरोहित विनोद पंचौली ने बताया कि अमावस का दिन विशेष पितरों के लिए होता है। पवित्र नदियों में स्नान कर मृतक पूर्वजों के लिए पूजा अर्चना करते है और पूर्वजों की आत्मिक शांति के लिए प्रार्थना करते है। इससे प्रसन्न होकर पितरे आशीर्वाद देते हैं। उन्होंने बताया कि इस अमावस्या को वट सावित्री अमावस्या भी कहा जाता है। इस अमावस्या पर सुहागिन अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखती है। उत्तर प्रदेश, बिहार व अन्य कई राज्यों में सुहागिन व्रत रखती है। सुहागिन वट वृक्ष की पूजा करती हैं। वे वट वृक्ष की जड़ को पानी देकर परिक्रमा करते हुए कच्चा सूत लपेट कर अपने पति की लंबी आयु की कामना करती हैं। इसके बाद सास-ससुर को बायणा निकाल कर व्रत खोलती हैं।
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अमर उजाला ब्यूरो
कुरुक्षेत्र।
देश-दुनिया से कुरुक्षेत्र पहुंचने वाले श्रद्धालु अगर अहम अवसरों पर भी ब्रह्म सरोवर के घाटों पर आस्था की डुबकी लगाने के लिए पानी को तरसेंगे तो 17 करोड़ के स्वच्छ जल प्रोजेक्ट के क्या मायने ? यह सवाल सावित्री वट अमावस्या पर ब्रह्म सरोवर पर आस्था की डुबकी लगाने पहुंचे श्रद्धालुओं ने उठाए। दरअसल इन श्रद्धालुओं को वट अमावस्या पर ब्रह्म सरोवर के किसी भी घाट पर डुबकी लगाने के लिए पानी नसीब नहीं हुआ। ब्रह्म सरवोर के किसी भी घाट पर आधा फुट से ज्यादा पानी नहीं था। इससे भी बुरा हाल गीता जन्मस्थली ज्योतिसर में नजर आया। ज्योतिसर तीर्थ पर भी श्रद्धालुओं के स्नान करने को सरोवर में पानी उपलब्ध नहीं था।
बता दें कि भाखड़ा ब्रांच से ब्रह्म सरोवर में निरंतर स्वच्छ जल प्रवाह परियोजना के लिए 4.8 किलोमीटर तक 1600 एमएम डॉय की दो पाइप लाइन सप्लाई के लिए पंप तक बिछाई गई हैं। इस परियोजना के तहत 1600 एमएम डॉय की एक पाइप लाइन से निकासी के लिए पश्चिमी घाट से डाली गई है, जबकि पानी निकासी के लिए वीवीआईपी घाट के सामने पंप हाउस स्थापित किया गया है। इस प्रोजेक्ट का शिलान्यास जनवरी 2017 में हुआ था, जो पिछले महीने पूरा हो चुका है, लेकिन इसके बावजूद तीर्थ यात्रियों को ब्रह्म सरोवर में डुबकी लगाने के लिए पानी उपलब्ध नहीं हुआ।
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केडीबी के संपदा प्रबंधक की प्रतिक्रिया
कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के संपदा प्रबंधक राजीव शर्मा का कहना है कि 17 करोड़ की लागत से प्रोजेक्ट पर काम लगभग पूरा हो चुका है, लेकिन अभी थोड़ा काम शेष है जिसकी वजह से पानी की आपूर्ति नहीं हो सकी। वहीं उन्होंने बताया कि ज्योतिसर तीर्थ के जीर्णोद्धार का काम अभी चल रहा है। हैरानी की बात यह है कि ब्रह्म सरोवर के जिस प्रोजेक्ट का अभी भी थोड़ा काम शेष बताया जा रहा है उस कार्य को पहले जून 2017 तक फिर सितंबर 2017 तक उसके बाद अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव-2017 से पहले पूरा करने का दावा किया या था,। पिछले दिनों इस प्रोजेक्ट का काम पूरा होने का फिर दावा किया गया था, जिसके बाद ब्रह्म सरोवर को स्वच्छ जल से लबालब भरा गया था, लेकिन खास अवसर पर पानी क्यों नहीं था और वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई ? इसका जवाब अधिकारी नहीं दे रहे।
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पति की लंबी आयु के लिए होता है व्रत : पंडित पवन
श्री ब्राह्मण एवं तीर्थोद्धार सभा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष पंडित पवन शर्मा शास्त्री ने कहा कि धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र के तीर्थों पर पावन अवसर पर स्नान का विशेष महत्व है। उन्होंने कहा कि इस अवसरों पर केडीबी को तीर्थों में स्वच्छ जल का प्रबंध पहले से करना चाहिए था। उन्होंने बताया कि ज्येष्ठ माह की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को वट सावित्री व्रत रखा जाता है। यह व्रत विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए रखती हैं। मंगलवार को महिलाओं ने अखंड सौभाग्य के फल की प्राप्ति के लिए वट सावित्री व्रत रखा और बरगद के वृक्ष की पूजा की।
धर्मग्रंथों के अनुसार ये है महत्व
धर्मग्रंथों के अनुसार इस दिन सावित्री ने अपने कठिन तप के बल से अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा यमराज से की थी। सदियों से वट वृक्ष के नीचे बैठकर पूजा एवं कथा सुनने सुनाने की परंपरा चली आ रही है। मान्यता है कि बरगद में मां लक्ष्मी का वास होता है ।
पिहोवा सरस्वती तीर्थ पर उमड़े श्रद्धालु
ज्येष्ठ मास की अमावस पर सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु सरस्वती तीर्थ पर पहुंचे और तीर्थ में स्नान के बाद पूजा अर्चना की। तीर्थ पुरोहित विनोद पंचौली ने बताया कि अमावस का दिन विशेष पितरों के लिए होता है। पवित्र नदियों में स्नान कर मृतक पूर्वजों के लिए पूजा अर्चना करते है और पूर्वजों की आत्मिक शांति के लिए प्रार्थना करते है। इससे प्रसन्न होकर पितरे आशीर्वाद देते हैं। उन्होंने बताया कि इस अमावस्या को वट सावित्री अमावस्या भी कहा जाता है। इस अमावस्या पर सुहागिन अपने पति की लंबी आयु के लिए व्रत रखती है। उत्तर प्रदेश, बिहार व अन्य कई राज्यों में सुहागिन व्रत रखती है। सुहागिन वट वृक्ष की पूजा करती हैं। वे वट वृक्ष की जड़ को पानी देकर परिक्रमा करते हुए कच्चा सूत लपेट कर अपने पति की लंबी आयु की कामना करती हैं। इसके बाद सास-ससुर को बायणा निकाल कर व्रत खोलती हैं।