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हमें मातृ-पितृ दिवस मनाने की आवश्यकता नहीं : निर्मल दीदी
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- प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय सेक्टर नौ में कार्यक्रम
संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय सेक्टर नौ में पितृ दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में ब्रह्माकुमारी निर्मल दीदी ने कहा कि हमारा देश मात-पिता, गुरुजनों की सेवा और उनकी आज्ञाकारिता के गुण के लिए पहचाना जाता है। हमें मातृ दिवस या पितृ दिवस जैसे दिन मनाने की आवश्यकता नहीं है। हमारे यहां तो सब आपस में एक संगठित भावना से जुड़े हुए लोगों का वास है लेकिन बाहरी देशों में ऐसा नहीं है।
उन्होंने कहा कि मातृ दिवस, पितृ दिवस व रोज डे मनाने की जरूरत क्यों पड़ी, क्योंकि वास्तव में पाश्चात्य सभ्यता के अंदर जैसे ही बच्चा थोड़ा सा बड़ा हो जाता है तो उसको माता-पिता की छत्रछाया से अपनी मर्जी से जीवन निर्वाह करने की छुट्टी मिल जाती है इसलिए वह माता-पिता को किसी न किसी दिन किसी तरीके से मिलते रहे और कुछ हमारे रिश्ते आपस में जुड़े रहे, इसलिए विदेशी सभ्यता में यह डे मनाने का रिवाज पड़ा और आज देखते ही देखते यह सब प्रथाएं हमारे देश में भी चल पड़ी हैं।
शिवानी बहन ने एक कविता सुनाई पिता वह नाम है जिंदगी में, जिसके होने से सारे काम आसान हैं जिंदगी में, पिता वह हस्ती है जिंदगी में, जिसके होने से मस्ती है जिंदगी में, पिता वह शख्सियत है जिंदगी में, जिनके होने से अनुशासन है जिंदगी में, पिता वह एहसास है जिंदगी में, जिसके होने से आप हैं जिंदगी में।
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उर्मिला बहन ने बताया की आज हम संसार में देखते हैं कि एक माता-पिता अपने बच्चों की हर ख्वाहिश पूरी करता है कैसे एक-एक पैसा जमा करता है जो उन्हें चाहिए वो देता है कभी उन्हें महंगा फोन चाहिए, कभी उन्हें मोटरसाइकिल चाहिए, कभी महंगाई में ब्रांडेड कंपनी के कपड़े चाहिए, वो पिता अपना एक-एक तिल जमा करता रहता और बच्चों की सब आशाएं पूरी करता रहता है। नितिन भाई ने गीत पर नृत्य किया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
करनाल। प्रजापिता ब्रह्माकुमारीज ईश्वरीय विश्वविद्यालय सेक्टर नौ में पितृ दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में ब्रह्माकुमारी निर्मल दीदी ने कहा कि हमारा देश मात-पिता, गुरुजनों की सेवा और उनकी आज्ञाकारिता के गुण के लिए पहचाना जाता है। हमें मातृ दिवस या पितृ दिवस जैसे दिन मनाने की आवश्यकता नहीं है। हमारे यहां तो सब आपस में एक संगठित भावना से जुड़े हुए लोगों का वास है लेकिन बाहरी देशों में ऐसा नहीं है।
उन्होंने कहा कि मातृ दिवस, पितृ दिवस व रोज डे मनाने की जरूरत क्यों पड़ी, क्योंकि वास्तव में पाश्चात्य सभ्यता के अंदर जैसे ही बच्चा थोड़ा सा बड़ा हो जाता है तो उसको माता-पिता की छत्रछाया से अपनी मर्जी से जीवन निर्वाह करने की छुट्टी मिल जाती है इसलिए वह माता-पिता को किसी न किसी दिन किसी तरीके से मिलते रहे और कुछ हमारे रिश्ते आपस में जुड़े रहे, इसलिए विदेशी सभ्यता में यह डे मनाने का रिवाज पड़ा और आज देखते ही देखते यह सब प्रथाएं हमारे देश में भी चल पड़ी हैं।
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शिवानी बहन ने एक कविता सुनाई पिता वह नाम है जिंदगी में, जिसके होने से सारे काम आसान हैं जिंदगी में, पिता वह हस्ती है जिंदगी में, जिसके होने से मस्ती है जिंदगी में, पिता वह शख्सियत है जिंदगी में, जिनके होने से अनुशासन है जिंदगी में, पिता वह एहसास है जिंदगी में, जिसके होने से आप हैं जिंदगी में।
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उर्मिला बहन ने बताया की आज हम संसार में देखते हैं कि एक माता-पिता अपने बच्चों की हर ख्वाहिश पूरी करता है कैसे एक-एक पैसा जमा करता है जो उन्हें चाहिए वो देता है कभी उन्हें महंगा फोन चाहिए, कभी उन्हें मोटरसाइकिल चाहिए, कभी महंगाई में ब्रांडेड कंपनी के कपड़े चाहिए, वो पिता अपना एक-एक तिल जमा करता रहता और बच्चों की सब आशाएं पूरी करता रहता है। नितिन भाई ने गीत पर नृत्य किया।